Saturday, March 20, 2010

संजय वन

(भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) नई दिल्ली में एक सप्ताह की रेडियो ट्रेनिंग के तहत हमें एक और रेडियो-प्ले करना था, इसके लिए शीतल ने वहाँ के कम्युनिटी रेडियो "अपना एफएएम" 96.9 के लिए एक शानदार नाटक लिखा। इसकी रिकॉर्डिंग भी की बाद में ऑन-एयर भी हुआ। स्क्रिप्टिंग ग्रुप के दो सदस्यों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी - शीतल और नेहा । लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन नेहा ना आ सकी तो हमें नमता गुप्ता से उसके अंश पढ़वाने पड़े। इस नाटक में दो आवाज और भी शामिल की गयी थी ऑटो ड्राईवर की आवाज़ दीपेंद्र ने दी थी और दरगाह पर खड़े व्यक्ति की आवाज़ योगेश ने दी .) ( जून २००७ में ट्रेनिंग की थी )


टॉपिक- संजय वन
नमस्कार दोस्तों, आपका स्वागत है 96.9 मेगाहर्ट्ज पर यानि अपना रेडियो वन पर। इंडिया गेट, लाल किला, पुराना किला, चिड़िया घर सब घूम आए। मगर फिर भी कुछ है, जो नहीं देखा। दक्षिणी दिल्ली का स्वर्ग, कुतुब मीनार के पास बसा संजय वन। आज हम आपको ले चलते है इसी की सैर पर।

(ऑटो की आवाज)
नेहा- हैलो शीतल
शीतल- अरे तुम...। कितना अच्छा लगा तुमसे मिलकर। मैं कब से कहती थी, पर तुम हो कि अपनी क्लास और कॉलेज से फुर्सत ही नहीं।
नेहा- अरे, अब बस भी करो। ये बताओ कैसी हो? जेएनयू में तुम्हारी क्लास कैसी चल रही है?
शीतल- मैं भी ठीक हूँ और क्लास भी ठीक चल रहा है।
नेहा- अब यही खड़ा रखोगी या चलोगी भी।
शीतल- अरे, मैं तो भूल ही गई थी। चलो तुम्हें अपना नया रुम दिखाती हूँ।
नेहा- पूरे मुनिरका में ऐसी ही गलियाँ और मकान है? शीतल- हाँ, क्योंकि यहाँ पर ज्यादातर स्टूडेंटस ही रहते हैं न...।
नेहा- तुम्हारा रूम तो देख लिया। अब कहाँ घूमने चलते है।
शीतल- चलो।
नेहा- पर चलेंगे कहाँ?
शीतल- कुतुब मीनार चले।
नेहा- वो तो देखा हुआ है।
शीतल- तो बताओ कहाँ चलना है? कहीं मंदिर, पार्क, मकबरा कहाँ?
नेहा- कहीं ऐसी जगह जहाँ इतना शोर न हो और दिल खुश हो जाए। दिल्ली के प्रदूषण और शोर से मैं बहुत परेशान हो गयी हूँ। जहाँ देखो धूल, धुँआ, भीड़-भाड़। हरियाली का तो नाम हीं नहीं है कहीं।
शीतल- ठीक है तो मैं तुम्हें ऐसी जगह ले चलती हूँ, जहाँ तुम्हें सब मिले- शांति भी, हरियाली भी और जहाँ भीड़-भाड़ भी ज्यादा न हो।
नेहा- पर कहाँ?
शीतल- संजय वन .... (ऑटो वाले को आवाज देते हुए) ... अरे ऑटो....
( ऑटो की आवाज)
शीतल- भईया संजय वन चलोगे?
ड्राईवर- पच्चीस रूपये देना।
नेहा- चलो..चलते है।

नेहा- ओह... रॉकलैंड अस्पताल...और ये आई आई पी एम?

शीतल- हाँ अरिंदम चौधरी का मीडिया और प्लानिंग इंस्टीच्यूट।
नेहा- वही अरिंदम चौधरी, जिन्होंने फिल्म रोक सको तो रोक लो बनाई थी।
शीतल- हाँ, वही। .... लो पहुँच गये हम।
नेहा- संजय वन (बोर्ड पढ़ते हुए) डीडीए उद्यान खंड 4, संजय वन रिज क्षेत्र, नजदीक जेएनयू।
शीतल- अब बोर्ड ही पढ़ती रहोगी या अंदर भी आओगी?
नेहा- आ रही हूँ। यहाँ प्रवेश शुल्क नहीं है क्या?
शीतल- नहीं, अब चलो।
नेहा- (फिर बोर्ड पढ़ते हुए) गर्मियों में सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक। और सर्दियों में सुबह 5 बजे से शाम 7 बजे तक। ..... चलो अभी तो 3 ही बजे है, शाम तक का समय है घूमने के लिए।
शीतल- अरे इधर आओ, आगे।
नेहा- वाह। ये तो गिर के वन या किसी बड़े अभ्यारण्य से कम नहीं लगता। ( कदमों की आहट... चलते हुए)ये क्या है?
शीतल- कोई पुराना बना स्टोर लगता है।
नेहा- यहाँ कितनी हरियाली है ना? जहाँ नजर घुमाओ वहीं पेड़ ही पेड़। वहाँ क्या? मंदिर?
शीतल- हाँ इतने विशाल क्षेत्र में बसे इस वन को किसी गाँव से कम थोड़े ही कह सकते है।
( चिड़ियों की चहचहाने की आवाज)
नेहा- ये पुल कितना खूबसूरत है? और ये नाला....
शीतल- हाँ यह पूरे वन की मिट्टी और गंदगी को अपने अंदर समा लेता है।
नेहा- ये लाल फूलों से लदे पेड़ तो लग रहे हैं जैसे- लाल फूलों का गुलदस्ता हो।
शीतल- और ये पीले फूल कितने सुंदर लग रहे है।
( नेचर का म्यूजिक)
नेहा( पढ़ते हुए)- दिस वे.... चलो इधर चलते है। देखो ये क्या है?
शीतल- यह तो कोई दरगाह लगती है। इनसे पूछते है। सुनिए, आप... यहाँ...

व्यक्ति- मैं शकील अहमद। बाबा साहब और उनकी मुँहबोली बेटी की खिदमत में यहाँ रहता हूँ।
नेहा- तो ये दो कब्र उन्हीं की है।
व्यक्ति- हाँ, ये हाजी फखरूद्दीन शाह और ये पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला रानी की कब्र है।करीब 1019 साल
पहले यहाँ बनाई गयी थी। अब तो लोग यहाँ फरियाद करने आते है। सोमवार खुदा की इबादत का दिन है, इस दिन यहाँ बहुत से लोग फूल चढ़ाने आते है। अपनी मुराद मांगते है और पूरी होने पर फिर से शुक्रिया अदा करने आते है।
नेहा- शुक्रिया, अब हम चलते है।
व्यक्ति- टीले की ओर जा रहे है?
शीतल- हाँ...(म्यूजिक).. चलो, जल्दी आगे आओ।
नेहा- अरे वाह कितना ऊंचा टीला है।( उत्साहित होकर).. ये तो रॉक क्लाइंबिंग होगा।
शीतल- मैं आगे बढ़ती हूँ, ये बैग मुझे दे दो और बस पैर जमाकर चढ़ती रहो।
नेहा- अरे, ये दुपट्टा भी झाड़ी में अटक गया।
शीतल- संभल के....। आह पहुँच गये। लाओ अपना हाथ दो।
नेहा- आह..। वाओ.. कितना खूबसूरत नजारा है। जहाँ नजर घुमाओ वहाँ हरियाली ही हरियाली।सच। यकीन नहीं होता दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ और प्रदूषण वाले इलाके में ऐसी जन्नत भी है कहीं।कुतुब मीनार, कितना करीब दिखता है यहाँ से। और वो मकबरा.... इसकी गुंबद भी कितनी बेहतरीन दिख रही है।
शीतल- वाकई.. यहाँ खड़े होकर तो पूरी दिल्ली दिख रही है। और वहाँ दूर...... पेड़ो के बीच रोड़ दिख रही है तुम्हें? वो जेएनयू है।
नेहा- हाँ, वो बस.. कैसी खिलौना सी दिख रही है।कुछ भी कहो, ये नजारा बेहद ही खूबसूरत है। बस अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहती हूँ इस दृश्य को।

( गहरी साँस लेते हुए)
शीतल- कुछ देर यहीं बैठते हैं...
नेहा- हाँ
शीतल- क्या सोच रही हो?
नेहा- यही कि, यहाँ पहले क्यों नहीं आई?
( दोनों हँसते हुए)
शीतल- यहाँ और भी कई टीले है। चलो दूसरे टीले पर चलते है।
नेहा- ठीक है। और ये रास्ता सीधे नीचे उतरता है?
शीतल- हाँ, मगर हम उस टीले पर चलकर नीचे उतरते है।
नेहा- अरे थक गए...।
शीतल- अभी देखा ही क्या है? अब चलते हैं चिड़ियाघर का मजा लेने, उस तरफ..।
नेहा- आज तो तुम थका डालोगी। ( मोर की आवाज)... वो देखो मोर, कैसे नाच रहा है।
शीतल- और आगे चलो। देखो गिरगिट...
नेहा- अरे ये उल्लू और वो बिच्छू कैसे डंक फैलाए हुए है।
शीतल- उस बंदर को देखो कैसे कोने में छिपा बैठा है। और ये दोनों उस्ताद कैसे मस्ती कर रहे है।
नेहा- मेरे पास कुछ चने है। ऐ रेंचो चने खाओगे? (बंदर गुर्राते हुए).... देखो कैसे दांत दिखा रहा है।
शीतल- वहां देखो नील गाय। तुम जानती हो नील गाय अब काफी कम देखने को मिलती है।
नेहा- वो काला साँप कैसे फूँकार मार रहा है। और ये--- घोड़ा पछा़ड़ साँप। (पढ़ते हुए)....
शीतल- ये देखो पंख फैलाए मोर-मोरनी।
नेहा- ब्यूटीफूल। ये तो मिनी चिड़ियाघर लग रहा है या यूँ कहूँ कि साउथ दिल्ली का चिड़ियाघर। ये जलमुर्गी.... मगर जल कहाँ है?
शीतल- आगे चलो जल भी मिलेगा।
नेहा- बस झील की ही कमी थी। अब थोड़ी देर यहीं बैठते हैं।
शीतल- आह। ये थकान झील के किनारे बैठने से ही कम होगी।
नेहा- झील में ये बत्तखें कैसे घूम रही हैं।
शीतल- हाँ, हमारी तरह वो भी सैर कर रही है। जरा पानी की बोतल देना, प्यास लग आई।
नेहा- ये लो (पानी पीने की आवाज) अरे सात बज गए। (चौंककर) पता भी नहीं चला घूमते हुए, कब चार घंटे बीत गए।
शीतल- चलो अब बाहर निकलते हैं। फिर तुम्हें शाहदरा की बस भी लेनी होगी। (चलने की आवाज)नेहा- चलिए, आ गए बाहर।
शीतल- तो कैसा लगा तुम्हें संजय वन?
नेहा- बेहद खूबसूरत...। सच... एक साथ इतने पेड़ पौधे देखकर दिल खुश हो गया। वरना दिल्ली में इतनी हरियाली और कहाँ है। और फिर चिड़ियाघर,झील, रॉक क्लाइंबिंग, दरगाह.... सब कुछ एक ही जगह पर। वाकई दक्षिण दिल्ली का स्वर्ग है--- संजय वन

Monday, March 15, 2010

JNU भ्रमण

( भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) नई दिल्ली में एक सप्ताह की रेडियो ट्रेनिंग के तहत हमें एक रेडियो-प्ले करना था, इसके लिए योगेश ने वहाँ के कम्युनिटी रेडियो "अपना एफएएम" 96.9 के लिए एक शानदार नाटक लिखा। इसकी रिकॉर्डिंग भी की बाद में ऑन-एयर भी हुआ। स्क्रिप्टिंग ग्रुप के तीन सदस्यों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी - योगेश, नितेश और नेहा । लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन नेहा ना आ सकी तो हमें नमता गुप्ता से उसके अंश पढ़वाने पड़े। इस नाटक में एक आवाज और भी शामिल की गयी थी- दीपेंद्र की ढ़ाबा मालिक के रूप में.....) ( जून २००७ में ट्रेनिंग की थी )

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Title: JNU भ्रमण

Synopsis: दो भाई, नितेश और योगेश, दिल्ली पहुँचते है। योगेश जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पढ़ता है और अपने छोटे भाई नितेश को JNU की सैर कराने के लिए दिल्ली लेकर आता है... JNU के बारे में जानकर नितेश भी निश्चय करता है वो भी JNU में पढ़कर अपनी शिक्षा पूरी करेगा।

Script: (Sound of train and crowd at the station)

Yogesh: लो पहुँच गये हम दिल्ली...

Nitesh: योगेश भैया..... अब यहाँ से JNU कितनी दूर है?

Yogesh: अरे तुम इतने उतावले क्यों हो रहे हो? बहुत जल्द हम JNU में होंगे..... आओ....
(Sound of Buses)

Yogesh: नितेश.... ये है मिन्टो रोड.... यहाँ से हम 615 नंबर की बस पर बैठेंगे जो हमें सीधे JNU ले जायेगी।
Nitesh: भैया.... वो रही 615 नंबर की बस

Yogesh: हाँ....... वही है..... चलो
(Bus leaves....)

Yogesh: अच्छा सुनो..... मैं जरा थक गया हूँ...... थोड़ा सो लेता हूँ जब JNU आ जाए तब मुझे जगा देना। Nitesh: ठीक है भैया.... तब तक मैं दिल्ली देखता हूँ..... पर भैया.... जब JNU आएगा तो मुझे कैसे पता चलेगा? मैंने तो कभी JNU देखा ही नहीं है।Yogesh: हा...हा....हा..... इसकी फिक्र तुम मत करो...... तुम्हें पता चल जाएगा।
(Sound of Bus with some music)
(Aeroplane की आवाज)
Nitesh: भैया(चौंककर).... ये कैसी आवाज है?

Yogesh: अरे..... आ गया JNU..... ये plane की आवाज थी... यही है JNU आने की पहचान...
Nitesh: ये Aeroplane?Yogesh: हाँ..... चलो तैयार हो जाओ..... अगले stop पर हमें उतरना है......

