सीतामढ़ी
11 अप्रैल, २००७
अगली सुबह॥ काम की चिंता। पिताजी के सभी काम कैसे होंगे। कहाँ से पैसा आएगा। बड़ी शोचनीय स्थिति थी। परिवारजन स्थिति समझ कर भी अनजान बने बैठे थे। काफी बंधु-बांधव रात को ही लौट चुके थे, फिर दो-तीन दिनों बाद उनका आना था। जो रूके थे, उन्हें काम पूरा होने तक रूकना था। अखबार में समाचार और साथ ही अखबार वाले को न्यूजपेपर न देने के लिए कहना- पहला कदम था आगे आने वाले खर्चे को रोकने का। तरह तरह के काम। वर्णन संभव नहीं।
12 अप्रैल सेः- श्राद्ध कर्म से संबंधित तेया का आना, घाट जाकर अस्थियों को चुनना। अस्थियों से हड्डी जोड़ने वाले स्क्रू का मिलना, सूर्यकांता जड़ित अंगूठी ... एक एक कर भूतकाल के पन्नों को सामने पलट रहा था। तेया की क्रिया संपन्न हुई।
एकादशी, द्वादशी - इतने सारे श्राद्ध कर्म हुए। स्मृति में सिलसिलेवार ढ़ंग से ठहर नहीं सके। ब्राह्मण भोज व दान, गो-दान और विविध क्रियाओं के बीच द्वादशी को समाज के लोगों को शाम में बुलाकर खिलाना। फिर छमाही का काम 28 को। फिर वापस दिल्ली लौटना। पढ़ाई इंतजार कर रही थी। सभी एक बुरे स्वपन की तरह बीत गया। लेकिन काफी गंभीर घाव कर गया। ये घाव अगले अध्यायों में............
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