Sunday, April 19, 2026

पचपदरा रिफाइनरी


 गाँव के कदम... शहर की ओर बढ़ रहे है। गाँव भी रूकने को तैयार नहीं है। उसे शहर बनना है। सबको बड़ा बनना है। एक तरह से सही भी है.. जिंदगी भी यही सीखाती है.. कुछ बड़ा करना है... वहीं नहीं रहना है.. पानी भी एक जगह जमा रह जाए तो वहाँ काई जम जाती है। प्रकृति की एक-एक चीज हमें चलायमान रहने की सीख देती है. कुछ नया करने की सीख देती है। यही सीख लेकर देश के छोटे से-छोटे गाँव बड़ा बन रहे है। राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में एक नई तेल रिफाइनरी बनकर तैयार हुई है। ये राजस्थान की पहली रिफाइनरी है.. इस जगह से करीब 73 किलोमीटर दूर मंगला में क्रूड ऑयल मिला है जो आधार बना इस रिफाइनरी के खुलने का... और यही आधार बनेगा इस छोटे से गाँव के बड़े शहर और फिर एक बड़े नगर में बनने का। गाँव के शहर बनने की रूप-रेखा तैयार हो चुकी है। गाँव से पलायन हो रहा होगा लेकिन एक उभरते शहर की ओर फिर से लोग वापस जा सकते हैं। इस तरह जहाँ रोजी-रोटी का साधन होता है वहाँ अपने धनी आबादी बसने लगती है। अभी पचपदरा रिफाइनरी बनकर तैयार हुई है और एक-दो दशक बाद अगर वापस जाना हुआ तो आज की खाली सड़‌कें, दूर-दूर तक दिखने वाली खाली जमीनें.. न जाने कहाँ गायब हो जाएंगी.. नए शहर... नए नगर की आगोश में पुराना गाँव समा जाएगा. गाँव के शहर बनने की प्रक्रिया पूरी होगी।

Thursday, March 26, 2026

अमिताभ बच्चन की फिल्मों के नाम खोजिए...

 आख़िरकार एक कुली से शहंशाह बनने का उनका आखिरी रास्ता जो था. उनकी परवरिश भी ऐसी हुई कि कोई दीवार कोई जंज़ीर उनके रास्ते का पत्थर नहीं बन सकी. वह राजनीति में इंक़लाब लाना चाहते थे लेकिन उन्हें समझ आ गया यहॉ बंधे हाथ कुछ नहीं किया जा सकता. उन्हें राजनीति से अलग किया दो अनजाने राम बलराम ने   

लेकिन अमर अकबर एंथनी की वजह से इनके बीच दोस्ताना हो गया और फिर इन्हें मुक़द्दर का सिकंदर बनते देर नहीं लगी पर क़िस्मत की बात बरसात की एक रात में एक डॉन इनके पीछे मिस्टर नटवरलाल की तरह पीछे पड़ा मजबूर होकर यह भागे लेकिन ठोकर लंग गई, नसीब अच्छा था बच गए. कामयाबी का सिलसिला चला तो अभिमान भी हो गया पर चुपके चुपके ज़िंदगी के अग्निपथ ने सिखा दिया कि जुर्माना भी भरना पड़ता हैं, ख़ून पसीना भी बहाना पड़ता हैं, ज़मीर की आवाज़ भी सुननी पड़तीं है, यूँ ही लोग बेमिसाल नहीं होते, ख़ुदागवाह हैं.
आनन्द की बात हैं पा की वजह से यह कई बार बॉम्बे टू गोवा गए वर्ना यह जानते हैं कि यहॉ अंधा क़ानून हैं कालिया बनते देर नहीं लगती. अब रोटी कपड़ा और मकान तो सबको चाहिए उसकी ज़िम्मेदारी रेशमा और शेरा ने संभाली तो सबके दिल शोले जैसे जल उठे. फिर एक दिन मिली से मुलाक़ात ने इन्हें उनका परवाना बना दिया और फ़रार होकर इन्होंने शादी कर ली. गुड्डी जैसी बिटिया पाकर यह निहाल हो गए लेकिन जल्दी यह सब कस्में वादें भूल गए. ज़िंदगी त्रिशूल बन गई.
ख़ैर है मामला अदालत तक नहीं पहुँचा. कभी कभी ऐसा भी होता हैं. गंगा की सौगंध खाकर जान बचाई  
मर्यादा की रेखा खींची वर्ना दुनिया बेशर्म कहती. काला पत्थर काला पत्थर ही होता हैं चाहे उसे कितनी ही शान या शक्ति से सँभाला जाए. इन्हें लावारिस बच्चों से बड़ा याराना सा लगता है.
उनके लिए तो यह बाग़वान से हैं. इन्हें भी तब कभी ख़ुशी कभी ग़म सा लगता है जब कोई इनके लिए नमक हलाल नहीं नमक हराम सा व्यवहार करता हैं, अपने आपको ग्रेट गैंबलर समझता हैं या सत्ते पे सत्ता में फँसाता है.
यह महान देश प्रेमी भी है नास्तिक तो बिलकुल नहीं. अब यह कह सकते हैं मैं अभिनय का तूफॉन हूँ जादूगर हूँ, यह कहने के लिए मैं आज़ाद हूँ आज का अर्जुन हूँ.
हिंदुस्तान की क़सम आप बड़े मियाँ छोटे मियाँ नहीं पूरे मेजर साहब जैसे हो लाल बादशाह हो सूर्यवंशम जैसे हो.

