पापा की याद में..
(तीन साल पहले पापा के एकाएक हमें छोड़ कर चले जाने के बाद जो रिक्तता उत्पन्न हुयी.. उन पलों को डायरी के पन्नों पर उकेरा था.. उन्हीं के अंश..)
"जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या भला बुरा"
कुछ यूँ ही जीवन जीते अपने अंतिम क्षणों तक काम में रत एक कर्मयोगी ने इस पृथ्वीलोक को छोड़ दिया 9 अप्रैल, 2007 को। जिंदगी भर काम में, दूसरे की सहायता करने और ज्यादा से ज्यादा दूसरों का भला हो सके- इसी में लगे रहे।
4 फरवरी 1947- देश आजाद होने की ओर अग्रसर था, उस समय बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी नामक स्थान पर श्री ज्वाला प्रसाद गोयनका और उनकी धर्मपत्नी सोना देवी को द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बालक बचपन से ही प्रखर स्वभाव का था। पूर्व जन्म में बंग देश का राजकुमार, जो कि काफी जिद्दी स्वभाव का था- जिस कारण काफी लोगों के काम में बाधा आती, पुनः एक वैश्य परिवार में जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। फिर उच्च शिक्षा हेतु जिला मुख्यालय स्थित बिहार विश्वविद्यालय से बी।ए। फिर एम।ए। की शिक्षा प्राप्त की। इसी क्रम में 22 वर्ष की अवस्था में 1969 ई. में 3 फरवरी को प्रेमलता नामक कन्या से विवाह हुआ। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् पी.टी.आई., भाषा व समाचार नामक एजेंसियों से जुड़े। फिर स्थानीय महाविद्यालय में राजनीति के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए। कालांतर में उपाचार्य पुनः विभागाध्यक्ष के पद तक पहुँचे। साठ वर्ष की आयु अभी पूर्ण ही हुई थी कि पटना से सीतामढ़ी लौटते वक्त रास्ते में ही मुजफ्फरपुर सरकारी बस स्टैंड पर गर्मी के कारण मूर्च्छित हो गिर पड़े वही अनंत की यात्रा को निकल पड़े।
(तीन साल पहले पापा के एकाएक हमें छोड़ कर चले जाने के बाद जो रिक्तता उत्पन्न हुयी.. उन पलों को डायरी के पन्नों पर उकेरा था.. उन्हीं के अंश..)
"जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या भला बुरा"
कुछ यूँ ही जीवन जीते अपने अंतिम क्षणों तक काम में रत एक कर्मयोगी ने इस पृथ्वीलोक को छोड़ दिया 9 अप्रैल, 2007 को। जिंदगी भर काम में, दूसरे की सहायता करने और ज्यादा से ज्यादा दूसरों का भला हो सके- इसी में लगे रहे।
4 फरवरी 1947- देश आजाद होने की ओर अग्रसर था, उस समय बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी नामक स्थान पर श्री ज्वाला प्रसाद गोयनका और उनकी धर्मपत्नी सोना देवी को द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बालक बचपन से ही प्रखर स्वभाव का था। पूर्व जन्म में बंग देश का राजकुमार, जो कि काफी जिद्दी स्वभाव का था- जिस कारण काफी लोगों के काम में बाधा आती, पुनः एक वैश्य परिवार में जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। फिर उच्च शिक्षा हेतु जिला मुख्यालय स्थित बिहार विश्वविद्यालय से बी।ए। फिर एम।ए। की शिक्षा प्राप्त की। इसी क्रम में 22 वर्ष की अवस्था में 1969 ई. में 3 फरवरी को प्रेमलता नामक कन्या से विवाह हुआ। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् पी.टी.आई., भाषा व समाचार नामक एजेंसियों से जुड़े। फिर स्थानीय महाविद्यालय में राजनीति के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए। कालांतर में उपाचार्य पुनः विभागाध्यक्ष के पद तक पहुँचे। साठ वर्ष की आयु अभी पूर्ण ही हुई थी कि पटना से सीतामढ़ी लौटते वक्त रास्ते में ही मुजफ्फरपुर सरकारी बस स्टैंड पर गर्मी के कारण मूर्च्छित हो गिर पड़े वही अनंत की यात्रा को निकल पड़े।
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