Thursday, January 14, 2010

जुलाई 02, 2003

जिंदगी एक आईना होती है, तो कुछ और बात होती। लेकिन यह एक कंघा है जिसे सिर्फ चलना है कभी बियावान पर, कभी सुनसान में तो कभी हरी-भरी खेतों के बीच से। एक निश्चित सफर ही तय करना है लेकिन सफर के बीच में किस तरह सफर करना पड़ सकता है यह कोई नहीं जान सकता है, लेकिन अनुभव व तकाजे द्वारा इसको भी कम किया जा सकता है। निश्चय ही अनुभव उम्रदराज व्यक्ति के पास होता है लेकिन युवा पीढ़ी कम समय में ही अपने को उस श्रेणी में रखने लगी है जिसे वृद्धों द्वारा अधिकृत क्षेत्र ही समझा जाता है। अब उम्रदराज न होकर कम उम्र में सभी राज जानना ही सुपात्रता की निशानी है।

दर्पण की बात करें तो महापुरुषों का जीवन आईने की भांति अभी भी साफ नजर आता है लेकिन हम किसी औरों के लिए दर्पण बन सके... यह तो मुश्किल ही प्रतीत होता है। स्वयं दूसरों की जीवनी जानना व पढ़ना काफी भारी प्रतीत होता है तो हम जैसे दुष्कर कार्य न करने वाले व्यक्ति के जीवन को कोई क्यों कर देखेगा और क्या प्रतिबिंब पाएगा।

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