एक पिता और पुत्र का संबंध काफी गहरा होता है। पुत्र को माँ जन्म देती है, संस्कार देती है और अच्छे गुणों का विकास करती है, इससे पिता की भूमिका कम नहीं हो जाती है। बचपन से ही कनिष्ठ पुत्र होने के कारण सभी तरह की माँगों को पूरा किया जाता रहा। इतरने व रोकर बात मनवाना जो कि हर बच्चे का जन्मजात अधिकार होता है, वह भी काफी किया। बचपन से किशोरावस्था से युवावस्था आने तक पिता से लगाव पूर्व की भाँति बना रहा। सभी छोटे-मोटे कामों के लिए सिपु की आवाज काफी थी मेरे लिए। कभी-कभी गुस्सा भी आ जाता, मैं ही क्यों करूँ सारे काम? लेकिन इसमें भी एक अलग मजा था। हर छोटी बातों और बड़ी गलतियों को सहा पापा ने। क्या कुछ न किया? लेकिन हम उनके जीते-जी कुछ बनकर ना दिखा सके। एक खुशी जो अभिभावक के चेहरे पर तैरती है जब उनका बेटा अपने पैरों पर खड़ा होता है .. वो खुशी ना दे सके। इस बात का मलाल जिंदगी भर रह जाएगा। भाग्य में यही लिखा था। आजीवन तो सभी सुखों को इंतजाम करते रहे, लेकिन जब अपना वक्त आने वाला था पुत्रों से सेवा लेने का..... निष्ठुर, निस्पृह तरीके से हमें छोड़ अनंत की यात्रा की ओर निकल पड़े। कुछ कहने को न छोड़ गये। कुछ बयाँ नही कर सकते।
Thursday, February 11, 2010
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