Sunday, February 14, 2010

अंतिम फोन की बातें भी ध्यान नहीं

यूँ तो जनवरी से मार्च तक आठ-दस दिन के अंतराल पर पापा से बातें हो जाया करती थी, लेकिन बात का बिंदु हमेशा एक ही हुआ करता था.... और सब ठीक है। पैसा भेज दे क्या? या कभी कभी यह बताने के लिए फोन किया करते थे कि तुम्हारे एकाउंट में इतना पैसा डाल दिये है, चेक किया क्या? मार्च के अंत में कभी बात हुई होगी। अप्रैल में 8 को बड़े भैया से बात हुई जो पापा के साथ पटना गये हुए थे। मैंने घर पर मिस कॉल की और नीरज भैया के फोन पर भी। घर से मम्मी का कॉल पहले आ गया, जिससे पता चला कि पापा नीरज भैया के साथ पटना गये है कोई केस के सिलसिले में। अंतिम दिनों में विश्वविद्यालय के खिलाफ काफी RTI के तहत सूचनाएं माँगी थी। विवि प्रशासन भी नाराज था। तभी पटना के लैंडलाइन के नंबर से कॉल आया, मैंने मम्मा को फोन रखने को कहा, फिर इधर बात की, नीरज भैया से बात हुई तो मैंने यहाँ के डेवलपमेंट के बारे में बताया, ऐसे ऐसे लोकसभा टीवी के लिए इंटर्न के लिए इंटरव्यू देकर आए हैं। मैं समझा कि वे कहीं बाहर से बात कर रहे है। लेकिन मुझे क्या पता था कि वे ए.के.गुप्ता के फोन से बात कर रहे थे और पापा वहीं थे। अगर उस वक्त पापाजी से बात हो जाती तो वह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात होती, होनी में कुछ और लिखा था।
(18 जनवरी 2008 को लिखा गया।)

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