संयोग से 2006 की दिवाली पापा के साथ मैं मना सका। यह उनकी आखिरी दीवाली होगी हममें से किसी भी न सोचा था। मैं अपने कोर्स के दौरान घर न जाने की ठान रखा था लेकिन बैंक के लोन को पास कराने के लिए मेरा वहाँ जाना निहायत ही जरूरी हो गया। बैंक मैनेजर भी दीवाली से पहले ही मुझसे मिलना चाह रहा था। मन मार के मैंने प्रोग्राम बनाया। घर जाना हुआ। मेरा बैंक वाला काम हुआ। मैनें दीवाली के अगले दिन का रिटर्निंग टिकट भी बना रखा था क्योंकि ंमंथली टेस्ट मुझे देना था। दीवाली पर मेरे घर पहुँचने से रौनक भी बढ़ गयी ( शायद मुझे ऐसा लगता है, वैसे घर वाले आपको बेहतर बताएंगे)। दीवाली काफी अच्छे से मनायी। घर वालों के साथ दीवाली या होली मनाना ... दिल्ली में रहने वाले छात्रों के लिए एक गेट-टूगेदर जैसा होता है। दीवाली में रंगोली,पकवान,फिर अगले दिन सब के घर जाकर धोख खाना अच्छा-सा लगता है। पापा के साथ अंतिम दीवाली मनायी... काफी अच्छा रहा। पापा के द्वारा किया गया लक्ष्मी-गणेश पूजन अलग ही होता था.. इसकी कमी आने वाले वर्षों में काफी खलेगी।
Sunday, February 14, 2010
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