अभी भी झिझक है, अभी भी हिचक है,

 अभी भी झिझक है, अभी भी हिचक है,  

अभी भी झिझक है, अभी भी हिचक है। 

ग्रुप को खुले दिन हो गए है पच्चीस,
इधर-उधर से जोड़कर मेंबर हो गए बत्तीस।

कुछ ने तो ग्रुप में मचा रखी है खूब धमा-चौकड़ी
उनको लगता है चालीस में मिल गयी दूसरी नौकरी। 

कुछ है एकदम शांत, उन्हें लगता है दूसरे झाड़ रहे हेकड़ी,
साथ ही  ग्रुप में देखते अनाप-शनाप संदेशों की लंबी लड़ी। 

ऐ दोस्तों बात नहीं किए यूँ ही बीत गए है साल पच्चीस,
एक पीढ़ी बीत गयी, अब तो खोलो अपने दांत बत्तीस। 

ठीक है लड़कपन की चूहल का होता है अपना मज़ा 
अभी कौन सी उम्र बीत गयी, कौन दे रहा है सजा। 

फुर्सत मिले तो जमकर बातें करो और रहो हमेशा बिंदास 
हिचक दूर करो, झिझक दूर करो क्योंकि ये ग्रुप है ख़ास। 

-- स्वरचित

*******

विरचित...
🐋
  सुंदर कविता, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है-_*

_ख्वाहिश नहीं मुझे_
_मशहूर होने की,"_

        _आप मुझे पहचानते हो_
        _बस इतना ही काफी है।_


_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा जाना मुझे,_

        _जिसकी जितनी जरूरत थी_
        _उसने उतना ही पहचाना मुझे!_


_जिन्दगी का फलसफा भी_
_कितना अजीब है,_

        _शामें कटती नहीं और_
        _साल गुजरते चले जा रहे हैं!_


_एक अजीब सी_
_'दौड़' है ये जिन्दगी,_

        _जीत जाओ तो कई_
        _अपने पीछे छूट जाते हैं और_

_हार जाओ तो_
_अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं!_


_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अक्सर,_

        _मुझे अपनी_
        _औकात अच्छी लगती है।_

_मैंने समंदर से_
_सीखा है जीने का सलीका,_

        _चुपचाप से बहना और_
        _अपनी मौज में रहना।_


_ऐसा नहीं कि मुझमें_
_कोई ऐब नहीं है,_

        _पर सच कहता हूँ_
        _मुझमें कोई फरेब नहीं है।_


_जल जाते हैं मेरे अंदाज से_
_मेरे दुश्मन,_

              _एक मुद्दत से मैंने_
       _न तो मोहब्बत बदली_ 
      _और न ही दोस्त बदले हैं।_


_एक घड़ी खरीदकर_
_हाथ में क्या बाँध ली,_

        _वक्त पीछे ही_
        _पड़ गया मेरे!_

_सोचा था घर बनाकर_
_बैठूँगा सुकून से,_

        _पर घर की जरूरतों ने_
        _मुसाफिर बना डाला मुझे!_


_सुकून की बात मत कर_
_ऐ गालिब,_

        _बचपन वाला इतवार_
        _अब नहीं आता!_

_जीवन की भागदौड़ में_
_क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?_

        _हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
        _आम हो जाती है!_


_एक सबेरा था_
_जब हँसकर उठते थे हम,_

        _और आज कई बार बिना मुस्कुराए_
        _ही शाम हो जाती है!_


_कितने दूर निकल गए_
_रिश्तों को निभाते-निभाते,_

        _खुद को खो दिया हमने_
        _अपनों को पाते-पाते।_


_लोग कहते हैं_
_हम मुस्कुराते बहुत हैं,_

        _और हम थक गए_
        _दर्द छुपाते-छुपाते!_


_खुश हूँ और सबको_
_खुश रखता हूँ,_

        _लापरवाह हूँ ख़ुद के लिए_
        _मगर सबकी परवाह करता हूँ।_

_मालूम है_
_कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी_

        _कुछ अनमोल लोगों से_
        _रिश्ते रखता हूँ।_
🤝🤝🤝

😜😜😜

सिर्फ मोबाइल को ही..
पता है उसके..

मालिक का 
चरित्र कैसा है...

