हाल के वर्षों में दैनिक जागरण अखबार में कसौटी सप्लीमेंट में किसी एक मुद्दे पर देश के अग्रणी लेखकों का मत चार पन्नों पर देखने को मिलता, पाठकों की चिठ्ठियाँ भी उन लेखों का मूल्यांकन करती। इसी सप्लीमेंट में पिताजी द्वारा एक लेख भेजा गया जो कि छपा भी और दैनिक जागरण समूह ने अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए कि आपके लेख के लिए जो पाँच सौ रूपये भेजे जा रहे है वह कम हैं फिर भी आप हमारी इस तुच्छ भेंट को स्वीकार करेंगे - पाँच सौ का चेक भी भेजा। पैसा उतना महत्व नहीं रखता लेकिन अखबार में आलेख के रूप में तीन-चार बार पापा का आलेख निकलना- हमारे लिए गर्व का विषय था। एक बार प्रो. निर्मल गोयनका व एक बार एन.के.गोयनका के नाम से लेख छपा। फिर लेखक का कुछ शब्दों में दिया जाने वाला परिचय भी भिन्न रहा करता था। लेख पर पाठकों की टिप्पणी पापा को काफी पसंद थी क्योंकि लेख की प्रशंसा हो रही हो या लेख को सराहनीय माना जा रहा हो। पापा से ज्यादा हमें इंतजार रहता था शुक्रवार को दैनिक जागरण का। पापा को भी रहता लेकिन वे अगले अंकों में छपने वाले विषय के लिए.......
Sunday, February 14, 2010
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