Sunday, February 21, 2010

भोपाल में फिर से

कल यानि स्वतंत्रता दिवस के दिन भोपाल फिर से आना पड़ा, कार्यक्रम एकाएक बना। पापा के जाने के बाद पिछले साल आयी एक समस्या के बाद यह दूसरी समस्या हमारे परिवार के सामने आयी। दुःख या संकट के समय परिवार के साथ खड़ा होना एक महती आवश्यकता होती है। भोपाल में स्वतंत्रता दिन के दिन आकर यहाँ एक स्वतंत्र मस्तिष्क से स्वतंत्र करने की एक अभिलाषा को पूरा किया गया। पापा रहते तो शायद मुझे यहाँ नहीं आना पड़ता। स्थिति अलग होती। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनी और ऑफिस में लगातार तीन दिन छुट्टी होने के कारण भी इस गार्डियन को संपन्न कराने वाले काम को मुझे ही संपन्न कराना पड़ा। बाकी दिन भोपाल के इस फ्लैट की चाहरदीवारी में परतंत्रता से ही गुजरा। आज यानि रक्षा-बंधन के दिन भी एक रूम में कैद पा समय बीता रहा हूँ ताकि रात में 9।30 बजे के करीब ट्रेन पकड़ वापस दिल्ली को रवाना हो जाऊँ। शाम के वक्त 'राज एक्सप्रेस' के कार्यालय जाकर किस प्रकार अखबार का काम होता है वह चीज देखने को मिलेगा यानि कि कुछ समय का सदुपयोग हो सकेगा। पिछली बार भी पापा की अनुपस्थिति में आना पड़ा और उसके पिछले बार आए थे तो जाने के बाद समस्या खड़ी हुई थी। इसबार ऐसा कुछ नहीं होगा। आमीन।
( 16 अगस्त 2008 को लिखा गया)

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