😜😜😜


जिदंगी के खुबसुरत सफर में न जाने कितने लोग मिलते हैं
कुछ हमारा फायदा उठाते हैं ,
तो कुछ हमें सहारा देते हैं
फर्क बस इतना है कि.. 
फायदा उठाने वाले दिमाग में रहते हैं
और सहारा देने वाले हंमेशा दिल में बसते हैं

🙏 सुप्रभात 🙏




"ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनका दूसरा मिसरा इतना मशहूर हुआ कि लोग पहले मिसरे को तो भूल ही गये। ऐसे ही चन्द उधारण यहाँ पेश हैं:

"ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है,
*वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"
 
*- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़*
 
"भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया,
*ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*
 
*- माधव राम जौहर*
 
"चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
*आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*
 
*- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी*
 
"दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से,
*इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"*
 
*- महताब राय ताबां*
 
"ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम,
*रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"*
 
*- क़मर बदायुनी*
 
"क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने दो,
*ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।"*
 
*- मियाँ दाद ख़ां सय्याह*
 
'मीर' अमदन भी कोई मरता है,
*जान है तो जहान है प्यारे।"*
 
*- मीर तक़ी मीर*
 
"शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली,
*रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।"*
 
*- जलील मानिकपूरी*
 
"शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी,
*कोई पत्थर से न मारे मेंरे दीवाने को।"*
 
*- शैख़ तुराब अली क़लंदर काकोरवी*
 
"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
*लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।"*
 
*- मुज़फ़्फ़र रज़्मी*"

एक बहुत भावुक कविता।
😔
*कुछ रह तो नहीं गया ?*

*तीन* महीने के 
बच्चे को दाई के पास 
रखकर जॉब पर 
जाने वाली माँ को 
दाई ने पूछा... 
"कुछ रह तो 
नहीं गया...? 
पर्स, चाबी 
सब ले लिया ना...?"

अब वो 
कैसे हाँ कहे...
पैसे के पीछे 
भागते भागते... 
सब कुछ पाने की 
ख्वाईश में 
वो जिसके लिये 
सब कुछ कर रही है,
*वह ही रह गया है...!*

😑 
*शादी* में 
दुल्हन को बिदा 
करते ही शादी का 
हॉल खाली करते 
हुए दुल्हन की 
बुआ ने पूछा... 
"भैया, कुछ रह 
तो नहीं गया ना...? 
चेक करो ठीक से...!"

बाप चेक करने 
गया तो दुल्हन के 
रूम में कुछ फूल 
सूखे पड़े थे।
सब कुछ तो 
पीछे रह गया...
25 साल जो नाम 
लेकर जिसको 
आवाज देता था 
लाड़ से...
वो नाम पीछे 
रह गया और 
उस नाम के आगे 
गर्व से जो नाम 
लगाता था, 
वो नाम भी पीछे 
रह गया अब...

"भैया, देखा...?
 कुछ पीछे तो नहीं रह गया ?"

बुआ के इस 
सवाल पर आँखों 
में आये आंसू 
छुपाते बाप जुबाँ 
से तो नहीं बोला.... 
पर दिल में 
एक ही आवाज थी... 
*सब कुछ तो यहीं रह गया...!*

😑 
*बड़ी* तमन्नाओं 
के साथ बेटे को 
पढ़ाई के लिए 
विदेश भेजा था 
और वह पढ़कर 
वहीं सैटल हो गया...

पौत्र जन्म पर 
बमुश्किल 3 माह 
का वीजा मिला था 
और चलते वक्त 
बेटे ने प्रश्न किया... 
"सब कुछ चेक
कर लिया ना...? 
कुछ रह तो 
नहीं गया...?"
क्या जबाब देते कि... 
*अब छूटने को* 
*बचा ही क्या है...!*

😑 
*सेवानिवृत्ति* की शाम 
पी.ए. ने याद दिलाया... 
"चेक कर लें सर...! 
कुछ रह तो नहीं गया...? "

थोड़ा रूका 
और सोचा कि 
पूरी जिन्दगी तो 
यहीं आने-जाने में 
बीत गई...
*अब और क्या रह गया होगा...?*

😑
*श्मशान* से 
लौटते वक्त बेटे ने 
एक बार फिर से 
गर्दन घुमाई
एक बार पीछे 
देखने के लिए...
पिता की चिता की 
सुलगती आग देखकर 
मन भर आया...

भागते हुए गया 
पिता के चेहरे की 
झलक तलाशने की 
असफल कोशिश की 
और वापिस लौट आया।

दोस्त ने पूछा... 
"कुछ रह गया था क्या...?"

भरी आँखों से बोला...
*नहीं कुछ भी नहीं रहा अब...*
*और जो कुछ भी रह गया है...*
*वह सदा मेरे साथ रहेगा...!*

😑 
*एक* बार 
समय निकालकर 
सोचें, शायद... 
पुराना समय 
याद आ जाए, 
आंखें भर आएं 
और... 
*आज को जी भर जीने का*
*मकसद मिल जाए...!*

सभी दोस्तों से 
ये ही बोलना 
चाहता हूँ...