Nitesh( खुशी से) जी भैया.....
(Bus रूकने की आवाज)

Yogesh: चलो......

Nitesh: ये Hostel है क्या भैया?

Yogesh: हाँ....... ये Ganga Hostel है, girls hostel.... और उस तरफ Jhelum Hostel है और वहाँ Satluj Hostel....Nitesh: आप Satluj Hostel में रहते हो न?

Yogesh: हाँ.... और ये सामने Ganga dhaba.....

Nitesh: Oh..... यही है ganga dhaba....जिसके बारे में आप इतना कुछ बताते रहते है.......Yogesh: हाँ...... ये वही Ganga dhaba है।

Nitesh: पर ये तो बहुत Normal सा dhaba है?Yogesh: यही तो खासयित है इस ढ़ाबे की.... कि इतने सालों बाद भी ये Normal है...... वरना आज की तेज जिन्दगी में Normal रहना बड़ा मुश्किल होता है..... खैर....चलो पहले ढ़ाबे पर चाय पीते है उसके बाद रूम पर चलेंगे...

Nitesh: ठीक है भैया...

(Sound of people)

Yogesh: दो चाय देना भैया...

Dhaba man: 5 रूपये खुले दो......

Music...

Yogesh: ये लो..... यहाँ की स्पेशल चाय

Nitesh: हाँ... वाकई बहुत अच्छी चाय है.... भैया.... यहाँ और भी तो ढ़ाबे होंगे?Yogesh: हाँ..... लगभग हर 200 मीटर की दूरी पर एक ढ़ाबा है।

Nitesh: और यहाँ Hostel कितने है?

Yogesh: यहाँ 16 hostels है जिनमें 3 Girls hostel है 7 boys hostel, 4 co-hostel और 1 Married Hostel....

Nitesh: Co-Hostel?

Yogesh: हाँ...... आधे में Boys रहते है और आधे में Girls ...

Nitesh: अच्छा... ये बताइए भैया.... यहाँ सारे Hostels का नाम नदियों के नाम पर क्यों है?

Yogesh: वो इसलिए क्योंकि नदियाँ हमारे देश की एकता और अखण्डता को दर्शाती है.... और यहाँ तो अपने देश के हर कोने से लोग आते है.... जब वो अपने शहर से गुजरने वाली नदी का नाम यहाँ देखते है तो उन्हें बहुत अपनापन सा महसूस होता है।
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Neha: Hi Yogesh!

Yogesh: Hi !
Neha: तुम घर से कब आए?

Yogesh: बस अभी 5 मिनट पहले ही उतरा हूँ बस से.... अरे हाँ.... ये मेरा छोटा भाई..... नितेश, नितेश ये है नेहा.... यहाँ Political Science से MA कर रही है....Neha: हेल्लो

Nitesh: नमस्ते !

Yogesh: नेहा ..पढ़ाई के साथ थियेटर भी करती है... बहुत अच्छा गाना गाती है और क्रांतिकारी खयालात की है।

Neha: अरे बस-बस.... ये क्या बता रहे हो उसे

Yogesh: दरअसल अगली साल ये भी यहाँ एडमिशन लेना चाह रहा है। तो यहाँ की आबो-हवा से रूबरू कराना जरूरी है।

Neha: हाँ... तब तो बताना जरूरी है

Yogesh: वैसे तुम क्या कर रही थी?

Neha: मैं ये Posters लगा रही थी... आज रात Procession है... वो Nandigram में जो हुआ न..... उसके लिए

Yogesh: अरे हाँ.... बहुत बुरा हुआ॥


Nitesh: नेहा दीदी आप कुछ बताइए यहाँ के बारे में....

Neha: पहले मैं Posters चिपका कर आती हूँ..... फिर इत्मिनान से बैठकर तुम लोगों से बात करती हूँ।

Nitesh: ठीक है... (to Yogesh) भैया...... Nandigram में जो हुआ उसका Protest यहाँ करने से क्या होगा?

Nitesh: दरअसल यही तो lifeline है JNU की.... जब भी देश में कुछ ऐसा घटता है जो इंसानियत के खिलाफ हो तो हम उस पर अपना Protest जरूर दर्ज कराते है। एक तरह से देखा जाए तो ऐसा करने से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता.... पर इतना जरूर है हमारे मन को थोड़ी शांति मिलती है और यहाँ रहने वाले अंजान लोगों को और इस देश के नेताओं को इस बात का आभास हो जाता है कि जो कुछ हुआ वो गलत हुआ।

Nitesh: ह्म्म्म

Yogesh: हम अपने freedom of speech and expression का पूरा इस्तेमाल करते है।

Nitesh: शायद इसी लिए लोग JNU को intellectuals का गढ़ कहते है।

Yogesh: हाँ..... लोगों को बहुत भरोसा है इस जगह पर..... पता है जब 1984 में दंगे हुए थे तब सिखों ने Police Station के बजाए JNU आकर शरण ली थी।

Nitesh:अच्छाYogesh: हाँ.... और 75 में जब Indira Gandhi ने emergency लगायी थी और सारे देश का कामकाज ठप्प हो गया था तब उसके Protest में एक दिन का Administrative work खुद किया था.....

Neha: चलो.... लग गए

Yogesh: अब जो पूछना है.... नेहा से पूछो

Nitesh: नेहा दीदी.... आप इतने सारे काम करती है.... आप थक नहीं जाती

Neha: ऐसा कुछ नहीं है..... दरअसल मैं जो कुछ करती हूँ दिल से करती हूँ ..... और दिल से किये गए काम में थकान नहीं होती।

Nitesh: और आप theatre के लिए कब Time निकालती है?

Neha: Theatre का rehearsal मैं शाम को करती हूँ..... यहाँ पर 4 theatre group है...... Bahroop,IPTA,Jugnu और Dastak... मैं Bahroop के साथ काम करती हूँ।

Nitesh: अपना नाटक कब दिखाएंगी आप ?

Neha: जरूर दिखाऊँगी.... एक बार यहाँ आ तो जाओ।

Yogesh:अरे इसे तुम कोई Revolutionary song ही सुना दो....

Nitesh: हाँ हाँ दीदी.....

Neha: अरे तुम्हारे भैया भी तो खूब गाने गाते है......

Yogesh: अच्छा ठीक है मिलकर गाते है....

Neha: ठीक है.... चलो... वो गाते है॥ ले मशालें...

ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गाँव के

अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के

पूछती है झोपड़ी और पूछते है खेत भी

कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के....

ले मशाले.....

Nitesh: वाह मजा आ गया....

Yogesh: अच्छा अब काफी देर हो गई है.... नेहा को जाने दो..... अब हम Hostel चलते है...

Nitesh: ठीक है....


( Music...)
Nitesh: भैया हम डिनर कहाँ करेंगे?

Yogesh: Mess .....

Nitesh: मैं आपके साथ mess में खा सकता हूँ?

Yogesh: हाँ क्यों नहीं... बस एक गेस्ट कूपन लेना पड़ेगा ...

( Music...)
Nitesh: भैया अब तो मुझे नींद आ रही है....

Yogesh: इतनी जल्दी.... यहाँ तो लोग 12 बजे के बाद सोते है ...

Nitesh: घर की आदत है ना...Yogesh: ठीक है सो जाओ ...
(Aeroplane की आवाज.)

The End

Yogesh Kumar
J-29
RTVJ


Thursday, March 11, 2010

वो पहला डम्मी टॉक-शो.....

( जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान एक बार दो लोगों को 3-4 मिनट का टॉक शो करना था। इसके लिए स्क्रिप्ट लिखने का काम हमनें और हमारी सहपाठी मधुस्मिता ने किया था। बाद में क्लास के सामने परफॉर्म भी किया। टिप्पणी भी सुनने को मिली।)

एंकरः नमस्कार दोस्तों, दीवान-ए-खास कार्यक्रम में आपका स्वागत है। जैसा कि आप सब जानते है कि इस साप्ताहिक कार्यक्रम में हम आपकी मुलाकात एक खास मेहमान से कराते है। तो आइए, आज मिलते है अपने खास मेहमान डॉक्टर चारू दुआ से, जो कि पेशे से एक डायटिशियन है। आइए, इनसे हम जानेंगे आज की पीढ़ी के खान-पान एवं उनसे उनके जीवन में पड़ने वाली असर के विषय में।

एंकरः चारूजी, स्टूडियो में आपका स्वागत है।


चारूः जी, धन्यवाद

एंकरः आज की पीढ़ी फास्ट फूड पर ज्यादा आश्रित हो गयी है, जिसे कि हम जंक फूड के नाम से भी जानते है। इस पर आपकी क्या राय है।


चारूः जी, आपका कहना सही है। आज की पीढ़ी भाग-दौड़ की जिंदगी जीती है, अतः उन्हें सुबह नाश्ते के टेबल से रात के खाने तक के बीच में जो फटाफट तैयार फूड मिलता है, उसे खाती है लेकिन उसमें न्यूट्रीशन का लेवल काफी कम होता है, जिससे उनका पोषण ठीक से नहीं हो पाता है। ये मोटापा और हाई कोलेस्ट्राल का भी कारण बनता है।

एंकरः ये मोटापा और हाई कोलेस्ट्राल आम लोगों के लिए क्या क्या परेशानियाँ लाती है और इनसे कैसे बचा जा सकता है।

चारूः यह मोटापा और हाई कोलेस्ट्राल बीमारियों की जड़ है। इससे छोटी-मोटी बीमारियाँ जैसे थकान, जोड़ों में दर्द से लेकर हार्ट-अटैक जैसी बड़ी बीमारियाँ भी हो सकती है। इसमें हार्ट की नसों में फैट जमा हो जाता है जिससे खून का संचरण ठीक से नहीं हो पाता है, इसी तकलीफ से हार्ट-अटैक हो सकता है, कभी-कभी यह जानलेवा भी हो सकता है। अतः मैं दर्शकों को कम-से-कम ऑयली फूड और ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियाँ खाने की सलाह दूँगी।


एंकरः चारूजी, हमारे स्टूडियो में आने के लिए आपका धन्यवाद

चारूः जी, धन्यवाद

एंकरः तो दोस्तों, ये थी हमारी खास मेहमान चारू दुआ। अगले सप्ताह हम आपकी मुलाकात कराएँगे एक नये मेहमान से... तब तक के लिए हमें इजाजत दीजीए। नमस्कार।

भारत में 'न्यू सिनेमा' की शुरूआत 'भुवन सोम' से

( जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान शनिवार को फिल्म एप्रीशिएसन की क्लास होती थी, उसी में पहली फिल्म भुवन सोम दिखाई गयी थी। उस पर एक आलेख लिख कर लाना था। हमने लिखा, लेकिन शिक्षक महोदय को फिल्म के टेक्नीकल आस्पेक्टस पर टिप्पणी चाहिए थी, जिसे हम नहीं कर पाए थे।)


भारतीय सिने जगत में 'न्यू सिनेमा' की शुरूआत करने वाली फिल्म भुवन सोम वाकई एक कुशल निर्देशन में बनने वाली फिल्म है। मृणाल सेन ने जहाँ इस फिल्म से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी, वहीं हिन्दी सिनेमा को एक नया आयाम प्रदान किया। फिल्म की एक और विशेषता यह है कि निर्देशक मृणाल सेन, कैमरा मैन के के महाजन, अभिनेता उत्पल दत्त व अभिनेत्री सुहासिनी मुले सभी ने पहली बार हिन्दी फिल्म के लिए काम किया और सभी के कुशल कार्य व अभिनय ने इसे एक मील का पत्थर बना दिया।

भय- फिल्म का केंद्र-बिन्दु, जिसका एहसास होने पर भुवन सोम, जिसने अपने चारों ओर अनुशासन की कड़ी दुनिया बना रखी थी, जीवन की सच्चाई से वाकिफ हो जाते है। रेत की वादियों के बीच जब भुवन सोम शौकिया तौर पर शिकार करने जाते है तो वहाँ पर निशाना साधने के क्रम में एक पक्षी बंदूक की गोली से न घायल होकर उसकी आवाज से घायल हो जाता है, तो उसे इस बात का एहसास होता है कि भय से आम जीवन में बातें बिगड़ती ही है और इसके बाद फिल्म में नायक एक स्वच्छंद और उन्मुक्त जीवन जीने को आतुर दिखायी देता है।

फिल्म की एक कड़ी की बात न की जाए तो चर्चा अधूरी रह जाएगी। वह है- भ्रष्टाचार, जिसे कि हम सदियों से अपने समाज में पाते है। यहाँ पर चाय-पानी शब्द का उपयोग किया गया है, जिसके विषय में अभिनेत्री बड़ी मासूमियत से पूछती है कि क्या चाय-पानी का पैसा लेना गलत है क्या इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि भ्रष्टाचार के रूपों से समाज परिचित होते हुए भी अनजान बना रहता है। यहाँ निर्देशक समाज के भ्रष्ट आचरण को दिखाता तो है, लेकिन उसका समाधान नहीं ढूँढ़ता है।



अंततः यह कहा जा सकता है कि जीवन की वास्तविक सच्चाइयों को एक सूत्र में पिरोकर निर्देशक ने इस चलचित्र को एक उत्कृष्टता प्रदान की है।

साइंटून ( SCIENTOON)

( जामिया में ही साइंस राइटिंग वर्कशॉप के दौरान बनाया गया साइंटून = साइंस +कार्टून )

Wednesday, March 10, 2010

चाँद के लिए नयी सवारी

( फीचर के रूप में साइंस राइटिंग वर्कशॉप , जामिया मिल्लिया इसलामिया, सितम्बर 2006 के लिए लिखा गया वैज्ञानिक फीचर।)

आकाश में पंछी को उड़ता देख मानव ने कल्पना की- क्या हम भी उड़ सकते है? तो, इसका जवाब राइट बंधुओं ने हवाई जहाज बनाकर दिया। फिर तो मानव अंतरिक्ष में गया, चाँद पर पहुँचा और अब उससे भी आगे जाने की तैयारी में है। इसके लिए अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने अंतरिक्ष में तथा चाँद पर जाने के लिए एक नयी सवारी बनाने का फैसला किया है। वह नयी सवारी है- ओरिऑन अंतरिक्ष यान


