एक नये संसार की तलाश में यायावर की तरह भटकने वाले हम सैंकड़ों मील दूर से एक नयी दुनिया में आते है। जहाँ सब कुछ नया है, हमारी कोई पहचान नहीं होती हैं। यहाँ पहचान बनाने में एक अच्छा खासा समय निकल जाता है। यहाँ की पहचान में निकला समय हमें अपने जड़ों से दूर कर देता है। अपनों के लिए बेगाने हो जाते है। इसलिए कहा जाता है पेट की आग यानि जठराग्नि के सामने कुछ भी पाप या पुण्य नहीं। इस आग में ही इतनी ताकत होती है कि हम कहाँ से कहाँ एक रोटी की तलाश में भटकते है। जॉब करते है, जगह बदलते रहते है। अपनी एक पहचान भी नहीं बना पाते। बड़े अरमान से माता-पिता अपने बच्चों को पालते है, बड़ा करते है ताकि बुढ़ापे में उनका सहारा बने लेकिन बेटे ( अब तो बेटियाँ भी) उस चिड़िया के माफिक होते है, पंख निकलते ही घोंसला छोड़ फुर्ऱ से उड़ जाते है और काफी दूर जाकर एक घोंसला बना लेते है। एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि दोनों अपना घोसला छोड़ एक दूसरे के यहाँ नही आ सकते। यह क्रिया निरंतर चलती रहती है....नए घोसले बनते रहते है लेकिन इन नए घोंसलों में वह बात कहाँ रहती, जो पुराने में होती है।
Thursday, January 14, 2010
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