*यारों क्या पता कब*
*इस जीवन की शाम हो जाये...!*

इससे पहले कि
ऐसा हो सब को 
गले लगा लो, 
दो प्यार भरी 
बातें कर लो...

*ताकि कुछ छूट न जाये...!!!*

नई राह है, नई उमंग है,
अब विलम्ब तनिक भी मत करना
ऐ पथिक! ये तेरी नई सुबह है!
जो कल हुआ, उसे भूलना मत,
जो भूल हुई हैं तुमसे
ये ठान ले तू अपने मन में
आज तुझे सुधारना है
ऐ पथिक.........
जितने रंग सजाने है सजा लो
अपने इस जीवन मे,
देर नहीं अब करना तुम
वक्त ने करवट ले ली है
ऐ पथिक.......
कुछ कर जाने की
सोच लो तुम,
कुछ पा लेने की सोच लो तुम,
इतनी गांठ बांध लेना
किसी से अब नहीं हारना है
ऐ पथिक..........
स्वागत कर तू अब
अपनी इस नई सुबह का,
जो चाहे तू अब कर ले
एहसास तू कर अब
खुलकर हँसने का
ऐ पथिक! ये तेरी
नई सुबह है!!!!!!



अच्छे लोगों की इज्जत 
        कभी कम नहीं होती

     सोने के सौ टुकड़े करो 
             फिर भी कीमत
            कम नहीं होती 

        भूल होना "प्रकृत्ति" है 
       मान लेना "संस्कृति" है 
और उसे सुधार लेना "प्रगति" है.
  
      

ॐ ब्रह्माण्ड के अंदर नियमित ध्वनि

 अंतरिक्ष तथा वायुमंडल में सौरमंडल के चारों ओर ग्रहों की गति से जो शोर हो रहा है वह ॐ की ध्वनि की परिणति है। ॐ ब्रह्माण्ड के अंदर नियमित ध्वनि है। सूक्ष्म इंद्रियों द्वारा ध्यान लगाने पर इसकी अनुभूति हो सकती है। 


सर्वत्र व्याप्त होने के कारण इस ध्वनि (ॐ) को ईश्वर (प्रणव) की संज्ञा दी गई है। जो ॐ के अर्थ को जानता है, वह अपने आप को जान लेता है और जो अपने आप को जान लेता है वह ईश्वर को जान लेता है। इसलिए ॐ का ज्ञान सर्वोत्कृष्ट है। समस्त वेद इसी ॐ की व्याख्या करते हैं। 

वैदिक चिंतन में परमात्मा के सर्वोत्तम नाम ॐ की मान्यता है। महाभारत काल के पश्चात इससे भिन्न विचारधाएं चल पड़ीं। बौद्ध तथा जैन विचारधाराओं में ॐ की प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आई तथा शैव-संप्रदाय में भी ॐ की प्रतिष्ठा बनी रही। शैव संप्रदाय में 'ॐ नमः शिवायः' मंत्र का प्रचार है जो वेदों के अनुकूल है। शाक्त संप्रदाय भी ॐ का परित्याग नहीं कर सका। 

शक्ति की प्रधानता होते हुए भी तांत्रिक मंत्रों में सर्वत्र ॐ का प्रथम उच्चारण होता है। सिक्ख पंथ में एक औंकार की मान्यता है। इसके अतिरिक्त पारसी, यहूदी तथा अन्य मतों में भी किसी न किसी रूप में ॐ के चिह्नों की मान्यता है। कहने का अर्थ है कि ॐ का अस्तित्व सर्वकालीन तथा सार्वभौमिक है।

गणेश की पूजा पहले क्यों?

 हिन्दू धर्म ग्रंथों में प्रसंग है कि भगवान शिव के विवाह में सबसे पहले गणपति की पूजा हुई थी। इसमें सांसारिक नजरिए से एक जिज्ञासा यह पैदा होती है जब भगवान गणेश शिव-पार्वती के पुत्र हैं तो उनके विवाह के पहले ही उनकी पूजा कैसे की गई? दरअसल लोक मान्यताओं में गणेश और गणपति एक ही देवता है। है। किंतु धर्म ग्रंथ में गणेश और गणपति को दो अलग-अलग रूप के बारे में बताया गया हैं। जानते हैं यह रोचक तथ्य -


शास्त्रों के अनुसार गणेश का अर्थ है - जगत के सभी प्राणियों का ईश्वर या स्वामी। इसी तरह गणपति का मतलब है - गणों यानि देवताओं का मुखिया या रक्षक।

गणपति को शिव, विष्णु की तरह ही स्वयंभू, अजन्मा, अनादि और अनंत यानि जिनका न जन्म हुआ न ही अंत है, माना गया है।

श्री गणेश इन गणपति का ही अवतार हैं। जैसे पुराणों में विष्णु का अवतार राम, कृष्ण, नृसिंह का अवतार बताया गया है। वैसे ही गणपति, गणेश रूप में जन्में और अलग-अलग युगों में अलग-अलग रूपों में पूजित हुए। विनायक, मोरेश्वर, धूम्रकेतु, गजानन कृतयुग, त्रेतायुग में पूजित गणपति के ही रूप है। यही कारण है कि काल अन्तर से श्री गणेश जन्म की भी अनेक कथाएं हैं।