आज से सैंतीस साल पहले जब मानव ने पहली बार चाँद पर पहुँचा, तो उसे नन्हे कदम की संज्ञा दी गयी। तब से लेकर आज तक हम अगला कदम बढ़ाने की तैयारी में जुटे है। मंगल पर जाने की सोच रहे है। उसके लिए हाल में ही नासा ने अत्याधुनिक तकनीक से युक्त एक नया अंतरिक्ष यान बनाने की घोषणा की है। जो कि पिछले यान अपोलो से ज्यादा विकसित होगा। नये अंतरिक्ष यान का नाम ओरिऑन रखा गया है जो कि काफी सोच विचार कर रखा गया है। जिस प्रकार पहले यान अपोलो का संबंध यूनान की पौराणिक कथा से है। इसी प्रकार ओरिऑन का नाम रात में आकाश में चमकने वाले नक्षत्र मंडल ओरिऑन से लिया गया है। इससे पहले साठ के दशक में भी नासा ने इस नाम का उपयोग नाभिकीय अंतरिक्ष यान के संदर्भ में किया था। इस नक्षत्र मंडल के काफी तारे दिशा बताने के लिए उपयोग किये जाते है जिससे कि खोजकर्ता हमें एक नयी दुनिया में ले जाते है।

ओरिऑन अपनी पहली उड़ान 2014 ईंस्वी में करेगा। जिससे अंतरिक्ष यात्री सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक ही जा सकते है। फिर इसके बाद 2020 ईंस्वी तक ओरिऑन द्वारा चाँद पर जाने की योजना है। इसके बाद ही मंगल या दूसरे ग्रहों की तरफ कदम बढ़ाने की बात सोची जा सकती है। तब हमें इस सौर-मंडल के अन्य ग्रहों की नयी दुनिया का पता चल सकेगा।

जून महीने में नासा ने इस कार्यक्रम के तहत विकसित होने वाले प्रक्षेपित यानों यानि लांच वेहकिल का नाम एरिस रखा गया है, जो कि मंगल का दूसरा नाम है। इसे प्रक्षेपित करने वाले बूस्टर का नाम एरिस 1 रखा गया है। एक बड़े भारी प्रक्षेपित हिस्से को एरिस 5 के नाम से जाना जाएगा।

नयी सवारी यानि कि नयी गाड़ी सुनते ही दिमाग में आता है कि जरूर इसमें नयी खूबियाँ भी होंगी। अब एक कार की बात करें, तो लोग कार में ज्यादा से ज्यादा सीट चाहते है और जगह भी। यह खूबियाँ ओरिऑन में भी है। यह अब ज्यादा से ज्यादा अंतरिक्ष यात्रियों को ले जा सकेगा और साथ ही साथ काफी सारा सामान भी। इससे चाँद और मंगल पर जाने में मदद मिलेगी। ओरिऑन का आकार पुराने अंतरिक्ष यानों के समान ही होगा, लेकिन इसमें अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जाएगा। इसका आकार अमेरिका और रूस में उपयोग होने वाले शंक्वाकार अंतरिक्ष यानों की ही भाँति होगा, लेकिन टाइल्स नहीं होंगे। जबकि पुराने ऊष्मारोधी कवच यानि हीट शील्डस और पैराशूटस का उपयोग किया जाएगा।

अभी हाल में ही नासा ने काफी सारी जाँचों को किया है, जिससे कि ओरिऑन अंतरिक्ष यान की डिजाइन को और अच्छा बनाने में मदद मिलेगी। इन जाँचों में मुख्य रूप से पैराशूट का समय पर खुलना आता है। इसके लिए नासा के इंजीनियरों ने अमेरिकी थल सेना के प्रशिक्षण केंद्र पर दो पैराशूट की जाँच की। जाँच के आँकड़ों को संग्रह कर प्रक्षेपास्त्र के प्रथम चरण को विकसित करने में मदद मिलेगी। पैराशूट 8,000 फीट की ऊँचाई से गिराकर जाँच की गई है और यह जाँच 2008 ईंस्वी तक लगातार चलती रहेगी।

ज्योतिष: एक पूर्ण विज्ञान

( यह आलेख जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा सितंबर 2006 में आयोजित साइंस राइटिंग वर्कशॉप में जाने के लिए हमारे संस्थान डिपार्टमेंट ऑफ फिल्म्स एंड टेलीविजन स्टडीज, भारतीय विद्या भवन में निबंध लिखने के लिए पाँच विषय दिए गए थे, उसी में से एक विषय पर लिखा गया था।)

ज्योतिष एक पूर्ण विज्ञान है। इस कथन की सत्यता जानने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि 'ज्योतिष' क्या है और 'विज्ञान' क्या है? पहले हम विज्ञान के विषय में ही चर्चा करें।

'विज्ञान' शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द साइंटिया ( Scientia) से हुई है जिसका अर्थ knowledge होता है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार- "विज्ञान एक व्यवस्थित ज्ञान है जो कि पर्यवेक्षण, तथ्यों की जाँच के पश्चात् ही प्राप्त किया जाता है।" साधारण भाषा में विज्ञान को इस तरह परिभाषित कर सकते है कि यह ज्ञान की वह सतत् प्रक्रिया है जिसमें कुछ सिद्धांत होते है, जो कि उदाहरणों या ठोस प्रमाणों द्वारा सिद्ध किये जाते है और हमें तर्कसंगत निष्कर्ष तक ले जाते है। जिसे एक विशेष द्वारा भी समझा जा सके और एक साधारण व्यक्ति द्वारा भी समझा जा सके। आजकल विज्ञान सिर्फ भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान को ही समझा जाता है, जो कि अनुभव और प्रयोग पर आधारित ज्ञान है। एक तरह से देखा जाए तो समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, इतिहास आदि भी विज्ञान है, लेकिन विज्ञान के हिमायती ऐसा मानने से इंकार करते है।
ज्योतिष की उत्पत्ति दो शब्दों ज्योति और ईश से हुई है। ज्योति का अर्थ- प्रकाश और ईश का अर्थ ईश्वर है अर्थात् ईश्वर का प्रकाश। कई विद्वानों ने उसकी परिभाषा विभिन्न प्रकार से दी है लेकिन यह मुख्य रूप से मानव के जीवन और भविष्य पर ग्रहों और तारों का पड़ने वाला प्रभाव है। ज्योतिष के अनुसार, सूर्य और प्रत्येक ग्रह का मनुष्य, पृथ्वी और जीवों पर अपना एक विशेष प्रभाव होता है। मनुष्य के जन्म के वक्त सूर्य और अन्य ग्रहों की स्थिति के आधार पर ज्योतिषी उस मनुष्य का न केवल भूत,वर्तमान और भविष्य बताने का प्रयास करता है बल्कि उसकी वयक्तिगत विशेषता और गुणों को भी बताता है।

यह एक साधारण सी बात है कि ज्योतिषी ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही मनुष्य के भूत के साथ-ही-साथ भविष्य को भी बताने की कोशिश करते है। यह मुख्य रूप से गणितीय गणना पर आधारित होती है और यह गणितीय गणना वैसे ही विभिन्न प्रकार की होती है जैसे कि एक भौतिक-शास्त्री अपनी बातों को समझाने के लिए विभिन्न गणितीय सूत्रों का सहारा लेता है।

यह भी एक सत्य है कि ज्योतिषी भविष्यवाणी करते वक्त अपनी अंतःप्रज्ञा का भी इस्तेमाल करता है ,जिससे कि भविष्यवाणियां सही हुआ करती है। इस प्रकार, ज्योतिष मुख्य रूप से कारण और प्रभाव की अवधारणा पर आधारित होता है, अतः इसे हम विज्ञान या कला कहे, कोई फर्क नही पड़ता। लेकिन, मनुष्य को अपने जीवन और भविष्य के विषय में जानने की उत्सुकता कम नहीं होती है जो कि इस विशेष ज्ञान अर्थात् ज्योतिष का वर्षों तक टिके रहने का कारण भी है।

यह भी उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर सत्य को सीमित नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसे समझने हेतु हमें दो प्रकार के ज्ञान की चर्चा करनी होगी- .तर्कसंगत ज्ञान 2. सहज बुद्धि। पहला ज्ञान मुख्य रूप से आँकड़ों, तथ्यों और घटनाओं से प्राप्त होता है, जिसका कि वैज्ञानिक आधार भी होता है। लेकिन सहज बुद्धि या अंतःप्रज्ञा मुख्य रूप से सत्य का सीधा आभास कराने से आती है, इसमें बुद्धि या तर्कसंगतता का कोई आधार नहीं होता है। इसे मुख्य रूप से इसे ईश्वरीय वरदान समझा जा सकता है। नास्त्रेदमस एक भौतिक-शास्त्री थे, न कि भविष्यवक्ता, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने अंतःप्रज्ञा के आधार पर ऐतिहासिक भविष्यवाणियाँ की।

उपरोक्त बातों का उल्लेख करने का एक ही मकसद है कि ज्योतिष में भी आँकड़ों का संग्रह किया जाता है, यथा किसी व्यक्ति विशेष की चारित्रिक विशेषता और उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं का अध्ययन ग्रहों की स्थिति और उस व्यक्ति पर ग्रहों के प्रभाव के कारण की जाती है। अगर हमें इस अध्ययन की जरूरत किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की विशेषता या घटनाओं के विषय में जानने के लिए पड़ती है, तो हम इसे कर सकते है। यह एक वैज्ञानिक विधि है, जिसका उपयोग विज्ञान की अन्य शाखाएँ भी करती है।
ज्योतिष चिर काल से चली आ रही विद्या है, जो कि मनुष्य के भविष्य संबंधी प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम है, जो कि विज्ञान की अन्य शाखाओं द्वारा संभव नहीं है। इसके अलावा यह मनुष्य के विश्वास पर आधारित ज्ञान है। ज्योतिष को खगोलशास्त्रीय आधार देकर हमने अपने विश्वासों को और भी आधार प्रदान किया है।

ज्योतिषिय भविष्यवाणियों के संदर्भ में यह प्रश्न उठाया जाता है कि सभी भविष्यवाणी सत्य नहीं होती या एक भविष्य में होने वाली घटना के विषय में विभिन्न ज्योतिषियों की राय भिन्न होती है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि ज्योतिष ज्ञान की विश्वसनीय शाखा नहीं है। वैज्ञानिक सिद्धांत भी समय समय पर नये तथ्यों के आने के पश्चात मामूली रूप से परिवर्तित होते है। वैज्ञानिक सिद्धांत में मामूली से परिवर्तन के लिए गहन अनुसंधान की जरूरत पड़ती है, तो इस प्रकार ज्योतिष में भी गहन अनुसंधान कर नये प्रकार के और ज्यादा सटीक ज्ञान को भी हासिल किया जा सकता है।

लेकिन वैज्ञानिक सोच रखने वाले व्यक्ति क्या इस बात का जवाब दे पाएँगें कि जो भविष्यवाणियां सही हुई, उसके पीछे क्या कारण थे? क्यों वे सत्य हुई? तभी हम उन्हें विज्ञान के विशेषज्ञ या छात्र कह पाएँगे।

यहाँ भारत में परमाणु युग की शुरूआत करने वाले होमी जहाँगीर भाभा का उल्लेख आवश्यक है क्योंकि वह एक महान वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक अच्छे ज्योतिषविद् भी थे और अपने ज्योतिषीय ज्ञान को बढ़ाने के लिए काफी अध्ययन भी किया था। तो क्या, डॉ भाभा की वैज्ञानिक सोच उनके इस विधा के अध्ययन में आड़े आयी?

अंततः निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि विज्ञान ने जिस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित किया है, उसी प्रकार ज्योतिष ने भी हमारे जीवन में काफी हद तक जगह बना रखी है। इसी कारण से अपने देश में विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया है। वह भी ज्योर्तिविज्ञान के रूप में। यह भी एक सत्य है कि कोई भी विद्या अपने आप में पूर्ण नहीं होती, लेकिन वह पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। विज्ञान की अन्य शाखाएं भी ज्योतिष की भाँति पूर्णता या उच्चतम संभव स्थिति की ओर अग्रसर हो रही है। अतः ज्योतिष, विज्ञान की अन्य शाखाओं की ही एक विज्ञान है जो कि मनुष्य की ज्ञान-पिपासा पर आधारित है।

नाम- नितेश कुमार गोयनका
रोल- J-48

Sunday, February 21, 2010

पापा कभी शरीक नहीं होते...

कल मेरा जन्मदिन है, हर साल यह दिन अपने में मेरे लिए खास है। बचपन में कुछ जन्मदिन की यादें है जो घरवालों के द्वारा मनायी जाती, लेकिन शायद ही मुझे याद है कि पापा सक्रिय रुप से शामिल होते। घर में मम्मी और भैया लोग, साथ ही साथ चचेरे भाई-बहन के सहयोग व उनके उत्साह से ही कुछ साल तक जन्मदिन मना होगा। बीच में ग्रेजुएशन के दिनों में व यहाँ से एम ए करने के दौरान बीच में घर जाने पर दोस्तों को मेरी तरफ से पार्टी देना, ऐसे ही कुछ मौके रहेंगे। अगर इस जन्मदिनों में मैं पापा की भागीदारी को टटोलूँ, तो शायद ही कुछ ऐसे मौके मिलेंगे, जिनमें वो एक्टिवली भाग लिए हो। हाँ, लेकिन सान्या के बर्थडे में उनकी भागीदारी गजब की होती थी। दिल्ली में 2006 में 20 जून को आया था, आज मुझे आये तीन साल पूरे हुए। 2006 वाले 21 जून को तो सिर्फ घरवालों का फोन आया था। 2007 में मैं एग्जाम देने के बाद एक कंपनी के मैनेजर बनने के चक्कर में ठीक से बर्थ डे मना ना सका। 2008 में सीएमएस में छोटी सी पार्टी और रात में घर पर अच्छा भोजन के बीच बर्थ डे बीता। पापा की सहभागिता तो 2007 के बाद खत्म हो गयी, लेकिन उनका आशीर्वाद अभी भी साथ बना हुआ है, यह क्या कम है।
( 20 जून 2009 को लिखा गया)

कुछ सुना पाता....

