मास्टरकार्ड का एक एड् जिसमें एक बेटा अपने पैरेंटस को पहली विदेश यात्रा पर बुलाता है, लक्जरी कार में बैठाता है और एम्यूजमेंट पार्ट में अपने पैरेंटस को बच्चों सरीखी हंसी करते हुए रॉलर कॉस्टर पर देखता है। एक एड् यह और दूसरा LIC का एड् जिसमें एक नौजवान अपने बचपन को याद करता है उसमें फ्लैशबैक में यह दिखाया जाता है कि कैसे उसका पिता बचपन में एक पार्टीशन देकर बेटे के लिए रूम के भीतर उसके लिए एक रूम बनाता है। वही बेटा बड़े शहर में अपने माता-पिता को नये घर बुलाता है। पिता द्वारा लाया गया एक गिफ्ट, नेमप्लेट, जिस पर बेटे का नाम अंकित रहता है। तो बेटा कहता है- इसकी कोई जरूरत नहीं.... दरअसल घर के आगे वेंकट राव ( पिता के नाम की पट्टी) लगी रहती है। ऐसे कुछ एड्वर्टिजमेंट देखकर दिल के किसी कोने में टीस सी उठती है कि अपने जीवन में पिताजी ने तो काफी कुछ किया लेकिन हम उनके लिए कुछ नहीं कर सके। कुछ सपने हमने भी संजोए थे कि पापा को कुछ दे सकूँ लेकिन जिंदगी भर किसी का एहसान न लेते हुए हम सबको छोड़ चले। इस बात का इतना मलाल रहेगा, इस जिंदगी में तो क्या, आने वाली जिंदगियों में भी मैं इस बोझ से दबा रहूँगा। वैसे भगवान कुछ करता है तो उसके पीछे भी कोई बात होगी।
Sunday, February 14, 2010
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