सनातन धर्म में वैदिक काल से ही पांच देवों की पूजा लोकप्रिय है। इनमें गणपति पंच देवों में प्रमुख माने गए हैं। इन सब बातों में एक बात साफ है कि गणपति हो या गणेश वास्तव मे दोनों ही उस शक्ति का नाम है जो हर कार्य में सिद्ध यानि कुशल और सफल बनाती है। 🙏🏻🕉🐘👁🐘🕉🙏🏻

 जय गणेश 🐘👁🐘

ध्यान और मॉडर्न सामाजिक व्यवस्था

 एक समय था जब ध्यान सिर्फ उनके लिये था जो संसार से ऊब कर वैरागी हो गये थे। अब उनके लिये संसार में कोई रस न था और इस वजह से वह सुख और दुख के खेल के बाहर किसी महाआनंद की तलाश में थे। 


संसार जैसा है, ऐसा ही रहेगा, यहाँ कोई समाधान किसी बात का नहीं है और इसे बदला नहीं जा सकता ऐसी मान्यता के चलते संसार से मुंह मोड़कर लोग संन्यासी जीवन स्वीकारते रहें हैं। 

कोई प्रेम में धोखा खाकर संन्यासी बन जाता और कोई धन खोकर! आज उन्हीं कारणों के चलते कम लोग ध्यान में उत्सुक होते है। और यह एक तरह से अच्छा भी है। लोग जीवन को फिर से बेहतर बनाने के मौके ढूंढते है। 

आज बहुत से विधायक कारणों से ध्यान में रुचि बनी है लोगों की। आज लोग ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर सके इस लिये ध्यान सिख रहें है, ज्यादा आनंदित रह सके इस लिए ध्यान सिख रहें है। धोखा खाकर ध्यान सीखने की जगह वें बेहतर इंसान बन के ज्यादा प्रेमपूर्ण बन सके इसलिये ध्यान सीख रहें है।

और यही कारण बड़ा भेद ला देता है पुराने तरह के लोगों की ध्यान में रुचि के बाबत और इन नये पोसिटिव लोगों की ध्यान में रुचि के बाबत। पुराना ध्यान रहस्यमय शक्तियों का और मोक्ष का वादा करता था पर आज ध्यान की ज्यादा वैज्ञानिक समझ पैदा हुई है वैज्ञानिक अनुसंधानों के चलते। सिलिकॉन वैली में भी ध्यान के प्रयोग होने लगे है। 

जीवन से भागने वाले पुराने प्रकार के लोग संसार में स्वार्थी थे और ध्यान को लेकर भी स्वार्थी थे। पहले वह संसार से स्वयं के लिये कुछ पाना चाहते थे और अब वह ध्यान या सन्यास के सहारे कुछ अलग स्वयं के लिए पाना चाहते रहें है। 

संसार पहले महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें सुख दिखाई पड़ता था। भ्रांति टुटुटे ही पुराना व्यक्ति अब अलग तरह के स्वार्थी व्यक्ति बन जाता था। उस अलग प्रकार के स्वार्थी व्यक्ति को हम संन्यासी कहते थे। 

यह और बात है कि ध्यान की सिद्धि के बाद वह दूसरों को ध्यान से पैदा हुई समझ देता था पर फिर भी उसके प्रवचनों में जीवन और संसार को लेकर विधायकता इतनी न थी। सन्यास का अर्थ था सब वस्तुओं का और रिश्तों का त्याग या उनसे अलिप्त हो जाना। एक संन्यासी जीवन जीना या बहुत ही कम आवश्यकता बनाकर संसार में संन्यासी जीवन जीना। 

ऐसे लोगों को संभालने के लिये भारत जैसे देश में व्यवस्था भी मौजूद थी और वह व्यवस्था आज भी मौजूद है भले ही उस व्यवस्था में काफी फर्क आया हो।  

पर आज का युग बिलकुल बदल गया है। हम पूंजीवादी व्यवस्था में जी रहें है। देखते ही देखते लोग अमीर बने है, सामान्य इंसान के हाथ में मोबाइल और इंटरनेट जैसी टेक्नोलॉजी आ चुकी है साथ में खुली है विशाल संभावनाओं का संसार।

टेक्नोलॉजी और विज्ञान ने जीवन के  पूंजीवादी व्यवस्था के साथ मिलकर बड़ी सारी संभवनाएं दी है। इस व्यवस्था में इंसान ज्यादा स्वतंत्रता अनुभव करता है पुराने रुढ़िवादी समाज के चुंगल से बाहर आकर। 

