ऑरकुट पर रितेशजी का यह संबोधन कि अंकल और आंटी को नमस्ते कहिएगा .. एक हद तक मुझे अलग लगा। मैंने ऑरकुट पर रिप्लाई किया कि पापा नहीं रहे ... और कारण बताया। क्योंकि पापा की कमी कोई पूछे तो अजीब सा लगता है। काफी भावुक हो जाता हूँ। इसी तरह मम्मी से बात करते हुए गुरूवार को सुबह 10 बजे मन के किसी कोने का यह गुब्बार कि "कुछ भी नही कर सके हम पापा के लिए"कहने के बाद गला भर आया। काफी तसल्ली हुई कि यह बात निकल कर आयी नहीं तो अपने आप से कह कर अपने को कोसने का सिलसिला चल रहा था। फिर भी यह तो जिंदगी भर मलाल रह ही जाएगा कुछ भी नही कर सके पापा के लिए और न ही उनके सामने कुछ बनकर दिखा सके। जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव आएँगे, लेकिन इस चीज का दुख जिंदगी भर बना रहेगा। ये कर्ज आजीवन रह जाएगा, अगर कभी मौका मिला आने वाले जीवन में तो काफी कुछ कर दिखाया जा सकेगा। अब तो प्रेरणा स्रोत बनकर ही जिंदगी में मार्गदर्शन करते रहेंगे, जो काफी अच्छा और संबल प्रदान करने वाला होगा।
Friday, February 12, 2010
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