मीडिया का कोर्स अपनी जिद पर मैंने ज्वाइन किया, ज्वाइन कर लेने के बाद अक्टूबर 2006 में घर जाना हुआ बैंक से लोन लेने के सिलसिले में, पापा से वही अंतिम मुलाकात थी, ---- के तहत पूरे एक सवाल के लिए दिल्ली के ताज होटल ने दो पत्र भेजे थे- दोनों केबीच काफी लंबा गैप था,लेकिन पत्र एक जैसे थे। पापा ने पूछा था- बाद वाला लेटर क्यूँ भेजा, मेरी निगाहें अंतर को पहचान ना सकी, तब पापा ने कहा था- क्या पॼकार बनोगे। आज जब सरकार के भोंपू यानि डी डी न्यूज में पैकेजिंग डेस्क पर हूँ तो भी मैं अपने को पत्रकार नहीं मानता अभी भी पॼकार बनने के लिए काफी कुछ सीखने की जरूरत है। कैसे शुरू करूँ, कहाँ से शुरू करूँ, कुछ समझ में नहीं आता। पत्र-पत्रिका में छपा आलेख निश्चय ही ज्यादा सुख देता है। नाम व प्रसिद्धि भी देता है, इसलिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा। वैसे मेरा कोर्स पूरा होने से पहले पाया पापा का हनें छोड़ चले जाना काफी बुरा लगा। जॉब भी शुरू के दिनों में अच्छी नहीं लगी, अब पापा के जाने के पूरे दो साल बाद डी डी न्यूज ज्वाइन किया तो खुशी तो है, लेकिन उतनी नहीं। अभी जिंदगी में बहुत आगे जाना है। कुछ न कुछ इस पत्रकारिता जगत को देना जरूर है, इसी आशा के साथ....... शुभ रात्रि
( 13 जून 2009 को लिखा गया)

पापा के ग्रीटिंग्स कार्डस

एक ग्रीटिंग्स कार्ड बड़े जतन से सँभाल कर रखा गया है पापा के द्वारा या मम्मी के द्वारा- मैं नहीं जानता। लेकिन पापा ने इसे मम्मी को बर्थ डे पर भेजा था या दिया था। कार्ड के नीचे पापा के साइन थे और तारीख थी- 14/03/69- वो आज तक संजोकर रखा गया है। वैसे ही पापा द्वारा हर नए साल पर अपने परिजनों को ग्रीटिंग्स कार्ड भेजना- काफी ही मनोरंजक लगता था, इसी बहाने कम से कम जुड़े तो रहते थे। कुछ दिन के बाद सभी परिवार के सदस्यों के नाम से कुछ संदेश लिखे कार्ड छपवा कर भेजा जाना एक अलग प्रयास था। इन सब बातों से कम से कम हम स्नेल-मेल से भली-भाँति परिचित हो गये थे। अब तो जमाना एकदम बदल गया। रंग-बिरंगे ग्रीटिंग्स की जगह ई-ग्रीटिंग्स ने ले ली और अगर आवश्यक या जरूरी कागजात ना भेजने हो तो ई-मेल से काम चल जाता है। अगर कुछ भेजना ही है तो अब भारतीय डाक विभाग की सेवा के बजाए निजी दस्ती सेवा की अपने चरम पर है। डीटीडीसी, ब्लू डार्ट सो लेकर नए-नए नाम के काफी प्लेयर आ गए। वैसे ग्रीटिंग्स अगर आज भेजना है, तो भी इन्हीं दस्ती सेवा वालों की सेवा लेनी पड़ती है। आमीन।
( 13 मार्च 2009 को लिखा गया)

भोपाल में फिर से

कल यानि स्वतंत्रता दिवस के दिन भोपाल फिर से आना पड़ा, कार्यक्रम एकाएक बना। पापा के जाने के बाद पिछले साल आयी एक समस्या के बाद यह दूसरी समस्या हमारे परिवार के सामने आयी। दुःख या संकट के समय परिवार के साथ खड़ा होना एक महती आवश्यकता होती है। भोपाल में स्वतंत्रता दिन के दिन आकर यहाँ एक स्वतंत्र मस्तिष्क से स्वतंत्र करने की एक अभिलाषा को पूरा किया गया। पापा रहते तो शायद मुझे यहाँ नहीं आना पड़ता। स्थिति अलग होती। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनी और ऑफिस में लगातार तीन दिन छुट्टी होने के कारण भी इस गार्डियन को संपन्न कराने वाले काम को मुझे ही संपन्न कराना पड़ा। बाकी दिन भोपाल के इस फ्लैट की चाहरदीवारी में परतंत्रता से ही गुजरा। आज यानि रक्षा-बंधन के दिन भी एक रूम में कैद पा समय बीता रहा हूँ ताकि रात में 9।30 बजे के करीब ट्रेन पकड़ वापस दिल्ली को रवाना हो जाऊँ। शाम के वक्त 'राज एक्सप्रेस' के कार्यालय जाकर किस प्रकार अखबार का काम होता है वह चीज देखने को मिलेगा यानि कि कुछ समय का सदुपयोग हो सकेगा। पिछली बार भी पापा की अनुपस्थिति में आना पड़ा और उसके पिछले बार आए थे तो जाने के बाद समस्या खड़ी हुई थी। इसबार ऐसा कुछ नहीं होगा। आमीन।
( 16 अगस्त 2008 को लिखा गया)

Wednesday, February 17, 2010

पापा के सवाल

एकाएक पापा के सभी सवाल दिमाग में आ गए जो उन्होंने बड़ी भाभी से किए थे, जब पापा और हम भाभी को देखने के लिए गए थे क्योंकि बड़ी भाभी ने उन सभी सवालों को नीरज भैया के लिए जो लड़की फिक्स की गयी, उनसे पूछने को कहा। और इस क्रम में मैंने भी टेलीफोन से ही पचास मिनट का लंबा, चौड़ा इंटरव्यू ले डाला। पापा के सवाल तो थे ही, मैंने अपनी तरफ से भी काफी सवाल पूछ लिए। बी.एस.सी. बॉटनी की छात्रा थी, इसलिए कुछ बॉटनी का इंटर का ज्ञान भी हमें काम आ गया। पापा ने सवालों के अलावा अंग्रेजी व हिन्दी में लिखाकर भी देखा था, वह काम मेरे दिमाग में है, इन फ्यूचर कहीं पॉसिबल हो सके, तो वो भी संभव हो जाएगा। मेरे द्वारा लिए जा रहे इंटरव्यू के दौरान उनके द्वारा कहा गया कि अरे इतना सवाल तो लोग हमें देखने आए तो भी नहीं किये, तो मैंने कहा अभी तो ये शुरूआत है, अभी बीच तो आने दीजीए, फिर बातें खत्म होगी। इंटरव्यू लेने वाला इंटरव्यू लेते लेते परेशान था और देने वाला देते-देते। बड़ी भाभी की जिद पर इंटरव्यू लिया गया। पापा के प्रश्नों का उन्होंने भी बखूबी जवाब दिया था, सवालों की भी खूब तारीफ हुई थी। अंततः वही सब सवाल मेरे जेहन में उभरे और मैंने अपनी नयी भाभी से पूछ डाले। कुल मिलाकर अच्छा इंटरव्यू रहा।
( 8 जुलाई 2008 को लिखा गया)

सपनों से भी नदारद

काफी दिनों के बाद कुछ बातें लिख रहा हूँ पापा से रिलेटेड। पापा के जाने के बाद शुरूआत के दिनों में सपनों में पापा को देखना काफी अच्छा लगता था, वो बात करते हुए दिखायी देते या हमसे ही बात करते हुए दिखते। उनकी आवाज गूँजती हुई हर सपने में दिखायी देती। एक बार तो पूरा चेहरा दिखायी दिया, इन सब बातों की चर्चा मैं फोन पर मम्मा से किया करता था। एक भावनात्मक लगाव के कारण जाने के बाद पापा का सपनों में आना सामान्य सी बात हो सकती है, लेकिन इधर काफी दिनों से एकबार भी दिखायी नहीं दिये। सपनों में आजकल घर या घर से जुड़े लोग ज्यादा दिखायी दे रहे है। कुछ गलत भी घटित हो रहा है,इसलिए सपने मुझे बार-बार आगाह कर जाते है। सपनों का जिक्र करने के बाद वो तो एकाएक गायब ही हो जाते है। कभी-कभी इसे अच्छा माना जाता है, लेकिन कभी-कभी यह सही नहीं समझा जा सकता है। अगर इससे किसी चीज का पूर्वाभास हो जाता है तो यह वाकई अच्छा संदेश है। एक तरह से पिताजी का सपनों में ना आना... ऐसा लगता है, वे हमसे काफी दूर चले जा रहे है। जीवन की आपाधापी को सहजता से स्वीकार करते हुए काफी कुछ सीखने वाले पापा की याद जिंदगी भर बनी रहेगी, ये कभी दूर नहीं होने देगी, यकीन है।
( 13 जून 2008 को लिखा गया)

Tuesday, February 16, 2010

आज 4 फरवरी है....

आज के ही दिन पिताजी से पिछले बार बात हुई थी और अपनी भतीजी के कहने पर ही मैंने 'हैप्पी बर्थडे' पापा को बोला था। तब पापा का रिएक्शन आया- सान्या सिखाएगी और तुम बोलोगे। हमें क्या पता था, यह अंतिम बार ही कहना होगा। इसका जिक्र इसी डायरी में पहले भी कर चुका हूँ लेकिन पापा के ना रहने के बाद पहली बार 4 फरवरी पर अब उनकी सिर्फ यादें ही है। आज शाम में जैसे ही 8।30 वाला ऑल इंडिया रेडियो का समाचार सुना कि घर से फोन आया। मैं भी बात करने को इच्छुक था। घर से ही फोन आ गया, चलो अच्छा हुआ। मम्मी से मैंने पिछले साल वाली घटना का जिक्र किया, मैंने इस सेंस में किया कि कुछ इसका उल्टा असर ना पड़े। लेकिन हल्का सा असर पड़ा ही। फोन पर सान्या और इश्रित की बातें ज्यादा सुनने को मिली। सान्या को अपने टीचर रखे जाने की खुशी थी, इस बात की सूचना उसने दूसरे बार फोन कर के दिया। सान्या से ही पिछले बार सुनने को मिला कि आप बाबा को हैप्पी बर्थडे बोले। अभी भी बात करने को वही ज्यादा उत्सुक रहती है, उसी के कहने के कारण बाबा को कह पाए थे, नहीं तो अंतिम बार कह रहे है यह एहसास भी नहीं था। ऐसा सोचा ही कैसा जाया जा सकता है। वन्स अगेन फादर, वेह्अर यू आर, यू आर स्टिल ऑवर हीरो एंड वी सेलेब्रेट योर बर्थडे विद् ग्रेट फॅरवर।
( 4 फरवरी 2008 को लिखा गया)

लम्हें कम नहीं

पापा के साथ बिताए गए लम्हों की कोई गिनती नहीं, लेकिन जब इनको कलमबद्ध करने की सोचता हूँ तो लगता है कि यह संभव नहीं... क्योंकि वो एक एक लम्हें जो पापा के साथ बिताए.. एक तरह से मेमोरी में है भी, नहीं भी। आँखों के सामने जितनी तेजी से आते है, उतनी तेजी से ओझल भी हो जाते है। वैसे लम्हें स्मृति में ज्यादा अंकित है, जिसमें किसी बात पर हमारी उनसे सहमति नहीं हो या जिसमें मुझे डाँटा गया हो। लेकिन आज ना डाँटने वाला कोई है ना किसी से वैसी असहमति बन पाती है। पिता-पुत्र के स्तर पर बातों की सहमति और असहमति का अलग मतलब और महत्व होता है। दिल्ली से एम.ए. करने के बाद लौटने पर वापस नहीं आने का कोई रास्ता नहीं बन पाया, यहाँ तक कि रिजल्ट भी एक साल बाद लेने दिल्ली आया था। उसी दौरान तिमारपुर में मैं जहाँ रहता था, वहाँ के भैया के यहाँ से सामान हटाने के मसले में हुई देरी में मानेटरी लॉस जो हुआ सो हुआ ही लेकिन एक प्रेशर बना रहा। एक लापरवाही की हद तक मैंने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। बाद में ऐसी स्थिति का सामना करना ही पड़ा जो कि नहीं आनी चाहिए थी। छोटा भाई, जो दिल्ली में रहता था, वो भी सामान नहीं निकाला। बाद में उन सामानों में से मैंने बहुत कुछ खोया भी।

Monday, February 15, 2010

पेंसिल नहीं लीड से लिखेंगे

स्कूल में पढ़ने के दौरान तीसरी कक्षा तक पेंसिल से हमें लिखना पड़ता था, पर जैसे ही चौथी कक्षा में आना होता, तो बड़ों की तरह कलम/लीड/पेन से लिखने की स्वतंत्रता हमें भी होती। बस, इसी बात का उत्साह था कि हम भी कलम से लिखेंगे। दिसंबर के अंत में पापाजी के साथ रिक्शा पर बैठकर जाना हुआ था कलम खरीदने के लिए। तब बाटा के सामने रामनाथ चाचा की दूकान हुआ करती थी - 'जरूरत', वहीं पर पहुँचे। कलम की बात तो रिक्शे पर जाने के वक्त से हुई , वहाँ दूकान पर पहुँचकर पापा ने इसकी चर्चा अपने दोस्तों से की। कलम वहाँ से लिये कि या किसी और जगह से, ये तो ध्यान नहीं लेकिन कलम ली गयी थी। अरे .... भाई आखिरकार बच्चे थोड़े ही रहे थे, जो कि पेंसिल से लिखो, गलती हुई रबड़ से मिटाओ। कटर से छीलो। माने इन सभी चीजों से एक साथ छुट्टी। बड़े होने का एहसास हुआ, लेकिन इतना भी नहीं कि बहुत बड़े हो गये। घर पर लौटा होऊँगा, सभी को दिखाया होऊँगा। काफी खुश था, ये तो मुझे याद है, बाकी आगे-पीछे की बातें ध्यान नहीं है। वो भी एक पल थे... जब पापा ने मेरी भावना को समझा... एक पेंसिल से कलम के परिवर्तन को महत्व दे स्वयं साथ लेकर गए और कलम दी थी नन्हें हाथों में।

Sunday, February 14, 2010

कुछ पुरानी बातें भी हो जाएँ..