युवा पीढ़ी ज्यादा बेहतर ज़िंदगी के लिये गांवों से शहर की और बढ़ रही है। बड़े शहरों में स्त्री को ज्यादा स्वतंत्रता मिली है। जीवन जीने के लिये बेहतर संसाधनों की सुविधा है। एक रिश्ता टूटता है तो 10 नये रिश्ते खड़े होने की संभावना है। एक नौकरी से सालों चिपके रहने की जगह लोग 2-3 सालों में नौकरियां बदल लेते है। 

पर इस माहौल ने जो छीना है लोगो से वह है लोगों का लोगों से घनिष्ट रिश्ता, उनका फुरसत का समय, प्रकुर्ति की करीबी और दिया है तनाव और ज्यादातर लोगों के लिये कोल्हू के बैल जैसा जीवन। 

*आज का युवा मोक्ष और ईश्वर नहीं खोज रहा और अगर खोज रहा है तो वह आज का युवाचित नहीं है।*

आज के युवा ध्यान में रुचि लेने लगे है क्योंकि वह बेहतर जीवन जीना चाहते है। आज का युवा  योगा करता है तो उसके पीछे कारण अध्यात्म या मुक्ति नहीं बल्कि ज्यादा बेहतर और सुंदर शरीर और स्वास्थ्य है। 

पुराने गुरु शरीर तो मरने वाला है मौत तो आने वाली है ऐसी नकारात्मक भाषा में बात करते आएं है और आज की पीढ़ी को ऐसी बातों में कोई रस नहीं। भारत के अध्यात्म ने इस पीढ़ी को कुछ नहीं दिया, हम दरिद्र रहें, और कई मामलों में पिछड़ गये। 

पश्चिम के देशों ने समृद्धि पैदा कर ली, सुख सुविधा पैदा कर ली और दुख का कारण ईश्वर नहीं है हमारी आदिम सोच है यह साबित कर दिया। 

विकसित देशों में ईश्वर जैसी बातों में एक बड़े स्तर पर लोगों की रुचि कम हो गई है।  

21विं सदी का भारत भी उसी पश्चिम की सुख, सुविधा और व्यवस्था चाहता है। और क्यों न चाहें! 

कोई यह कह सकता है कि पश्चिम का समाज बड़ा तनाव ग्रस्त है। ज्यातर लोग पश्चिम का अर्थ अमरीका समझते है। अमरीका आदर्श देश बिल्कुल नहीं है। यूरोपीय देशों में अमरीका जैसी स्थिति नहीं है। अमरीका के एक बेल्ट में तो धार्मिक अंधविश्वास का बोल बाला है। हालांकि अमरीका को देश की जगह एक कंपनी माना जाने लगा है। अमरीका के आधिपत्य आम लोगों से ज्यादा बड़ी कंपनियों के पास है। इसे *कॉरपोरेट अमरीका* भी कहा जाता हैं।

पर यूरोपीय यूनियन के देश बेहतर जीवन स्तर और समृद्धि प्रदान करते है। वह तकनीकी व्यवस्था के स्तर पर और *सामाजिक स्वतंत्रता और व्यवस्था* के स्तर पर हम से करीब 200 साल आगे है। 

*यह बात और है कि कुछ लोग खुले में शौच जाने को स्वतंत्रता कह लें या रास्ते पर ट्रैफिक सिग्नल तोड़ ने को स्वतंत्रा कहें।* 

आज का युवा भारत छोड के विदेशों में रहना पसंद करता है। सैकड़ों में से काफी कम लोगों को भारत में वापस आने का मन है। कुछ लोग भारत में ज्यादा समृद्ध है बस और कानून खरीद सकते है इस वजह से इस देश में है। अगर अमरीका या यूरोप हर भारतीय के लिये वीसा फ्री कर दें तो इस देश में सिर्फ गरीब रह जायेंगे, जो प्लेन की टिकीट नहीं खरीद सकते और दूसरे वह अमीर रह जायेंगे जो इस देश के धन का सबसे ज्यादा हिस्सा रखते है। 

*भारत का एक वर्ग अभी भी महात्मा और संतो के चक्कर में फंसा पड़ा है।*

भारत एक दूसरा छोटा वर्ग मॉडर्न या बाहर से इम्पोर्ट की या कहें अमरीका से नई पैकेजिंग में ढली विद्यायें जैसी की रेकी, टैरो, प्राणिक हीलिंग, मंडला आर्ट, एक्सेस बार, शामनिक हीलिंग जैसी अल्टरनेटिव हीलिंग थेरपी को अध्यात्म समझ कर उपने आप को अध्यात्मिक पहचान दे रहा है। 

*एक बहुत ही छोटा समूह रमण, जे.कृषणामूर्ति या भारतीय उपनिषद जैसे शाश्त्रों को समझने की कोशिश करता हैै। ज्यादातर लोग भारत एक महान देश है इससे आगे कुछ बोल नहीं पाते है।उन्हें न उपनिषद समझ में आता है न भारत का विविध दर्शन।* 

*ज्यादातर लोगों को तो यह तक नहीं पता की हम कौनसी राजनैतिक विचारधारा या इकोनॉमिक पॉलिसी में जी रहें है। आम भारतीय का दूसरे विषयों में ज्ञान का स्तर काफी नीचे है। फेसबुक और इंस्टाग्राम लोगों का संसार बन चुका है।* 

