जैविक घड़ी की सूईयां जब अपने निश्चित अंतराल पर नहीं चलती है तो मनुष्य के समक्ष परेशानियों का अंबार खड़ा उठता है। यूँ ही आधुनिकता के आवरण ने हमें अंदर से खोखला, भावहीन, संवेदनशून्य बना दिया है। हमने नया करने के लिए नये मिथक गढ़ डाले है। वास्तविकता से परे एक नया आसमान और एक नई धरातल की रचना कर डाली है और इस मुगालते में रहते है कि हमारे द्वारा रची गयी यह दुनिया ही सत्य है, लेकिन ऐसा नहीं है। अब तो हमारा अहं हमें सही करने से रोक रहा है, हम जो कर रहे है वही सत्य है- इस आभासी सत्यता के पीछे ना जाने कब तक हम अपने आप को सिद्ध करते-फिरते है। शहरों की चकाचौंध के बीच जीवन व्यतीत करने वाला शख्स महानगरों की विशाल चमक-दमक के समक्ष अपने को बौना पाता है, वहीं गाँव के अंधेरे के समक्ष अपने को भाग्यवान समझता है। जिस बिंदु पर हम है,उस स्थान से तुलना करने पर हम भिन्न होती हुई चीजों को देखते है लेकिन दूसरे बिंदु से उस नवीन भिन्नता से भी परिचित होते है।यही अंतर है- वह भी द्वंदात्मक। समझने भर की बात है। जो समझा वह ज्ञानी , जो ना समझा, वह अभ्यासी।
Thursday, January 14, 2010
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