पापा के साथ जुड़ी हुई कुछ पुरानी बातें भी हो जाएं तो यह एक सच्ची ॽद्धांजलि होगी। सबसे पुरानी बात की जाए तो अभी तो एक थप्पड़ का ख्याल आ रहा है जो कि 2 अप्रैल 1988 को पापा ने मुझे रसीदा था। इससे पहले पापा ने कभी भी मुझपर गुस्सा नहीं किया था। बात कुछ यूँ थी कि मैं कोर्ट बाजार वाले घर में एक बार एक लोटा पानी बाहर के कल से ला रहा था तो रास्ते में एक छात्र जो वहीं रहा करता था, ने पानी माँगा, मैंने देने के बजाए पानी वहीं गिरा दिया और लौटा। इसी बीच पापा कहीं से आए और गुस्से में पहले से ही थे, मेरी बात जानकर मुझपर ही गुस्सा निकाल दिये। पानी न देने के कारण मुझे पहली बार मार खाना पड़ी। मेरे को इससे पहले कभी भी मार नहीं पड़ी थी, इसलिए तारीख मेरे दिमाग पर उत्कीर्ण हो गयी। उस समय यह सोचने समझने की शक्ति नहीं थी कि क्यों मारा? ऐसा क्यों हुआ? बस मारा, ये चीज थ्यान में रह गयी। इस खट्टे-मीठे अनुभव को यादकर यह बात हमेशा दिमाग में कचोटती है क्यों नहीं उनका और लंबा साथ मिला। यूँ तो बीच-बीच में कई बार गुस्से का शिकार होना पड़ा, लेकिन उसमें कुछ मेरा ही दोष रहा करता था, लेकिन मैं ये मानने को तैयार नहीं होता।

जब चला दिल्ली मास कॉम का कोर्स करने......

एम.ए. करने के तीन साल बाद फिर दिल्ली जाकर मास कम्युनिकेशन करने का मौका बना। भिन्न-भिन्न एन.जी.ओ. में कामकर के 20-22 हजार रूपये स्टेट बैंक में जमा कर लिए थे और ए.टी.एम. कार्ड साथ था। पिछली बार ऐसी सुविधा ना थी। सभी कार्यक्रम गुपचुप बन गया था। पापा को इसकी जानकारी थी कि मुझे पता नहीं। 19 जून '06 की यात्रा थी नरकटियागंज से, इसलिए सुबह छह बजे वाली ट्रेन पकड़नी थी। मैं सुबह उठकर तैयार होने के क्रम में लगा, इसी बीच पापा जो कि आठ-नौ बजे से पहले कभी उठते नहीं वे सुबह छह-सवा छह बजे उठकर आगे गेस्ट रूम में लैपटॉप पर अपने ताश के गेम्स खेल रहे थे। मुझे ये डर था कि बता दूँगा, तो जाने की परमिशन नहीं मिलेगी,इसलिए सूटकेश भी तैयार कर बिछावन के पीछे छिपाकर रखा था। सब तैयार होने के बाद जब जाने को हुआ क्योंकि अब पापा के सामने से ही जाना था, तो पापा ने पूछा, तो मैंने बताया ऐसे ऐसे दिल्ली जा रहा है और एक दोस्त जिसके यहाँ जा रहे है उसका नंबर और अपना बैंक एकाउंट नंबर खर्चें वाली कॉपी में लिख दिया है। संपर्क करना और पैसा भेजने के तरीके की जानकारी दे दी। पापा ने कहा- ठीक है। उस दिन को याद करके यह समझ में आता है कि उनसे कुछ भी छिपा नहीं था, आज भी कुछ छिपा नहीं होगा। सब कुछ उनके सामने ही तो घटित हो रहा है, ऐसा मानना है।

वे अंतिम क्षण.......

पढ़ाई के दौरान अक्तूबर'06 महीने में घर से पापा का कॉल आया कि बैंक मैनेजर तुमसे मिलने के बाद ही लोन के कागज पर आगे कार्रवाई करेगा, अतः तुमको यहाँ पर आना पड़ेगा। मैंने काफी असमर्थता जतायी, पढ़ाई का हवाला दिया, लेकिन जाना जरूरी था, इसलिए दीवाली के कुछ दिन पहले का कार्यक्रम बना। तीन-चार दिन के लिए जाना हुआ, दीवाली भी कार्यक्रम में शामिल था। इसी बीच एक दिन पापा को RTI की सूचना के तहत मिलने वाले जवाबों में ताज होटल ने एक बार फिर से RTI की सूचना के तहत माँगे गए सवाल का जवाब भेजा। दोनों पत्र दिखाते हुए बोले बताओ क्या अंतर है...मैंने गौर से पत्रों को देखा लेकिन मुझे तारीख में अंतर के सिवा कुछ भी नजर नहीं आया। पापा ने कहा तो फिर उसे दुबारा जवाब भेजने की जरूरत क्या थी। मैं भी सोच में पड़ा, लेकिन पत्र पर डाली गयी सरसरी निगाह से कोई जवाब नहीं बन पा रहा था। दरअसल, लालू प्रसाद ने अपनी बेटी के शादी में ताज होटल में 19 लाख रूपये पेड किए थे और पहले पत्र में लालू यादव'स मैरिज लिखा था जबकि दूसरे पत्र में लालू यादव'स डटर मैरिज लिखा था। पापा का इस पर कमेंट था - क्या जर्नलिस्ट बनोगे। अभी वो बात सोचता हूँ तो हँसी आ जाती है कि एक छोटी सी गलती न पकड़ सका।

अंतिम फोन की बातें भी ध्यान नहीं

यूँ तो जनवरी से मार्च तक आठ-दस दिन के अंतराल पर पापा से बातें हो जाया करती थी, लेकिन बात का बिंदु हमेशा एक ही हुआ करता था.... और सब ठीक है। पैसा भेज दे क्या? या कभी कभी यह बताने के लिए फोन किया करते थे कि तुम्हारे एकाउंट में इतना पैसा डाल दिये है, चेक किया क्या? मार्च के अंत में कभी बात हुई होगी। अप्रैल में 8 को बड़े भैया से बात हुई जो पापा के साथ पटना गये हुए थे। मैंने घर पर मिस कॉल की और नीरज भैया के फोन पर भी। घर से मम्मी का कॉल पहले आ गया, जिससे पता चला कि पापा नीरज भैया के साथ पटना गये है कोई केस के सिलसिले में। अंतिम दिनों में विश्वविद्यालय के खिलाफ काफी RTI के तहत सूचनाएं माँगी थी। विवि प्रशासन भी नाराज था। तभी पटना के लैंडलाइन के नंबर से कॉल आया, मैंने मम्मा को फोन रखने को कहा, फिर इधर बात की, नीरज भैया से बात हुई तो मैंने यहाँ के डेवलपमेंट के बारे में बताया, ऐसे ऐसे लोकसभा टीवी के लिए इंटर्न के लिए इंटरव्यू देकर आए हैं। मैं समझा कि वे कहीं बाहर से बात कर रहे है। लेकिन मुझे क्या पता था कि वे ए.के.गुप्ता के फोन से बात कर रहे थे और पापा वहीं थे। अगर उस वक्त पापाजी से बात हो जाती तो वह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात होती, होनी में कुछ और लिखा था।
(18 जनवरी 2008 को लिखा गया।)

शादी फिर जन्म...

अंग्रेजी तारीखों का भी अच्छा खासा प्रभाव हो गया हम भारतीयों पर। अपनी तिथि तो कब की भूला चुके है हम। बर्थडेट, एनिवरसरी, सब अब अंग्रेजी डेट के अनुसार ही मनाए जाते है और समझे भी जाते है। चलो अंतर्राष्ट्रीय मानक है अतः हम भी विरोध नहीं करते। पापा का जन्मदिन 4 फरवरी को पड़ता है जबकि उनकी शादी की डेट 3 फरवरी 1969 थी यानि कि जन्म से पहले ही शादी। सान्या को जब समझ आयी तो वह अपने दादाजी को विश करती लेकिन कहती जरूर... बाबा आपकी शादी पहले फिर जन्मदिन बाद में ...उसकी मम्मी ने सिखाया था। ये चीजे भी पापा के जिंदगी में यूनीक ही रहा। हमारे लिए तो दो दिन पार्टी हो जाती। भाभी को लगातार दो दिन केक बनाने के लिए मैं कहता और पापा के हाथ ही दोनों दिनों के केक कटवाया जाता। सान्या इस सबमें आगे रहती थी। हमें तो दो दिन केक खाने को मिल जाता। इस साल मैंने जब पापा को फोन पर हैप्पी बर्थडे कहा तो पापा ने कहा कि "सान्या सिखलायेगी तब तुम कहो।" चूँकि सान्या ने मुझसे पहले पूछा कि बाबा को विश किए क्या? क्या पता था कि आखिरी बर्थडे था उनका।

2006 की दिवाली पर

संयोग से 2006 की दिवाली पापा के साथ मैं मना सका। यह उनकी आखिरी दीवाली होगी हममें से किसी भी न सोचा था। मैं अपने कोर्स के दौरान घर न जाने की ठान रखा था लेकिन बैंक के लोन को पास कराने के लिए मेरा वहाँ जाना निहायत ही जरूरी हो गया। बैंक मैनेजर भी दीवाली से पहले ही मुझसे मिलना चाह रहा था। मन मार के मैंने प्रोग्राम बनाया। घर जाना हुआ। मेरा बैंक वाला काम हुआ। मैनें दीवाली के अगले दिन का रिटर्निंग टिकट भी बना रखा था क्योंकि ंमंथली टेस्ट मुझे देना था। दीवाली पर मेरे घर पहुँचने से रौनक भी बढ़ गयी ( शायद मुझे ऐसा लगता है, वैसे घर वाले आपको बेहतर बताएंगे)। दीवाली काफी अच्छे से मनायी। घर वालों के साथ दीवाली या होली मनाना ... दिल्ली में रहने वाले छात्रों के लिए एक गेट-टूगेदर जैसा होता है। दीवाली में रंगोली,पकवान,फिर अगले दिन सब के घर जाकर धोख खाना अच्छा-सा लगता है। पापा के साथ अंतिम दीवाली मनायी... काफी अच्छा रहा। पापा के द्वारा किया गया लक्ष्मी-गणेश पूजन अलग ही होता था.. इसकी कमी आने वाले वर्षों में काफी खलेगी।

क्यूँ लिख रहा हूँ यह सब...

कभी-कभी मन में यह ख्याल आता है कि मैं इन बातों को क्यूँ डायरी पर लिख रहा हूँ। पहले मैं लिखने की परिस्थितियों को बता देता हूँ। दिल्ली में मैं यहाँ टीवी पत्रकारिता का कोर्स कर चुका हूँ.. नौकरी की तलाश है। एक ऐसे ही स्ट्रगल का दौर चल रहा है और एकाकीपन खल रहा है। डायरी लिखने की आदत रही है। नियमित रूप से तो नहीं लेकिन '96 से अब तक टूटी श्रृंखला के रूप में कितनी डायरी के पन्नों में उल-जलूल लिख चुका हूँ। फिर मुझे इससे इतना प्रेम हो गया कि मैं संबोधन में भी प्रिय दैनंदिनी लिखा करता था। ये डायरी मूल रूप से मेरे अंदर चल रही बातों को लिखने का जरिया है और साथ ही एकाकीपन को भरने का भी। पिताजी का जाने का, वह भी आसमयिक, काफी दुख हुआ। उनकी स्मृतियाँ, उनके अतीत की बातों को सहेज के रखने का यह एक उचित जरिया लगा। साथ ही पिताजी की याद आने पर उनके विषय में इन पन्नों पर उनकी बातों और मेरे अंदर हो रहे उथल-पुथल को पन्नों पर लाना एक सुकून देता है। शायद ही मैं इन बातों को पढूँ,क्योंकि मैं इन्हें महसूस करते हुए लिख रहा हूँ, जो कि जीवन भर मेरे जेहन में रहेगा।

पापा का गुस्सा

"पापा को गुस्सा क्यों आता हैं?" - घर के सभी लोग इस बात से परेशान रहते थे। इसका साधारण-सा जवाब था- पापा को सभी काम तरीके से चाहिए होता था, खुद भी प्रैक्टिकल आदमी थे। कभी कुछ चीजों के इधर से उधर रखने पर, काम समय पर ना होने पर या किसी के झूठ बोलने पर - कमोबेश इन्हीं परिस्थितियों में उन्हें गुस्सा आता था। जो जायज भी था। हम पर भी कितनी बार गुस्सा हुए। एक बार सन् 88 में एक थप्पड़ भी जड़ दिया था। दो अप्रैल का दिन था मैं जनता टॉकीज के सामने लगे कल से एक लोटे में पीने का पानी लेकर आ रहा था। रास्ते में मेरे ही मकान मालिक के घर में रहने वाले एक स्टूडेंट ने पानी माँगा, मैंने गुस्से में पानी गिरा दिया और रोते-रोते घर पहुँचा, इसी बात पर गुस्सा होकर एक चाँटा मारा। क्योंकि मैं उनके कोप से बचते चले आ रहा था। लेकिन फिर भी उनके गुस्से का शिकार हो ही गया। फिर कितनी बार मुझ पर गुस्सा हुए होंगे लेकिन हाथ नहीं उठाया। हाँ, हाल में 2 मार्च 2006 को शायद हाथ छोड़ा था.. मैं इसका जिक्र किसी गलत भाव से नहीं कर रहा बल्कि उनका तो मुझ पर पूरा अधिकार था.. गुस्सा निकालना भी जरूरी था मुझ पर... नहीं तो इसका भी अनुमान नहीं ले पाते।

तुलसी मिक्स

जिंदगी में किसी न किसी चीज की लत रहती ही है आदमी को। शुरूआत के दिनों में पापा के लिए पान लाना हमारी दिनचर्या में शामिल था जर्दा थोड़ा सा लेते थे। ये आदत काफी दिनों तक बनी रही जब तक बाजार में पान पराग का गुटखा नहीं आया। बाजार में पान-पराग का मार्केट तो था ही लेकिन पान-पराग का गुटखा उतना नहीं चला। गपशप,मधु इत्यादि शुरूआती दिनों के घटिया क्वालिटी के गुटखे थे। इसी बीच तुलसी मिक्स नाम का गुटखा आया। बेहतरीन क्वालिटी का होने के कारण कम दिनों में ही इसने मार्केट में साख बना ली। पापा का भी परिचय हुआ इस पुड़िया से। फिर क्या था सिलसिला ही शुरू हो गया। टी एम संक्षिप्त नाम से पुकारते। मैं तो जहर की पुड़िया कहने से बाज नहीं आता। मार्केट में शार्टेज की स्थिति में पाउचों का एक पैकेट ही घर पर होलसेलर से मँगा लेते। इधर के दिनों में चार पुड़िया (दस रूपये की) निश्चित रूप से मैं सब्जी के साथ लाता। नहीं तो मंडलजी लेकर आते। घर के खर्चें की कॉपी में इंटरटेनमेंट वाले खाने में 10.00 टी एम नियमित रूप से सब तारीखों के आगे लिखा होता। इसने भी कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभायी होगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

कुछ एड् जो मुझे खटकते है.....