पिछली सदी में आज़ादी के कुछ साल बाद ही बदलते हुए भारत में आचार्य रजनीश (ओशो) एक नये तरह का अध्यात्म लेकर आते है जो पुराने भारतीय अध्यात्म और नये पश्चिमी जीवन को जोड़ता हुआ दिखाई पड़ता है। 

उनके दर्शन में वैसा सन्यास नहीं है जो संसार छोड़ने की बात करता हो या किसी स्वर्ग कि तलाश में हो। उनका दर्शन न समझ पाने की वजह से वह बड़ी बदनामी के शिकार हुए।

उनका सन्यास जीवन को स्वीकार करता सन्यास है और ध्यान का अर्थ जीवन को अधिक गहराई से जीना है बजाय जीवन से पलायन करने के। हालाँकि उनके संन्यासीयों में आप को पुराने भारतीय चित वाले संन्यासी भी मिल जायेंगे जो मोक्ष या enligtenment के पीछे पड़े हो। इसका कारण यह है कि ओशो ने हर भारतीय संत जो उच्च दशा में थे उन के दर्शन को समझाने के लिये काफी प्रवचन दीये थे। उन्होंने पुराने भारतीय प्रज्ञा पुरषों के दर्शन को पूर्ण न्याय देने की कोशिश की थी। पर उनका स्वयं का दर्शन उन पुराने तरह के अध्यात्म से मेल नहीं खाता। 

वह ऐसे व्यक्ति को ध्यानी बनाने की बात करते है जो बिलकुल भौतीक वादी है। दूसरी तरह से कहें तो वह हर संन्यासी को संसार में खड़ा रहके संसार को अधिक सुंदर बनाने को कहते है। 

ओशो की बात इस लिये कई लोगों को खिचड़ी लगती है और वह कंफ्यूज रहते है या ओशो के खिलाफ हो जाते है।

हमारा मन इस तरह से चीजों को समझने का आदि नहीं है। वह ब्लेक एंड व्हाइट जवाब चाहता है। वह नास्तिक या आस्तिक, संसारी या संन्यासी, साधु और शैतान ऐसे सभी चीजों का वर्गीकरण करता आया है। वह द्वैत में अद्वैत का दर्शन नहीं कर पाता। 

ओशो एक नई असंभव दिखने वाली मानवता की शुरूआत भर है। इनके बगिया में आने वाले समय में वह फूल खिलेंगे जो विज्ञान और ध्यान का जोड़ होंगे, जो संसार और ध्यान का जोड़ होंगे। जो संसार और ध्यान को अलग कर के नहीं चलेंगे बल्की संसार को ही ध्यान करने का मौका बना लेंगे। 

तो आज के युवा चित को पुराने धरमों के या ओशो के वह पुराने धर्मग्रस्त अंधविश्वासी लोग आकर्षित नहीं कर पाते। एक प्रतिभाशाली युवा इनकी बातों में नहीं फंसता और फंस भी अगर जाता है तो जल्दी ही ऐसा लोगों का धार्मिक आडंबर खुल के सामने आ जाते है उनके सामने। 

ज़रूरत है अब ध्यान को वैज्ञानिक समझ के साथ साथ जीवन और उत्सव से जोड़ने की ताकि हम पश्चिमी विकास की अंधी दौड़ में न फंस जाये पर एक बेहतर समाज का मिलकर निर्माण करें जिसमें प्रकृति प्रेम और मानवता के प्रति प्रेम का जन्

हार या जीत... सोच पर करती है निर्भर

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*🌴अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है, हार या जीत सोच पर निर्भर करती है । मान लो तो हार है, ठान लो तो जीत है । कल्पना ही सब कुछ है यह जीवन के आगामी आकर्षणों का पूर्व दर्शन है । मनुष्य को सोचने और समझने की अद्भुत क्षमता का जो वरदान प्रभु से मिला है वह किसी अन्य प्राणी को नहीं मिला है । प्रश्न यह उठता है हम इस अद्भुत क्षमता का कितना फायदा उठाते हैं ?*

*🌹कर सकते हैं निर्माण :*

💫जिंदगी बाह्य घटनाओं,  परिस्थितियों, कुदरत और हमारे पुरुषार्थ का स्वतंत्र मिश्रण है । कुदरत के प्रभाव को हम नहीं टाल सकते हैं परंतु कुम्हार की तरह कुछ निर्माण तो अवश्य ही कर सकते हैं । अकाल,  भूकंप,  बीमारी और दुर्घटनाओं को टाला तो नहीं जा सकता है परंतु हताश होने के बदले उनसे समझौता तो हमें अवश्य ही करना पड़ेगा । हाँ, बुरे कर्म और बुरी आदतों से तो कम से कम हम अपने को बचा ही सकते हैं ।

