सत्तर के शुरूआती वर्ष में पापा के हाथ की कलम समाचार एजेंसियों भाषा व हिंदुस्तान समाचार जैसी एजेंसियों के लिए चला करती थी। उस समय के भी कुछ गाथाएँ पापा ने कभी हमसे शेयर की थी। डी एम तक को डरना पड़ता था। प्रेस क्लब के लिए सीतामढ़ी के प्रेस रिपोर्टरों की फोटो में साइड में बैठे पापा की तस्वीर अभी तक स्मृति में अंकित है। उस रिपोर्टर का जीन ही अभी मुझे कलम चलाने को मजबूर कर रहा है। कहा जाता है ना कि उसके पिता का पेशा बेटे की जीन में होता है वही बात है। इसी का असर है कि कुछ पढ़ लिख लेते है। नहीं तो कहा संभव था यह फील्ड चुनना। कहाँ से कैसे इस फील्ड में आ गये.. पता ही नहीं चला।
पापा के समय रिपोर्टिंग और काफी चीजें शेयर करने का ऑरिजनल समय तो अब आया था। कुछ वो बताते कुछ हम बताते। ये बात तो निश्चित ही थी कि दोनों समय की रिपोर्टिंग में काफी अंतर है लेकिन रिपोर्टिंग तो रिपोर्टिंग होती है। प्रिंट मीडिया ही सारा का सारा ब्राडकास्ट में आ रहा है.. तब हम जैसे लोगों की क्या स्थिति होगी.. समझ सकते है।
पापा के समय रिपोर्टिंग और काफी चीजें शेयर करने का ऑरिजनल समय तो अब आया था। कुछ वो बताते कुछ हम बताते। ये बात तो निश्चित ही थी कि दोनों समय की रिपोर्टिंग में काफी अंतर है लेकिन रिपोर्टिंग तो रिपोर्टिंग होती है। प्रिंट मीडिया ही सारा का सारा ब्राडकास्ट में आ रहा है.. तब हम जैसे लोगों की क्या स्थिति होगी.. समझ सकते है।
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