दिल्ली/सीतामढ़ी
10 अप्रैल '07
टर्मिनल वन पर समय बीतने का इंतजार ....। सुबह चार बजे के करीब निशांत भैया आए ग्वालियर से ...। रचना व उसका एक भाई साथ में था। इस बीच एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ में एक मित्र की तलाश में मैने इन्क्वायरी की। फायनली शैलेंद्र से बातचीत भी हुई। उसके एक जूनियर के द्वारा। किसी तरह समय बीताए। पौ फटी। छह बजे के करीब .. एयरपोर्ट के लैंडिंग व टेक ऑफ रीजन में प्रवेश किया। एक बस से प्लेन तक पहुँच। एयर एलायंस की विमान में सवा छह बजे के करीब चढ़े। छहों व्यक्ति ने एक रॉ में पूरी सीटें ली। साढ़े छह बजे ज्योंहि विमान उड़ने वाला था .. शुरूआती परिक्षण में टेक्नीकल स्नैग आ गया। विमान के इस फॉल्ट को सही करते करते आठ बजे विमान उड़ा। सवा नौ बजे हम पटना थे। वहाँ सूमो गाड़ी इंतजार कर रही थी एयरपोर्ट के बाहर। फिर वहाँ से तुरंत शुरू हुआ सीतामढ़ी जाने का सफर। रास्ते भर लगातार फोन आ रहे थे .. कहाँ तक पहुँचे? सवा दो बजे के करीब तिवारी जी के खेत होते हुए घर पहुँचे। घर के आगे सैंकड़ों की भीड़ हम दो भाइयों के ही आने का इंतजार कर रही थी। सबसे पहले जाकर गेस्ट रूम में पिताजी के पार्थिव शरीर का दर्शन किया........ आँखों से आँसू सूख गए थे .. ना रो सके ना ही विलाप कर सके। पिताजी के शरीर के पास पैरों के सामने बैठकर तीन बार आँखे बंद की ... कुछ समझ नहीं आ रहा था। किंकर्तव्यविमूढ़ता वाली स्थिति थी। जल्द ही बाल देने के लिए बाहर निकाला गया क्योंकि घर के आगे जमा भीड़ काफी देर से इंतजार कर रही थी। हम और निशांत भैया का मुंडन हुआ। एक बार घर के भीतर से 'माँ मिलेगी सिपु से' ऐसी सूचना आयी। जाकर मिला, जो आँसू सूख चुके थे, वो पहली बार निकल पड़े। मम्मी के सामने मैं अपने आप को रोक नहीं सका। पूरा हॉल महिलाओं से भरा था, उस वक्त कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। तुरंत ही बाहर निकलना पड़ा। फिर शुरू हुआ अपने चार पुत्रों के कंधों पर पिता की अंतिम यात्रा।
यन्त्रवत सभी क्रियाएँ करते जा रहे थे, कुछ नही सूझ रहा था। अर्थी घर से निकलकर जानकी स्थान का चक्कर लगाते हुए लक्ष्मणा नदी के तट पर स्थित मोक्षधाम को पहुँची, इससे पूर्व अपनी दादी और ताऊ में ही आना हुआ था, इतनी जल्दी पिता के साथ आना पड़ेगा, सोचा भी नहीं जा सकता था। चिता की तैयारी, मुखाग्नि देने का काम बड़े भैया ने किया। शाम सात बजे तक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। स्नानादि क्रिया कर लौटना हुआ घर को। ऐसा घर जिसका मालिक व सर्वेसर्वा सदा के लिए छोड़कर जा चुका है। जाकर माँ के पास पहुँचे, आशीर्वाद लिया। सभी सगे-संबंधी आए हुए थे, इतना बड़ा जमावड़ा कभी न देखा। पापा की पीढ़ी में पहली मौत वो भी पापा की.......... अकल्पनीय था।
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