मास्टरकार्ड का एक एड् जिसमें एक बेटा अपने पैरेंटस को पहली विदेश यात्रा पर बुलाता है, लक्जरी कार में बैठाता है और एम्यूजमेंट पार्ट में अपने पैरेंटस को बच्चों सरीखी हंसी करते हुए रॉलर कॉस्टर पर देखता है। एक एड् यह और दूसरा LIC का एड् जिसमें एक नौजवान अपने बचपन को याद करता है उसमें फ्लैशबैक में यह दिखाया जाता है कि कैसे उसका पिता बचपन में एक पार्टीशन देकर बेटे के लिए रूम के भीतर उसके लिए एक रूम बनाता है। वही बेटा बड़े शहर में अपने माता-पिता को नये घर बुलाता है। पिता द्वारा लाया गया एक गिफ्ट, नेमप्लेट, जिस पर बेटे का नाम अंकित रहता है। तो बेटा कहता है- इसकी कोई जरूरत नहीं.... दरअसल घर के आगे वेंकट राव ( पिता के नाम की पट्टी) लगी रहती है। ऐसे कुछ एड्वर्टिजमेंट देखकर दिल के किसी कोने में टीस सी उठती है कि अपने जीवन में पिताजी ने तो काफी कुछ किया लेकिन हम उनके लिए कुछ नहीं कर सके। कुछ सपने हमने भी संजोए थे कि पापा को कुछ दे सकूँ लेकिन जिंदगी भर किसी का एहसान न लेते हुए हम सबको छोड़ चले। इस बात का इतना मलाल रहेगा, इस जिंदगी में तो क्या, आने वाली जिंदगियों में भी मैं इस बोझ से दबा रहूँगा। वैसे भगवान कुछ करता है तो उसके पीछे भी कोई बात होगी।

पापा और क्रिकेट

क्रिकेट से पुराना नाता रहा पापा का। सीतामढ़ी डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एशोसिएशन से जुड़े थे। घर में काफी सारी फोटो थी क्रिकेट के मैदान की या एसडीसीए के किसी समारोह की। लेकिन यहाँ जिक्र मैं उस रूप से नहीं कर रहा बल्कि इस रूप में कर रहा हूँ कि टेलीविजन के सामने एक दर्शक के रूप में काफी नजदीक से देखा है। भारत का कोई भी मैच हो काफी तन्मयता से देखते। घर में हमें भी इस बहाने देर तक क्रिकेट देखने की छूट थी। वन-डे मैचों में तो कलर टीवी, अगर बिजली जाने के स्थिति में काम ना करे, तो ब्लैक एंड व्हाइट के लिए 12 वोल्ट की एक बैट्री पहले से ही बुक करा देते थे। मैच का इतना शौक था कि '70-72 से '88-90 तक वेस्टइंडीज में होने वाले मैचों को रात-रात भर रेडियो पर कमेंट्री के रूप में सुना करते थे, वो अलग बात है कि इससे मम्मी के नींद में खलल पड़ता था, लेकिन वो कुछ नहीं बोलती। इधर, विश्व कप 2007 के दौरान भारत का पहले राउंड में ही बाहर होना उन्हें काफी खला होगा। वर्ल्ड कप के दौरान ही उनका भी जिंदगी की दौर से एकाएक रन आउट हो जाना हमारे लिए किसी सदमे से कम। दसियों एडिशन वर्ल्ड कप के होंगे लेकिन पापा का कोई जोड़ नहीं।

मंडलजी...

परिवार के एक सदस्य के रूप में मंडलजी ने काफी कम दिनों में अपना स्थान बना लिया। पापा का पेटेंट रिक्शेवाले के रूप में मंडलजी को लगभग कॉलेज, दूकान और बाकी उन जगहों पर पापा जहाँ-जहाँ जाते, सभी पहचानते थे। सुबह कॉलेज जाना हो तब या शाम में बाजार जाना हो पापा को..... मंडलजी रिक्शा लेकर हाजिर। उनके बिना तो पापा को कही जाना भी मुश्किल लगता था। कभी लेट हो जाने पर काफी गुस्सा आता... लेकिन कुछ बोलते नहीं। ऐसा नहीं है कि किसी और रिक्शेवाले से काम नहीं चलता ... लेकिन घर की गली इतनी लंबी थी कि वहाँ से निकलना ही थोड़ा मुश्किल होता। वैसे मंडलजी को भी रिक्शा लगाने के लिए घर के आगे सड़क पर लगा देते। और उनके दिन की शुरूआत पापा के कॉलेज जाने से ही होती। एक पूरक बन गए थे। पापा द्वारा भाड़ा के रूप में भी अच्छा पैसा मंडलजी को मिलता, जिसका मैं काफी विरोध करता। लेकिन पापा के अंतिम समय में (काम के वक्त) इस व्यक्ति ने जितना काम किया... उतना अन्य कोई ने नहीं किया। एक ऋण चुकाया रामअनेकजी ने ( मंडलजी का नाम).

सान्या, पापा और मैं

रात में सोने से पूर्व पापा पैर दबवाते थे.. कभी मन से तो कभी अनिच्छा से पैर दबाता था, लेकिन जब से सान्या, पापा और मैं रात में सोने से पहले पापा के रुम में रहते तो सान्या को कहानी सुनने की आदत थी। पापा फिर कहानी सुनाते... राजा-रानी की नहीं बल्कि सान्या की ही। कैसे हम फलां दिन रिक्शे से.. ( मंडलजी का रिक्शा) बाजार में हम यहाँ गये, हमनें ये किया, हमने वो किया। इस तरह सान्या भी कहानी सुनकर अपने को इस घटना से रिलेट करती और काफी खुश होती। चूँकि कहानी सच्ची होती और कई बार हम भी साथ में हुआ करते तो हम भी कुछ जोड़ देते और सान्या की हाँ-हाँ चलती रहती। इसी बीच मेरे द्वारा पापा का पैर दबाने का काम चलते रहता था। रात के वक्त बिताए गए पल अब कहाँ मय्यस्सर होने वाले। सान्या को कहानी सुनाने के वक्त एक बात तो स्पष्ट होती थी कि पापा का फिक्शन में कभी भी इंटरेस्ट नहीं रहा। नॉन-फिक्शन में ही हमेशा विश्वास रहा और अंत समय तक इसी पर कायम रहे। नॉन-फिक्शन से आप अपने को रिलेट जो कर लेते हो।

एक लेखक भी

हाल के वर्षों में दैनिक जागरण अखबार में कसौटी सप्लीमेंट में किसी एक मुद्दे पर देश के अग्रणी लेखकों का मत चार पन्नों पर देखने को मिलता, पाठकों की चिठ्ठियाँ भी उन लेखों का मूल्यांकन करती। इसी सप्लीमेंट में पिताजी द्वारा एक लेख भेजा गया जो कि छपा भी और दैनिक जागरण समूह ने अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए कि आपके लेख के लिए जो पाँच सौ रूपये भेजे जा रहे है वह कम हैं फिर भी आप हमारी इस तुच्छ भेंट को स्वीकार करेंगे - पाँच सौ का चेक भी भेजा। पैसा उतना महत्व नहीं रखता लेकिन अखबार में आलेख के रूप में तीन-चार बार पापा का आलेख निकलना- हमारे लिए गर्व का विषय था। एक बार प्रो. निर्मल गोयनका व एक बार एन.के.गोयनका के नाम से लेख छपा। फिर लेखक का कुछ शब्दों में दिया जाने वाला परिचय भी भिन्न रहा करता था। लेख पर पाठकों की टिप्पणी पापा को काफी पसंद थी क्योंकि लेख की प्रशंसा हो रही हो या लेख को सराहनीय माना जा रहा हो। पापा से ज्यादा हमें इंतजार रहता था शुक्रवार को दैनिक जागरण का। पापा को भी रहता लेकिन वे अगले अंकों में छपने वाले विषय के लिए.......

Friday, February 12, 2010

एक प्रेस रिपोर्टर की रिपोर्ट

सत्तर के शुरूआती वर्ष में पापा के हाथ की कलम समाचार एजेंसियों भाषा व हिंदुस्तान समाचार जैसी एजेंसियों के लिए चला करती थी। उस समय के भी कुछ गाथाएँ पापा ने कभी हमसे शेयर की थी। डी एम तक को डरना पड़ता था। प्रेस क्लब के लिए सीतामढ़ी के प्रेस रिपोर्टरों की फोटो में साइड में बैठे पापा की तस्वीर अभी तक स्मृति में अंकित है। उस रिपोर्टर का जीन ही अभी मुझे कलम चलाने को मजबूर कर रहा है। कहा जाता है ना कि उसके पिता का पेशा बेटे की जीन में होता है वही बात है। इसी का असर है कि कुछ पढ़ लिख लेते है। नहीं तो कहा संभव था यह फील्ड चुनना। कहाँ से कैसे इस फील्ड में आ गये.. पता ही नहीं चला।
पापा के समय रिपोर्टिंग और काफी चीजें शेयर करने का ऑरिजनल समय तो अब आया था। कुछ वो बताते कुछ हम बताते। ये बात तो निश्चित ही थी कि दोनों समय की रिपोर्टिंग में काफी अंतर है लेकिन रिपोर्टिंग तो रिपोर्टिंग होती है। प्रिंट मीडिया ही सारा का सारा ब्राडकास्ट में आ रहा है.. तब हम जैसे लोगों की क्या स्थिति होगी.. समझ सकते है।

काफी कुछ लिखूँ....

एक अदम्य इच्छा कि पापा के बारे में काफी कुछ लिखूँ- इसी का परिणाम है डायरी। शुरूआती पृष्ठों में भृगु संहिता में पापा के विषय में लिखी बात कलम से उतरती चली गयी जो कि अच्छा संकेत नहीं है फिर भी ऐसी मनःस्थिति में शुरूआत के पन्ने लिखे गये जिसकी कल्पना एक भुक्तभोगी ही कर सकता है। जिंदगी के कितने उतार-चढ़ाव के साक्षी पापा से काफी कुछ सीखने को मिला। शारीरिक रूप से जन्म देने वाले पिताजी से से मानसिक रूप से काफी कुछ पढ़ने लिखने जानने को मिला। जन्म से लेकर आज तक खिलौनों से कफी पाला पड़ा ही नहीं- जब से होश संभाला अपने को दो-चार अखबारों व दो दर्जन मैंगजीनों के बीच पाया। पढ़ने का वातावरण था क्यों ना कहानी की ही किताब पढ़े। चंदामामा,नंदन, गुड़िया,नन्हे सम्राट न जाने कब साप्ताहिक हिन्दुस्तान, रविवार,माया में बदल गये। अंग्रेजी अखबार पढ़ते-पढ़ते कब अंग्रेजी समझ में आ गयी... पता ही नहीं चला। मानसिक रूप से तैयार करने में इतना योगदान देने वाले के विषय में अपनी कलम भी ना चलाऊं तो अपने प्रोफेशन पर भी हमें शर्म आएगी। काफी कुछ लिखूँगा.. यही ध्येय है।

एक दैवीय तेज

3 अगस्त के स्वप्न की बात करूँ तो एक ऐसा तेज पापा के चेहरे पर पाया, उसी स्वप्न में पूरा मुख देखा अन्यथा इससे पहले जितने स्वप्न आते उसमें घर में मानो मैं हूँ जो कार्य व्यापार चलता था और पापा की भूमिका थी॥ उन्हीं चीजों को देखता ... काफी अच्छा लगता । लेकिन उस दिन तो मानो ऐसा लगा स्वयं प्रकट हुए। कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ता वाली स्थिति थी मेरी। एकाएक जो चेहरा प्रकट हुआ। जहाँ तक तेज की बात है फतेहपुर शेखावटी में मंदिर में पूजा के दौरान एक पापा-मम्मी की फोटो जिसमें पापा एक मलमल टाइप का कुर्ता पहने थे, उस फोटो में पापा के चेहरे पर तेज देखने लायक था, उससे तुलना की जा सकती है। काफी अच्छा लगा था। बाद में मैंने इस स्वप्न की चर्चा मम्मी से भी की। लेकिन बोलने के वक्त मैं इतना स्पष्ट नहीं हो पाता था। पापा जी सपने में लगातार आ रहे थे-ऐसी बात तो कर ही लेता लेकिन स्पष्ट रूप से स्थिति की ओर संकेत नहीं कर पाता। अभी उस तेज की इतनी कमी महसूस हो रही है कि कुछ नहीं चल पा रहा है। पापा की तेजी - सभी मायनों में तेज के साथ खल रही थी।