*🌹जरूरी है मन के भावों और आवेगों पर नियंत्रण :*

💫हम व्यर्थ ही अनेक प्रकार के काल्पनिक भय निर्माण कर, उनके वशीभूत हो  अपनी जीवन- शक्ति नष्ट करते हैं । वास्तव में यह  कागज के शेर हैं । आज हमें दृढ़ संकल्प से अपने मनोभावों और आवेगों पर नियंत्रण स्थापित करना ही होगा । क्योंकि प्रत्येक असफलता से यह सीखना होगा कि हमने सफलता के मार्ग से एक अवरोध को हटा दिया है । क्या अब्राहम लिंकन, एडिसन, गांधीजी जैसे हजारों लोगो ने असफलता से हार कर पलायन वृति अपनाई ? नहीं । उन्होंने अपनी असफलता का बार-बार पुनर्मूल्यांकन किया और सफलता हासिल कर जीवन में विजय के प्रति लोगों के सामने एक सकारात्मक दृष्टिकोण रखा । जब वे सफल हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं ?

*🌹अवरोध को चुनौती और मनोरंजन समझना :*

💫जीवन सफलता और असफलता का अद्भुत मिश्रण है । यह वह बाधा दौड़ (एक प्रकार का खेल) है जहां असफलता का अवरोध बार बार हमारे सामने आ खड़ा होता है परंतु हमें अवरोध के सामने हिम्मत हार कर घुटने टेकने नहीं हैं । प्रत्येक अवरोध को चुनौती और मनोरंजन समझकर, उमंग-उत्साह के साथ पुनः प्रयत्न के संकल्प की  छलांग लगाते लगाते सफलता को अंत में प्राप्त कर लेना ही है । 'बस एक और प्रयास' यह रीति सहज ही सफलता दिला देती है ।

*🌹नया पाने के लिए नया करना होगा :*

💫हमारी शान इस बात में नहीं होनी चाहिए कि हम सदा विजय हों बल्कि इसमें है कि गिरने के बाद पूरे उत्साह से फिर से जीतने के लिए उठ खड़े हो सके । कहते हैं भगवान का दिया हुआ कभी अल्प नहीं होता, टूट जाए जो बीच में वह संकल्प नहीं होता, जिंदगी में कभी असफलताओं से हार मत मानना क्योंकि जीत का कोई विकल्प नहीं होता ।

*🌹बताना नहीं है करके दिखाना है :*

💫मनुष्य परिस्थिति की नहीं परिस्थिति मनुष्य की रचना है । यदि हम अपने मन की शक्ति को जागृत कर ले तो दुनिया में कोई भी कार्य असंभव नहीं । हम यह नहीं सोचे कि लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे, हम क्या कर सकते हैं दुनिया को नहीं बताना है करके दिखाना है । एक रशियन कहावत है "पहले कीजिए, फिर बताइए ।"

*🌹केवल सफलता के बारे में सोचना :*

💫असफल होने के कारणों की सूची बनाकर किसी लक्ष्य को हासिल करना असंभव है । ऐसा करने से मन की पूरी शक्ति असफलता के चित्र बनाने में केंद्रित हो जाती है और अंततः असफलता ही हाथ लगती है । इसीलिए जीवन के उन क्षणों को याद कीजिए जब हम सफल हुए थे । केवल सफलता के बारे में सोचना और सफल होने के कारणों की सूची बनाना । ऐसा करने से हम उन सफल तरंगों को ब्रह्मांड तक पहुंचा रहे हैं और ब्रह्मांड हमको वही देगा जो हम चाहते हैं ।

*🌹समय किसी के लिए नहीं रुक सकता :*

💫हालात बदलते एक पल भी नहीं लगता । किसी भी वक्त परिस्थिति विपरीत हो सकती है । समय किसी के लिए नहीं रुकता । अगर हम अनुकूल परिस्थिति में हैं तो स्वयं को भाग्यशाली समझना और उस परमपिता परमात्म ऊर्जा के स्त्रोत को धन्यवाद देना और तुरंत काम में लग जाना चाहिए । 

*🌹हमें जीतने की आदत बनानी होगी :*

💫हम जीवन की मुश्किलों से घबराकर लक्ष्य को भूल जाते हैं । कई ओलंपियंस हैं जिनके जीवन में आए कठिन हालातों ने उन्हें हताश किया था परंतु वे टूटे नहीं । हर बार नए सिरे से जुट गए । आत्मविश्वास के लिए अभ्यास जरूरी है, जितना जल्दी हो सके, जीतने की आदत बनाना होगी, लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करना होगा । 

💫हार का सामना हर किसी ने किया है पर जीत उसी की हुई है जिसने संघर्ष जारी रखा । यदि लक्ष्य हासिल करना है तो भावनात्मक रूप से मजबूत बनना पड़ेगा, नहीं तो मेहनत पर पानी फिर जाएगा । दुनिया में हर इंसान को मनचाही चीजें नहीं मिलती । जैसी भी परिस्थिति हो, जीतने के लिए जुनून चाहिए ।

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