जिंदगी में किसी न किसी चीज की लत रहती ही है आदमी को। शुरूआत के दिनों में पापा के लिए पान लाना हमारी दिनचर्या में शामिल था जर्दा थोड़ा सा लेते थे। ये आदत काफी दिनों तक बनी रही जब तक बाजार में पान पराग का गुटखा नहीं आया। बाजार में पान-पराग का मार्केट तो था ही लेकिन पान-पराग का गुटखा उतना नहीं चला। गपशप,मधु इत्यादि शुरूआती दिनों के घटिया क्वालिटी के गुटखे थे। इसी बीच तुलसी मिक्स नाम का गुटखा आया। बेहतरीन क्वालिटी का होने के कारण कम दिनों में ही इसने मार्केट में साख बना ली। पापा का भी परिचय हुआ इस पुड़िया से। फिर क्या था सिलसिला ही शुरू हो गया। टी एम संक्षिप्त नाम से पुकारते। मैं तो जहर की पुड़िया कहने से बाज नहीं आता। मार्केट में शार्टेज की स्थिति में पाउचों का एक पैकेट ही घर पर होलसेलर से मँगा लेते। इधर के दिनों में चार पुड़िया (दस रूपये की) निश्चित रूप से मैं सब्जी के साथ लाता। नहीं तो मंडलजी लेकर आते। घर के खर्चें की कॉपी में इंटरटेनमेंट वाले खाने में 10.00 टी एम नियमित रूप से सब तारीखों के आगे लिखा होता। इसने भी कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभायी होगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
Sunday, February 14, 2010
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