Monday, February 15, 2010

पेंसिल नहीं लीड से लिखेंगे

स्कूल में पढ़ने के दौरान तीसरी कक्षा तक पेंसिल से हमें लिखना पड़ता था, पर जैसे ही चौथी कक्षा में आना होता, तो बड़ों की तरह कलम/लीड/पेन से लिखने की स्वतंत्रता हमें भी होती। बस, इसी बात का उत्साह था कि हम भी कलम से लिखेंगे। दिसंबर के अंत में पापाजी के साथ रिक्शा पर बैठकर जाना हुआ था कलम खरीदने के लिए। तब बाटा के सामने रामनाथ चाचा की दूकान हुआ करती थी - 'जरूरत', वहीं पर पहुँचे। कलम की बात तो रिक्शे पर जाने के वक्त से हुई , वहाँ दूकान पर पहुँचकर पापा ने इसकी चर्चा अपने दोस्तों से की। कलम वहाँ से लिये कि या किसी और जगह से, ये तो ध्यान नहीं लेकिन कलम ली गयी थी। अरे .... भाई आखिरकार बच्चे थोड़े ही रहे थे, जो कि पेंसिल से लिखो, गलती हुई रबड़ से मिटाओ। कटर से छीलो। माने इन सभी चीजों से एक साथ छुट्टी। बड़े होने का एहसास हुआ, लेकिन इतना भी नहीं कि बहुत बड़े हो गये। घर पर लौटा होऊँगा, सभी को दिखाया होऊँगा। काफी खुश था, ये तो मुझे याद है, बाकी आगे-पीछे की बातें ध्यान नहीं है। वो भी एक पल थे... जब पापा ने मेरी भावना को समझा... एक पेंसिल से कलम के परिवर्तन को महत्व दे स्वयं साथ लेकर गए और कलम दी थी नन्हें हाथों में।

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