Tuesday, February 16, 2010

लम्हें कम नहीं

पापा के साथ बिताए गए लम्हों की कोई गिनती नहीं, लेकिन जब इनको कलमबद्ध करने की सोचता हूँ तो लगता है कि यह संभव नहीं... क्योंकि वो एक एक लम्हें जो पापा के साथ बिताए.. एक तरह से मेमोरी में है भी, नहीं भी। आँखों के सामने जितनी तेजी से आते है, उतनी तेजी से ओझल भी हो जाते है। वैसे लम्हें स्मृति में ज्यादा अंकित है, जिसमें किसी बात पर हमारी उनसे सहमति नहीं हो या जिसमें मुझे डाँटा गया हो। लेकिन आज ना डाँटने वाला कोई है ना किसी से वैसी असहमति बन पाती है। पिता-पुत्र के स्तर पर बातों की सहमति और असहमति का अलग मतलब और महत्व होता है। दिल्ली से एम.ए. करने के बाद लौटने पर वापस नहीं आने का कोई रास्ता नहीं बन पाया, यहाँ तक कि रिजल्ट भी एक साल बाद लेने दिल्ली आया था। उसी दौरान तिमारपुर में मैं जहाँ रहता था, वहाँ के भैया के यहाँ से सामान हटाने के मसले में हुई देरी में मानेटरी लॉस जो हुआ सो हुआ ही लेकिन एक प्रेशर बना रहा। एक लापरवाही की हद तक मैंने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। बाद में ऐसी स्थिति का सामना करना ही पड़ा जो कि नहीं आनी चाहिए थी। छोटा भाई, जो दिल्ली में रहता था, वो भी सामान नहीं निकाला। बाद में उन सामानों में से मैंने बहुत कुछ खोया भी।

1 comment:

  1. अच्छा प्रयास है।

    अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानियां, नाटक, कॉमिक्स इत्यादि मुफ्त डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया किताबघर से डाउनलोड करें । इसका पता है:

    http://Kitabghar.tk

    ReplyDelete