स्वप्न में पापा का बार-बार आना

अगस्त 3 तक स्वपन में रह रह कर पिताजी का बार-बार आना... कुछ ही ॿण के लिए उनके निकट ले जाता था, काफी अच्छा लगता था। नींद टूटने के बाद चेतना में आने पर चलता कि पिताजी अब हमारे बीच नहीं है .. काफी दुख पहुँचाता।
जब तक हम स्वप्न में रहते है तो ऐसा लगता है कि जो हम देख रहे है वही वास्तविक दुनिया है लेकिन वास्तविकता में आने पर हमें अपनी गलती का एहसास होता है कि जिसे हम देख रहे है वह वास्तविक नहीं है। वास्तविकता तो जागृत अवस्था यानि नींद से टूटने पर है। ठीक इसी प्रकार इस वास्तविकता से बाहर कोई परावास्तविक दुनिया होगी जो इस दुनिया की वास्तविकता से दूर हमें ऐसे धरातल पर ले जाएगी .. जहाँ पर क्या है? यह तो तब ही मालूम चलेगा।
पापा के मेरे स्वप्न में आने से यह बात तो सिद्ध होती है कि मैं उनके कितने करीब था। वैसे भी यह बात जग-जाहिर थी, वो पेट पर हाथ फेरना.. काफी चर्चा का विषय हुआ करता था दादी के घर में .. अब तो कुछ भी न रहा न स्वप्न न यथार्थ।

जी-मेल/ऑरकुट पर रितेशजी का मेल/स्क्रैप

ऑरकुट पर रितेशजी का यह संबोधन कि अंकल और आंटी को नमस्ते कहिएगा .. एक हद तक मुझे अलग लगा। मैंने ऑरकुट पर रिप्लाई किया कि पापा नहीं रहे ... और कारण बताया। क्योंकि पापा की कमी कोई पूछे तो अजीब सा लगता है। काफी भावुक हो जाता हूँ। इसी तरह मम्मी से बात करते हुए गुरूवार को सुबह 10 बजे मन के किसी कोने का यह गुब्बार कि "कुछ भी नही कर सके हम पापा के लिए"कहने के बाद गला भर आया। काफी तसल्ली हुई कि यह बात निकल कर आयी नहीं तो अपने आप से कह कर अपने को कोसने का सिलसिला चल रहा था। फिर भी यह तो जिंदगी भर मलाल रह ही जाएगा कुछ भी नही कर सके पापा के लिए और न ही उनके सामने कुछ बनकर दिखा सके। जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव आएँगे, लेकिन इस चीज का दुख जिंदगी भर बना रहेगा। ये कर्ज आजीवन रह जाएगा, अगर कभी मौका मिला आने वाले जीवन में तो काफी कुछ कर दिखाया जा सकेगा। अब तो प्रेरणा स्रोत बनकर ही जिंदगी में मार्गदर्शन करते रहेंगे, जो काफी अच्छा और संबल प्रदान करने वाला होगा।

Thursday, February 11, 2010

अब तो घर भी जाने का जी नहीं करता..

सबसे बड़ी बात .. पहले तो मन करता कि किसी तरह घर निकल जाऊँ। छुट्टी के दिनों में घरवालों से मिलकर आ जाऊँ लेकिन एग्जामस ( फाइनल,PGDRTVJ) के बाद हिम्मत ना हो सकी कि घर जाऊँ। अब तो जी ही नहीं करता... यहीं कुछ मीडिया फिल्ड में अच्छा हो जाए .. अपने आप को स्थापित कर लूँ.. तब ही जाकर आत्मसंतुष्टि मिलेगी। एक तो उम्र भी बीतती जा रही है और अभी तक आत्मनिर्भर न होना भी एक समस्या ही है। घर की स्थिति अभी भी जस की तस है। अगर यह कोर्स नहीं किया होता तो मेरी क्या स्थिति होती? यह सोच कर भी रूह काँप जाती है। यहाँ एक जिंदगी को जीने की सोच है, दिशा है। कुछ कर गुजरने की चाहत है। घर पर जाने का जी नही करता। किस मुँह से जाऊँ। अब तो स्ट्रगल पीरियड भी शुरू हो चुका है.. एक जरा सी भी यहाँ से मैं कहीं गया तो काफी दिक्कत आ जाएगी। देखिए.. वैसे क्या होता है .. अगर जॉब होगी तो एक दिशा एक इंगेजमेंट हो जाएगी फिर तो जी भी लगा रहेगा।

एक Lacuna सा create हो गया..

एकाएक मानो जिंदगी थम सी गयी। कुछ करने की चाह ने ही एक गति प्रदान की। दिल्ली में कर रहा पाठ्यक्रम अपने अंतिम चरण में था। फाइनल एक्जाम होने वाला था.. पिछला परफार्मेंस अच्छा था अतः इस बार भी काफी अच्छा ही होने की उम्मीद थी अतः मेहनत करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना था। लेकिन लौटने के बाद मई महीने में काफी खालीपन-सा महसूस हुआ। वैसे ही इंस्टीच्यूट में भी क्लासेज मई भर अल्टर वे में हुई। मई के अंतिम चार दिन एग्जामस थे, सो उसकी ही तैयारी ही चलती रही। लगे रहे... एक अच्छे परिणाम पाने की चाह में। पढ़ाई के दौरान पिताजी का ध्यान आना.. काफी देर तक किसी और सोच में डूब जाना.. निश्चय ही परीक्षा के समय सही नहीं था। लेकिन इस Lacuna को खत्म करना मेरे वश की बात नहीं । किसी अपने को खोने का दर्द क्या होता है... यह जिस पर बीतती है वहीं जान सकता है। सही बात है आब महसूस हो रहा है और होता रहेगा.. ये घाव कभी नही भरने वाला।

दिल्ली लौटने की जल्दी ..

सभी क्रिया-कर्म संपन्न होने के बाद वापस लौटने की जल्दी थी.. ये चीज मुझमें हमेशा से रही। पहले तो चलो सही है। लेकिन इस बार एकदम मन नहीं लग रहा था, जल्दी से छाया-श्राद्ध (छमाही) हो और दिल्ली को जाए। छमाही का डेट भी फिक्स नहीं था .. अतः लौटने का डेट भी फिक्स न हो सका था। अंततः तिथि आयी तो टिकट भी जाकर तत्काल से करवाया। 29/4 को सुबह छह बजे निकला पैसेंजर से लेकिन पैसेंजर ने तो उस दिन हालत ही खराब कर दी 2.55 पर नरकटियागंज पहुँची और दिल्ली वाली ट्रेन वहीं से 2.34 पर थी। मैं तो कहा ट्रेन छूटी। मैं अपनी जिद से जल्दी टिकट बनाकर आने के क्रम में था। मै तो कहा ये तत्काल वाली टिकट भी बर्बाद गयी और वापस घर जाना होगा सो अलग। पर जैसे ही ट्रेन नरकटियागंज स्टेशन पहुँची वैसे ही सप्तक्रांति भी पहुँची। 5 मिनट का स्टे था। दौड़ते-दौड़ते पहुँचे। मौसी पमपम के साथ स्टेशन पर एस-दो के आगे इंतजार कर रही थी मैं जैसे ही पहुँचा, सामान रखा कि ट्रेन निकल पड़ी। ठीक से मौसी से बात भी नहीं हो सकी। जल्दी के चक्कर में.. ट्रेन नहीं मिलती तो क्या हालत होती.. सोचकर हालत खराब हो जाती है।

बात भी न कर सके

8 अप्रैल '07 को यूँ ही रात में 10 बजे के करीब घर पर और नीरज भैया के मोबाइल पर मिस कॉल किया। घर से मम्मी का फोन आया कि पापा और बॉबी पटना गए हुए है वो कॉलेज का काम है या आरटीआई का ऐसा ही कुछ है इसी बीच पटना से कोई कॉल कर रहा था क्योंकि लैंडलाइन का नंबर था 0612 कोड आ रहा था मैंने मम्मी को कहा कि लगता है बॉबी भैया का फोन आ रहा है फिर फोन पर वेटिंग कॉल रिसीव किया। उधर बॉबी भैया ही थे। मैनें बातें की। हाल ही में लोकसभा चैनल में इंटर्नशिप के लिए इंटरव्यू देकर आया था, उसके बारे में बताया। और सब चीजों को लेकर चार-पाँच मिनट बातचीत हुई। मुझे लगा कि कही बूथ से कर रहे है इसलिए मैं पूछ नहीं सका कि पापा से बात करनी है। यूँ ही टाल गया। मुझे क्या पता था कि पापा भी वहीं थे। गुप्ताजी के घर से ही फोन किया गया था। बाद में यह बात पता चली। अगर बात हो जाती, तो अंतिम बार तो सुने होते। उससे पहले जहाँ तक याद आता है 15 दिन पहले कभी बात हुई होगी वो भी इतने तक ही सीमित कि पैसा भेज दे क्या? क्या हाल-चाल है ?एक छोटी वार्ता पर हमेशा खत्म हो जाती कॉल। लेकिन उस दिन बात न कर सके इसका अफसोस जिंदगी भर रहेगा।

क्या बयाँ करूँ?

एक पिता और पुत्र का संबंध काफी गहरा होता है। पुत्र को माँ जन्म देती है, संस्कार देती है और अच्छे गुणों का विकास करती है, इससे पिता की भूमिका कम नहीं हो जाती है। बचपन से ही कनिष्ठ पुत्र होने के कारण सभी तरह की माँगों को पूरा किया जाता रहा। इतरने व रोकर बात मनवाना जो कि हर बच्चे का जन्मजात अधिकार होता है, वह भी काफी किया। बचपन से किशोरावस्था से युवावस्था आने तक पिता से लगाव पूर्व की भाँति बना रहा। सभी छोटे-मोटे कामों के लिए सिपु की आवाज काफी थी मेरे लिए। कभी-कभी गुस्सा भी आ जाता, मैं ही क्यों करूँ सारे काम? लेकिन इसमें भी एक अलग मजा था। हर छोटी बातों और बड़ी गलतियों को सहा पापा ने। क्या कुछ न किया? लेकिन हम उनके जीते-जी कुछ बनकर ना दिखा सके। एक खुशी जो अभिभावक के चेहरे पर तैरती है जब उनका बेटा अपने पैरों पर खड़ा होता है .. वो खुशी ना दे सके। इस बात का मलाल जिंदगी भर रह जाएगा। भाग्य में यही लिखा था। आजीवन तो सभी सुखों को इंतजाम करते रहे, लेकिन जब अपना वक्त आने वाला था पुत्रों से सेवा लेने का..... निष्ठुर, निस्पृह तरीके से हमें छोड़ अनंत की यात्रा की ओर निकल पड़े। कुछ कहने को न छोड़ गये। कुछ बयाँ नही कर सकते।

Wednesday, February 10, 2010

11 अप्रैल, 2007

सीतामढ़ी

11 अप्रैल, २००७


अगली सुबह॥ काम की चिंता। पिताजी के सभी काम कैसे होंगे। कहाँ से पैसा आएगा। बड़ी शोचनीय स्थिति थी। परिवारजन स्थिति समझ कर भी अनजान बने बैठे थे। काफी बंधु-बांधव रात को ही लौट चुके थे, फिर दो-तीन दिनों बाद उनका आना था। जो रूके थे, उन्हें काम पूरा होने तक रूकना था। अखबार में समाचार और साथ ही अखबार वाले को न्यूजपेपर न देने के लिए कहना- पहला कदम था आगे आने वाले खर्चे को रोकने का। तरह तरह के काम। वर्णन संभव नहीं।


12 अप्रैल सेः- श्राद्ध कर्म से संबंधित तेया का आना, घाट जाकर अस्थियों को चुनना। अस्थियों से हड्डी जोड़ने वाले स्क्रू का मिलना, सूर्यकांता जड़ित अंगूठी ... एक एक कर भूतकाल के पन्नों को सामने पलट रहा था। तेया की क्रिया संपन्न हुई।
एकादशी, द्वादशी - इतने सारे श्राद्ध कर्म हुए। स्मृति में सिलसिलेवार ढ़ंग से ठहर नहीं सके। ब्राह्मण भोज व दान, गो-दान और विविध क्रियाओं के बीच द्वादशी को समाज के लोगों को शाम में बुलाकर खिलाना। फिर छमाही का काम 28 को। फिर वापस दिल्ली लौटना। पढ़ाई इंतजार कर रही थी। सभी एक बुरे स्वपन की तरह बीत गया। लेकिन काफी गंभीर घाव कर गया। ये घाव अगले अध्यायों में............

Tuesday, February 9, 2010

10 अप्रैल '07

दिल्ली/सीतामढ़ी
10 अप्रैल '07

टर्मिनल वन पर समय बीतने का इंतजार ....। सुबह चार बजे के करीब निशांत भैया आए ग्वालियर से ...। रचना व उसका एक भाई साथ में था। इस बीच एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ में एक मित्र की तलाश में मैने इन्क्वायरी की। फायनली शैलेंद्र से बातचीत भी हुई। उसके एक जूनियर के द्वारा। किसी तरह समय बीताए। पौ फटी। छह बजे के करीब .. एयरपोर्ट के लैंडिंग व टेक ऑफ रीजन में प्रवेश किया। एक बस से प्लेन तक पहुँच। एयर एलायंस की विमान में सवा छह बजे के करीब चढ़े। छहों व्यक्ति ने एक रॉ में पूरी सीटें ली। साढ़े छह बजे ज्योंहि विमान उड़ने वाला था .. शुरूआती परिक्षण में टेक्नीकल स्नैग आ गया। विमान के इस फॉल्ट को सही करते करते आठ बजे विमान उड़ा। सवा नौ बजे हम पटना थे। वहाँ सूमो गाड़ी इंतजार कर रही थी एयरपोर्ट के बाहर। फिर वहाँ से तुरंत शुरू हुआ सीतामढ़ी जाने का सफर। रास्ते भर लगातार फोन आ रहे थे .. कहाँ तक पहुँचे? सवा दो बजे के करीब तिवारी जी के खेत होते हुए घर पहुँचे। घर के आगे सैंकड़ों की भीड़ हम दो भाइयों के ही आने का इंतजार कर रही थी। सबसे पहले जाकर गेस्ट रूम में पिताजी के पार्थिव शरीर का दर्शन किया........ आँखों से आँसू सूख गए थे .. ना रो सके ना ही विलाप कर सके। पिताजी के शरीर के पास पैरों के सामने बैठकर तीन बार आँखे बंद की ... कुछ समझ नहीं आ रहा था। किंकर्तव्यविमूढ़ता वाली स्थिति थी। जल्द ही बाल देने के लिए बाहर निकाला गया क्योंकि घर के आगे जमा भीड़ काफी देर से इंतजार कर रही थी। हम और निशांत भैया का मुंडन हुआ। एक बार घर के भीतर से 'माँ मिलेगी सिपु से' ऐसी सूचना आयी। जाकर मिला, जो आँसू सूख चुके थे, वो पहली बार निकल पड़े। मम्मी के सामने मैं अपने आप को रोक नहीं सका। पूरा हॉल महिलाओं से भरा था, उस वक्त कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। तुरंत ही बाहर निकलना पड़ा। फिर शुरू हुआ अपने चार पुत्रों के कंधों पर पिता की अंतिम यात्रा।
यन्त्रवत सभी क्रियाएँ करते जा रहे थे, कुछ नही सूझ रहा था। अर्थी घर से निकलकर जानकी स्थान का चक्कर लगाते हुए लक्ष्मणा नदी के तट पर स्थित मोक्षधाम को पहुँची, इससे पूर्व अपनी दादी और ताऊ में ही आना हुआ था, इतनी जल्दी पिता के साथ आना पड़ेगा, सोचा भी नहीं जा सकता था। चिता की तैयारी, मुखाग्नि देने का काम बड़े भैया ने किया। शाम सात बजे तक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। स्नानादि क्रिया कर लौटना हुआ घर को। ऐसा घर जिसका मालिक व सर्वेसर्वा सदा के लिए छोड़कर जा चुका है। जाकर माँ के पास पहुँचे, आशीर्वाद लिया। सभी सगे-संबंधी आए हुए थे, इतना बड़ा जमावड़ा कभी न देखा। पापा की पीढ़ी में पहली मौत वो भी पापा की.......... अकल्पनीय था।

