क्रिकेट से पुराना नाता रहा पापा का। सीतामढ़ी डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एशोसिएशन से जुड़े थे। घर में काफी सारी फोटो थी क्रिकेट के मैदान की या एसडीसीए के किसी समारोह की। लेकिन यहाँ जिक्र मैं उस रूप से नहीं कर रहा बल्कि इस रूप में कर रहा हूँ कि टेलीविजन के सामने एक दर्शक के रूप में काफी नजदीक से देखा है। भारत का कोई भी मैच हो काफी तन्मयता से देखते। घर में हमें भी इस बहाने देर तक क्रिकेट देखने की छूट थी। वन-डे मैचों में तो कलर टीवी, अगर बिजली जाने के स्थिति में काम ना करे, तो ब्लैक एंड व्हाइट के लिए 12 वोल्ट की एक बैट्री पहले से ही बुक करा देते थे। मैच का इतना शौक था कि '70-72 से '88-90 तक वेस्टइंडीज में होने वाले मैचों को रात-रात भर रेडियो पर कमेंट्री के रूप में सुना करते थे, वो अलग बात है कि इससे मम्मी के नींद में खलल पड़ता था, लेकिन वो कुछ नहीं बोलती। इधर, विश्व कप 2007 के दौरान भारत का पहले राउंड में ही बाहर होना उन्हें काफी खला होगा। वर्ल्ड कप के दौरान ही उनका भी जिंदगी की दौर से एकाएक रन आउट हो जाना हमारे लिए किसी सदमे से कम। दसियों एडिशन वर्ल्ड कप के होंगे लेकिन पापा का कोई जोड़ नहीं।
Sunday, February 14, 2010
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