9 अप्रैल '07
प्रातः उठने के साथ ही अपनी नित्य क्रियाकर्म से निवृत होकर बाथरूम में ही आईने के सामने एक टॉक शो की एंकरिंग का अभ्यास करने लगा। सोमवार का दिन था, अच्छी से शेवकर चेहरे को काफी अच्छे से धोया। पुनः तैयार होकर साढ़े दस के करीब कॉलेज को गया। वहाँ पर फाइनल प्रोजेक्ट में हमारे ग्रुप में शामिल सभी सदस्य उपस्थित थे, मित्रों की मदद से येन-केण प्रकारेण स्क्रिप्ट तैयार हुई और मुझे केवल उसका अभ्यास करना था। बीच में स्टेज की तैयारी और छोटी-से-छोटी व्यवस्था मित्रों के द्वारा की जा रही थी, अगर मैं कोई मदद करता, तो मुझे स्क्रिप्ट की तैयारी करने पर जोर दिया जाता। शिॿक और मित्रों को पूरी आशा थी कि मैं कार्यक्रम को काफी अच्छे ढ़ंग से एंकर नहीं कर पाऊँगा और वहीं हुआ भी। बीच में लंच ब्रेक के लिए डेढ़-पौने दो के करीब सभी मित्र गए, मुझे अभ्यास करने के लिए स्टूडियों में छोड़ दिया, यानी कि लंच से भी हाथ धोना पड़ा। खैर.. । स्टूडियो में तीन बजे के करीब जो गेस्ट आने थे वे एकाएक आ गए.. क्योंकि स्टूडियो में लाइटिंग, कैमरा इत्यादि लगकर तैयार ही हुए थे। मुझे अभ्यास करना था... लेकिन कुछ हो न सका। दोनों गेस्ट, विकास और अशोक, आकर डायस के पीछे हो गये। मैनें दोनों को ब्रीफ किया। फिर शुरू हुआ.. लाइट...कैमरा... एक्शन। पहले टेक में हो गई गड़बड़ी.. फिर लेना पड़ा दूसरा टेक .. इसमें किसी तरह भूमिका बाँधी.. मुद्दे पर उतरा। फोनो आदि लेकर किसी तरह टॉक शो को समाप्त किया। लड़खड़ाना और आत्मविश्वास की कमी पूरे शो के दौरान रही। फिर आलोचना भी सुनना वहाँ उपस्थित लोगों से .. खैर ये तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम अच्छा न जाने का काफी गुस्सा था। गेस्ट लोग तुरंत ही वहां से चले गये। उनके लिए मँगवाया गया नाश्ता हम सभी ग्रुप के सदस्य ही कैंटीन में जाकर समाप्त किए। फिर एम्फीथियेटर में जाकर मैगजीन बनाने को लेकर मीटिंग की। हमारे फाइनल प्रोजेक्ट के चार प्रोजेक्ट पूरे हुए थे अतः सभी खुश थे.. लेकिन मेरे द्वारा किया गया यह कार्यक्रम मुझे आत्मिक संतुष्टि न दे सका। मन अस्थिर था। ग्रुप लीडर दीपेंद्र के साथ कस्तूरबा गांधी क्रासिंग से बस पकड़े .. उससे कहा भी यार मूड काफी ऑफ है कार्यक्रम को लेकर। घर लौटा। आते ही खाना खाने की आदत थी लेकिन उस दिन कैंटीन में लिए गए रिफ्रेशमेंट से भूख मर गयी थी। बिछावन बिछाया और शाम छह बजे के करीब लेटने का प्रयास किया। मन एकदम नहीं लग रहा था .... सोच रहा था कि बड़े भैया के यहाँ अंबेडकर नगर चला जाऊँ। तभी छहः बीस के करीब उन्हीं का फोन आया कि नारायण का मुंबई से फोन आया था .. वह तुमसे बात करना चाह रहा हैं मैनें सोचा कोई बात होगी, फिर आँख बंद कर लेट गया। फिर पाँच मिनट बाद उन्हीं भैया का फोन आया.. वे रोते रोते बोल रहे थे......" तुम जल्दी घर जाओ... तुम किसी भी तरह घर जाओ " मैने पूछा .. " क्या हुआ? " उन्होंने कहा, " पापा नहीं रहे "। एकाएक काफी बड़ा झटका लगा। बिछावन लपेटा, और जल्द ही कपड़े समेटने लगा। बैग तैयार किया और फिर अविनाश को बोला मुझे एनीहाउ स्टेशन छोड़कर आओ .. पापा नहीं रहे। वह भी जल्दी से तैयार हुआ। हम नीचे उतरे, पार्क के पास ऑटो किया, ज्योंहि कुछ दूर गया, पैसा व एटीएम कार्ड चेक किया। पैसा था नहीं, एटीएम कार्ड हड़बड़ी में छूट गया। वहीं ऑटो छोड़ा, तभी नीरज भैया को फोन किया और पूछा .. कैसे हुआ? तुम स्थिर से आ जाओ। ताज्जुब की बात कि उन्हें पता नहीं था। वापस रूम पर आते वक्त संतोष टिंकू मिला, उसे बताया। रूम पर आया, इमरान आ चुका था, उसे बिना बताए गया। संतोष,अविनाश और मैं ऑटो से जा रहे थे, यमुना पार करने के वक्त पवन भैया का फोन आया, 'तुम हमारे पास आ जाओ, तुम्हारा टिकट हो गया। ऑटो को आईटीओ पुल से ही अंबेदकर नगर की ओर मोड़ा, दोनों दोस्तों को छोड़ दिया। रूम पर पहुँचने से पहले थाने के पास अवस्थित एटीएम से पैसा निकाला .. ऑटो को रूम पर पहुँचने पर दिया। वहाँ दो-तीन घंटे बीताकर ग्यारह बजे रात में एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। मुंबई से बड़े पापा, बड़ी माँ व पंकज भैया आने वाले थे, उनका वेट किया, टर्मिनल 2 पर फिर रात एक बजे उन लोगों की फ्लाइट आयी वहाँ हमलोग बाहर आकर थोड़ी देर बैठे। क्योंकि हमारी पटना के लिए फ्लाइट सुबह 6.30बजे थी।
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