Friday, February 5, 2010

9 अप्रैल '07

दिल्ली
9 अप्रैल '07

प्रातः उठने के साथ ही अपनी नित्य क्रियाकर्म से निवृत होकर बाथरूम में ही आईने के सामने एक टॉक शो की एंकरिंग का अभ्यास करने लगा। सोमवार का दिन था, अच्छी से शेवकर चेहरे को काफी अच्छे से धोया। पुनः तैयार होकर साढ़े दस के करीब कॉलेज को गया। वहाँ पर फाइनल प्रोजेक्ट में हमारे ग्रुप में शामिल सभी सदस्य उपस्थित थे, मित्रों की मदद से येन-केण प्रकारेण स्क्रिप्ट तैयार हुई और मुझे केवल उसका अभ्यास करना था। बीच में स्टेज की तैयारी और छोटी-से-छोटी व्यवस्था मित्रों के द्वारा की जा रही थी, अगर मैं कोई मदद करता, तो मुझे स्क्रिप्ट की तैयारी करने पर जोर दिया जाता। शिॿक और मित्रों को पूरी आशा थी कि मैं कार्यक्रम को काफी अच्छे ढ़ंग से एंकर नहीं कर पाऊँगा और वहीं हुआ भी। बीच में लंच ब्रेक के लिए डेढ़-पौने दो के करीब सभी मित्र गए, मुझे अभ्यास करने के लिए स्टूडियों में छोड़ दिया, यानी कि लंच से भी हाथ धोना पड़ा। खैर.. । स्टूडियो में तीन बजे के करीब जो गेस्ट आने थे वे एकाएक आ गए.. क्योंकि स्टूडियो में लाइटिंग, कैमरा इत्यादि लगकर तैयार ही हुए थे। मुझे अभ्यास करना था... लेकिन कुछ हो न सका। दोनों गेस्ट, विकास और अशोक, आकर डायस के पीछे हो गये। मैनें दोनों को ब्रीफ किया। फिर शुरू हुआ.. लाइट...कैमरा... एक्शन। पहले टेक में हो गई गड़बड़ी.. फिर लेना पड़ा दूसरा टेक .. इसमें किसी तरह भूमिका बाँधी.. मुद्दे पर उतरा। फोनो आदि लेकर किसी तरह टॉक शो को समाप्त किया। लड़खड़ाना और आत्मविश्वास की कमी पूरे शो के दौरान रही। फिर आलोचना भी सुनना वहाँ उपस्थित लोगों से .. खैर ये तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम अच्छा न जाने का काफी गुस्सा था। गेस्ट लोग तुरंत ही वहां से चले गये। उनके लिए मँगवाया गया नाश्ता हम सभी ग्रुप के सदस्य ही कैंटीन में जाकर समाप्त किए। फिर एम्फीथियेटर में जाकर मैगजीन बनाने को लेकर मीटिंग की। हमारे फाइनल प्रोजेक्ट के चार प्रोजेक्ट पूरे हुए थे अतः सभी खुश थे.. लेकिन मेरे द्वारा किया गया यह कार्यक्रम मुझे आत्मिक संतुष्टि न दे सका। मन अस्थिर था। ग्रुप लीडर दीपेंद्र के साथ कस्तूरबा गांधी क्रासिंग से बस पकड़े .. उससे कहा भी यार मूड काफी ऑफ है कार्यक्रम को लेकर। घर लौटा। आते ही खाना खाने की आदत थी लेकिन उस दिन कैंटीन में लिए गए रिफ्रेशमेंट से भूख मर गयी थी। बिछावन बिछाया और शाम छह बजे के करीब लेटने का प्रयास किया। मन एकदम नहीं लग रहा था .... सोच रहा था कि बड़े भैया के यहाँ अंबेडकर नगर चला जाऊँ। तभी छहः बीस के करीब उन्हीं का फोन आया कि नारायण का मुंबई से फोन आया था .. वह तुमसे बात करना चाह रहा हैं मैनें सोचा कोई बात होगी, फिर आँख बंद कर लेट गया। फिर पाँच मिनट बाद उन्हीं भैया का फोन आया.. वे रोते रोते बोल रहे थे......" तुम जल्दी घर जाओ... तुम किसी भी तरह घर जाओ " मैने पूछा .. " क्या हुआ? " उन्होंने कहा, " पापा नहीं रहे "। एकाएक काफी बड़ा झटका लगा। बिछावन लपेटा, और जल्द ही कपड़े समेटने लगा। बैग तैयार किया और फिर अविनाश को बोला मुझे एनीहाउ स्टेशन छोड़कर आओ .. पापा नहीं रहे। वह भी जल्दी से तैयार हुआ। हम नीचे उतरे, पार्क के पास ऑटो किया, ज्योंहि कुछ दूर गया, पैसा व एटीएम कार्ड चेक किया। पैसा था नहीं, एटीएम कार्ड हड़बड़ी में छूट गया। वहीं ऑटो छोड़ा, तभी नीरज भैया को फोन किया और पूछा .. कैसे हुआ? तुम स्थिर से आ जाओ। ताज्जुब की बात कि उन्हें पता नहीं था। वापस रूम पर आते वक्त संतोष टिंकू मिला, उसे बताया। रूम पर आया, इमरान आ चुका था, उसे बिना बताए गया। संतोष,अविनाश और मैं ऑटो से जा रहे थे, यमुना पार करने के वक्त पवन भैया का फोन आया, 'तुम हमारे पास आ जाओ, तुम्हारा टिकट हो गया। ऑटो को आईटीओ पुल से ही अंबेदकर नगर की ओर मोड़ा, दोनों दोस्तों को छोड़ दिया। रूम पर पहुँचने से पहले थाने के पास अवस्थित एटीएम से पैसा निकाला .. ऑटो को रूम पर पहुँचने पर दिया। वहाँ दो-तीन घंटे बीताकर ग्यारह बजे रात में एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। मुंबई से बड़े पापा, बड़ी माँ व पंकज भैया आने वाले थे, उनका वेट किया, टर्मिनल 2 पर फिर रात एक बजे उन लोगों की फ्लाइट आयी वहाँ हमलोग बाहर आकर थोड़ी देर बैठे। क्योंकि हमारी पटना के लिए फ्लाइट सुबह 6.30बजे थी।

Thursday, February 4, 2010

पापा की याद में..

पापा की याद में..
(तीन साल पहले पापा के एकाएक हमें छोड़ कर चले जाने के बाद जो रिक्तता उत्पन्न हुयी.. उन पलों को डायरी के पन्नों पर उकेरा था.. उन्हीं के अंश..)


"जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या भला बुरा"

कुछ यूँ ही जीवन जीते अपने अंतिम क्षणों तक काम में रत एक कर्मयोगी ने इस पृथ्वीलोक को छोड़ दिया 9 अप्रैल, 2007 को। जिंदगी भर काम में, दूसरे की सहायता करने और ज्यादा से ज्यादा दूसरों का भला हो सके- इसी में लगे रहे।
4 फरवरी 1947- देश आजाद होने की ओर अग्रसर था, उस समय बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी नामक स्थान पर श्री ज्वाला प्रसाद गोयनका और उनकी धर्मपत्नी सोना देवी को द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बालक बचपन से ही प्रखर स्वभाव का था। पूर्व जन्म में बंग देश का राजकुमार, जो कि काफी जिद्दी स्वभाव का था- जिस कारण काफी लोगों के काम में बाधा आती, पुनः एक वैश्य परिवार में जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। फिर उच्च शिक्षा हेतु जिला मुख्यालय स्थित बिहार विश्वविद्यालय से बी।ए। फिर एम।ए। की शिक्षा प्राप्त की। इसी क्रम में 22 वर्ष की अवस्था में 1969 ई. में 3 फरवरी को प्रेमलता नामक कन्या से विवाह हुआ। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् पी.टी.आई., भाषा व समाचार नामक एजेंसियों से जुड़े। फिर स्थानीय महाविद्यालय में राजनीति के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए। कालांतर में उपाचार्य पुनः विभागाध्यक्ष के पद तक पहुँचे। साठ वर्ष की आयु अभी पूर्ण ही हुई थी कि पटना से सीतामढ़ी लौटते वक्त रास्ते में ही मुजफ्फरपुर सरकारी बस स्टैंड पर गर्मी के कारण मूर्च्छित हो गिर पड़े वही अनंत की यात्रा को निकल पड़े।

Thursday, January 14, 2010

जुलाई 03, 2003

एक नये संसार की तलाश में यायावर की तरह भटकने वाले हम सैंकड़ों मील दूर से एक नयी दुनिया में आते है। जहाँ सब कुछ नया है, हमारी कोई पहचान नहीं होती हैं। यहाँ पहचान बनाने में एक अच्छा खासा समय निकल जाता है। यहाँ की पहचान में निकला समय हमें अपने जड़ों से दूर कर देता है। अपनों के लिए बेगाने हो जाते है। इसलिए कहा जाता है पेट की आग यानि जठराग्नि के सामने कुछ भी पाप या पुण्य नहीं। इस आग में ही इतनी ताकत होती है कि हम कहाँ से कहाँ एक रोटी की तलाश में भटकते है। जॉब करते है, जगह बदलते रहते है। अपनी एक पहचान भी नहीं बना पाते। बड़े अरमान से माता-पिता अपने बच्चों को पालते है, बड़ा करते है ताकि बुढ़ापे में उनका सहारा बने लेकिन बेटे ( अब तो बेटियाँ भी) उस चिड़िया के माफिक होते है, पंख निकलते ही घोंसला छोड़ फुर्ऱ से उड़ जाते है और काफी दूर जाकर एक घोंसला बना लेते है। एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि दोनों अपना घोसला छोड़ एक दूसरे के यहाँ नही आ सकते। यह क्रिया निरंतर चलती रहती है....नए घोसले बनते रहते है लेकिन इन नए घोंसलों में वह बात कहाँ रहती, जो पुराने में होती है।

जुलाई 02, 2003

जिंदगी एक आईना होती है, तो कुछ और बात होती। लेकिन यह एक कंघा है जिसे सिर्फ चलना है कभी बियावान पर, कभी सुनसान में तो कभी हरी-भरी खेतों के बीच से। एक निश्चित सफर ही तय करना है लेकिन सफर के बीच में किस तरह सफर करना पड़ सकता है यह कोई नहीं जान सकता है, लेकिन अनुभव व तकाजे द्वारा इसको भी कम किया जा सकता है। निश्चय ही अनुभव उम्रदराज व्यक्ति के पास होता है लेकिन युवा पीढ़ी कम समय में ही अपने को उस श्रेणी में रखने लगी है जिसे वृद्धों द्वारा अधिकृत क्षेत्र ही समझा जाता है। अब उम्रदराज न होकर कम उम्र में सभी राज जानना ही सुपात्रता की निशानी है।

दर्पण की बात करें तो महापुरुषों का जीवन आईने की भांति अभी भी साफ नजर आता है लेकिन हम किसी औरों के लिए दर्पण बन सके... यह तो मुश्किल ही प्रतीत होता है। स्वयं दूसरों की जीवनी जानना व पढ़ना काफी भारी प्रतीत होता है तो हम जैसे दुष्कर कार्य न करने वाले व्यक्ति के जीवन को कोई क्यों कर देखेगा और क्या प्रतिबिंब पाएगा।

जुलाई 01, 2003

जैविक घड़ी की सूईयां जब अपने निश्चित अंतराल पर नहीं चलती है तो मनुष्य के समक्ष परेशानियों का अंबार खड़ा उठता है। यूँ ही आधुनिकता के आवरण ने हमें अंदर से खोखला, भावहीन, संवेदनशून्य बना दिया है। हमने नया करने के लिए नये मिथक गढ़ डाले है। वास्तविकता से परे एक नया आसमान और एक नई धरातल की रचना कर डाली है और इस मुगालते में रहते है कि हमारे द्वारा रची गयी यह दुनिया ही सत्य है, लेकिन ऐसा नहीं है। अब तो हमारा अहं हमें सही करने से रोक रहा है, हम जो कर रहे है वही सत्य है- इस आभासी सत्यता के पीछे ना जाने कब तक हम अपने आप को सिद्ध करते-फिरते है। शहरों की चकाचौंध के बीच जीवन व्यतीत करने वाला शख्स महानगरों की विशाल चमक-दमक के समक्ष अपने को बौना पाता है, वहीं गाँव के अंधेरे के समक्ष अपने को भाग्यवान समझता है। जिस बिंदु पर हम है,उस स्थान से तुलना करने पर हम भिन्न होती हुई चीजों को देखते है लेकिन दूसरे बिंदु से उस नवीन भिन्नता से भी परिचित होते है।यही अंतर है- वह भी द्वंदात्मक। समझने भर की बात है। जो समझा वह ज्ञानी , जो ना समझा, वह अभ्यासी।