Sunday, February 21, 2010
पापा कभी शरीक नहीं होते...
कुछ सुना पाता....
पापा के ग्रीटिंग्स कार्डस
भोपाल में फिर से
Wednesday, February 17, 2010
पापा के सवाल
( 8 जुलाई 2008 को लिखा गया)
सपनों से भी नदारद
( 13 जून 2008 को लिखा गया)
Tuesday, February 16, 2010
आज 4 फरवरी है....
लम्हें कम नहीं
Monday, February 15, 2010
पेंसिल नहीं लीड से लिखेंगे
Sunday, February 14, 2010
कुछ पुरानी बातें भी हो जाएँ..
जब चला दिल्ली मास कॉम का कोर्स करने......
वे अंतिम क्षण.......
अंतिम फोन की बातें भी ध्यान नहीं
शादी फिर जन्म...
2006 की दिवाली पर
क्यूँ लिख रहा हूँ यह सब...
पापा का गुस्सा
तुलसी मिक्स
कुछ एड् जो मुझे खटकते है.....
पापा और क्रिकेट
मंडलजी...
सान्या, पापा और मैं
एक लेखक भी
Friday, February 12, 2010
एक प्रेस रिपोर्टर की रिपोर्ट
पापा के समय रिपोर्टिंग और काफी चीजें शेयर करने का ऑरिजनल समय तो अब आया था। कुछ वो बताते कुछ हम बताते। ये बात तो निश्चित ही थी कि दोनों समय की रिपोर्टिंग में काफी अंतर है लेकिन रिपोर्टिंग तो रिपोर्टिंग होती है। प्रिंट मीडिया ही सारा का सारा ब्राडकास्ट में आ रहा है.. तब हम जैसे लोगों की क्या स्थिति होगी.. समझ सकते है।
काफी कुछ लिखूँ....
एक दैवीय तेज
स्वप्न में पापा का बार-बार आना
जब तक हम स्वप्न में रहते है तो ऐसा लगता है कि जो हम देख रहे है वही वास्तविक दुनिया है लेकिन वास्तविकता में आने पर हमें अपनी गलती का एहसास होता है कि जिसे हम देख रहे है वह वास्तविक नहीं है। वास्तविकता तो जागृत अवस्था यानि नींद से टूटने पर है। ठीक इसी प्रकार इस वास्तविकता से बाहर कोई परावास्तविक दुनिया होगी जो इस दुनिया की वास्तविकता से दूर हमें ऐसे धरातल पर ले जाएगी .. जहाँ पर क्या है? यह तो तब ही मालूम चलेगा।
पापा के मेरे स्वप्न में आने से यह बात तो सिद्ध होती है कि मैं उनके कितने करीब था। वैसे भी यह बात जग-जाहिर थी, वो पेट पर हाथ फेरना.. काफी चर्चा का विषय हुआ करता था दादी के घर में .. अब तो कुछ भी न रहा न स्वप्न न यथार्थ।
जी-मेल/ऑरकुट पर रितेशजी का मेल/स्क्रैप
Thursday, February 11, 2010
अब तो घर भी जाने का जी नहीं करता..
सबसे बड़ी बात .. पहले तो मन करता कि किसी तरह घर निकल जाऊँ। छुट्टी के दिनों में घरवालों से मिलकर आ जाऊँ लेकिन एग्जामस ( फाइनल,PGDRTVJ) के बाद हिम्मत ना हो सकी कि घर जाऊँ। अब तो जी ही नहीं करता... यहीं कुछ मीडिया फिल्ड में अच्छा हो जाए .. अपने आप को स्थापित कर लूँ.. तब ही जाकर आत्मसंतुष्टि मिलेगी। एक तो उम्र भी बीतती जा रही है और अभी तक आत्मनिर्भर न होना भी एक समस्या ही है। घर की स्थिति अभी भी जस की तस है। अगर यह कोर्स नहीं किया होता तो मेरी क्या स्थिति होती? यह सोच कर भी रूह काँप जाती है। यहाँ एक जिंदगी को जीने की सोच है, दिशा है। कुछ कर गुजरने की चाहत है। घर पर जाने का जी नही करता। किस मुँह से जाऊँ। अब तो स्ट्रगल पीरियड भी शुरू हो चुका है.. एक जरा सी भी यहाँ से मैं कहीं गया तो काफी दिक्कत आ जाएगी। देखिए.. वैसे क्या होता है .. अगर जॉब होगी तो एक दिशा एक इंगेजमेंट हो जाएगी फिर तो जी भी लगा रहेगा।
एक Lacuna सा create हो गया..
दिल्ली लौटने की जल्दी ..
बात भी न कर सके
क्या बयाँ करूँ?
Wednesday, February 10, 2010
11 अप्रैल, 2007
सीतामढ़ी
11 अप्रैल, २००७
अगली सुबह॥ काम की चिंता। पिताजी के सभी काम कैसे होंगे। कहाँ से पैसा आएगा। बड़ी शोचनीय स्थिति थी। परिवारजन स्थिति समझ कर भी अनजान बने बैठे थे। काफी बंधु-बांधव रात को ही लौट चुके थे, फिर दो-तीन दिनों बाद उनका आना था। जो रूके थे, उन्हें काम पूरा होने तक रूकना था। अखबार में समाचार और साथ ही अखबार वाले को न्यूजपेपर न देने के लिए कहना- पहला कदम था आगे आने वाले खर्चे को रोकने का। तरह तरह के काम। वर्णन संभव नहीं।
12 अप्रैल सेः- श्राद्ध कर्म से संबंधित तेया का आना, घाट जाकर अस्थियों को चुनना। अस्थियों से हड्डी जोड़ने वाले स्क्रू का मिलना, सूर्यकांता जड़ित अंगूठी ... एक एक कर भूतकाल के पन्नों को सामने पलट रहा था। तेया की क्रिया संपन्न हुई।
एकादशी, द्वादशी - इतने सारे श्राद्ध कर्म हुए। स्मृति में सिलसिलेवार ढ़ंग से ठहर नहीं सके। ब्राह्मण भोज व दान, गो-दान और विविध क्रियाओं के बीच द्वादशी को समाज के लोगों को शाम में बुलाकर खिलाना। फिर छमाही का काम 28 को। फिर वापस दिल्ली लौटना। पढ़ाई इंतजार कर रही थी। सभी एक बुरे स्वपन की तरह बीत गया। लेकिन काफी गंभीर घाव कर गया। ये घाव अगले अध्यायों में............
