Sunday, February 14, 2010

सान्या, पापा और मैं

रात में सोने से पूर्व पापा पैर दबवाते थे.. कभी मन से तो कभी अनिच्छा से पैर दबाता था, लेकिन जब से सान्या, पापा और मैं रात में सोने से पहले पापा के रुम में रहते तो सान्या को कहानी सुनने की आदत थी। पापा फिर कहानी सुनाते... राजा-रानी की नहीं बल्कि सान्या की ही। कैसे हम फलां दिन रिक्शे से.. ( मंडलजी का रिक्शा) बाजार में हम यहाँ गये, हमनें ये किया, हमने वो किया। इस तरह सान्या भी कहानी सुनकर अपने को इस घटना से रिलेट करती और काफी खुश होती। चूँकि कहानी सच्ची होती और कई बार हम भी साथ में हुआ करते तो हम भी कुछ जोड़ देते और सान्या की हाँ-हाँ चलती रहती। इसी बीच मेरे द्वारा पापा का पैर दबाने का काम चलते रहता था। रात के वक्त बिताए गए पल अब कहाँ मय्यस्सर होने वाले। सान्या को कहानी सुनाने के वक्त एक बात तो स्पष्ट होती थी कि पापा का फिक्शन में कभी भी इंटरेस्ट नहीं रहा। नॉन-फिक्शन में ही हमेशा विश्वास रहा और अंत समय तक इसी पर कायम रहे। नॉन-फिक्शन से आप अपने को रिलेट जो कर लेते हो।

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