Tuesday, February 9, 2010
10 अप्रैल '07
टर्मिनल वन पर समय बीतने का इंतजार ....। सुबह चार बजे के करीब निशांत भैया आए ग्वालियर से ...। रचना व उसका एक भाई साथ में था। इस बीच एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ में एक मित्र की तलाश में मैने इन्क्वायरी की। फायनली शैलेंद्र से बातचीत भी हुई। उसके एक जूनियर के द्वारा। किसी तरह समय बीताए। पौ फटी। छह बजे के करीब .. एयरपोर्ट के लैंडिंग व टेक ऑफ रीजन में प्रवेश किया। एक बस से प्लेन तक पहुँच। एयर एलायंस की विमान में सवा छह बजे के करीब चढ़े। छहों व्यक्ति ने एक रॉ में पूरी सीटें ली। साढ़े छह बजे ज्योंहि विमान उड़ने वाला था .. शुरूआती परिक्षण में टेक्नीकल स्नैग आ गया। विमान के इस फॉल्ट को सही करते करते आठ बजे विमान उड़ा। सवा नौ बजे हम पटना थे। वहाँ सूमो गाड़ी इंतजार कर रही थी एयरपोर्ट के बाहर। फिर वहाँ से तुरंत शुरू हुआ सीतामढ़ी जाने का सफर। रास्ते भर लगातार फोन आ रहे थे .. कहाँ तक पहुँचे? सवा दो बजे के करीब तिवारी जी के खेत होते हुए घर पहुँचे। घर के आगे सैंकड़ों की भीड़ हम दो भाइयों के ही आने का इंतजार कर रही थी। सबसे पहले जाकर गेस्ट रूम में पिताजी के पार्थिव शरीर का दर्शन किया........ आँखों से आँसू सूख गए थे .. ना रो सके ना ही विलाप कर सके। पिताजी के शरीर के पास पैरों के सामने बैठकर तीन बार आँखे बंद की ... कुछ समझ नहीं आ रहा था। किंकर्तव्यविमूढ़ता वाली स्थिति थी। जल्द ही बाल देने के लिए बाहर निकाला गया क्योंकि घर के आगे जमा भीड़ काफी देर से इंतजार कर रही थी। हम और निशांत भैया का मुंडन हुआ। एक बार घर के भीतर से 'माँ मिलेगी सिपु से' ऐसी सूचना आयी। जाकर मिला, जो आँसू सूख चुके थे, वो पहली बार निकल पड़े। मम्मी के सामने मैं अपने आप को रोक नहीं सका। पूरा हॉल महिलाओं से भरा था, उस वक्त कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। तुरंत ही बाहर निकलना पड़ा। फिर शुरू हुआ अपने चार पुत्रों के कंधों पर पिता की अंतिम यात्रा।
Friday, February 5, 2010
9 अप्रैल '07
9 अप्रैल '07
Thursday, February 4, 2010
पापा की याद में..
(तीन साल पहले पापा के एकाएक हमें छोड़ कर चले जाने के बाद जो रिक्तता उत्पन्न हुयी.. उन पलों को डायरी के पन्नों पर उकेरा था.. उन्हीं के अंश..)
"जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या भला बुरा"
कुछ यूँ ही जीवन जीते अपने अंतिम क्षणों तक काम में रत एक कर्मयोगी ने इस पृथ्वीलोक को छोड़ दिया 9 अप्रैल, 2007 को। जिंदगी भर काम में, दूसरे की सहायता करने और ज्यादा से ज्यादा दूसरों का भला हो सके- इसी में लगे रहे।
4 फरवरी 1947- देश आजाद होने की ओर अग्रसर था, उस समय बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी नामक स्थान पर श्री ज्वाला प्रसाद गोयनका और उनकी धर्मपत्नी सोना देवी को द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बालक बचपन से ही प्रखर स्वभाव का था। पूर्व जन्म में बंग देश का राजकुमार, जो कि काफी जिद्दी स्वभाव का था- जिस कारण काफी लोगों के काम में बाधा आती, पुनः एक वैश्य परिवार में जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। फिर उच्च शिक्षा हेतु जिला मुख्यालय स्थित बिहार विश्वविद्यालय से बी।ए। फिर एम।ए। की शिक्षा प्राप्त की। इसी क्रम में 22 वर्ष की अवस्था में 1969 ई. में 3 फरवरी को प्रेमलता नामक कन्या से विवाह हुआ। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् पी.टी.आई., भाषा व समाचार नामक एजेंसियों से जुड़े। फिर स्थानीय महाविद्यालय में राजनीति के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए। कालांतर में उपाचार्य पुनः विभागाध्यक्ष के पद तक पहुँचे। साठ वर्ष की आयु अभी पूर्ण ही हुई थी कि पटना से सीतामढ़ी लौटते वक्त रास्ते में ही मुजफ्फरपुर सरकारी बस स्टैंड पर गर्मी के कारण मूर्च्छित हो गिर पड़े वही अनंत की यात्रा को निकल पड़े।