एक अदम्य इच्छा कि पापा के बारे में काफी कुछ लिखूँ- इसी का परिणाम है डायरी। शुरूआती पृष्ठों में भृगु संहिता में पापा के विषय में लिखी बात कलम से उतरती चली गयी जो कि अच्छा संकेत नहीं है फिर भी ऐसी मनःस्थिति में शुरूआत के पन्ने लिखे गये जिसकी कल्पना एक भुक्तभोगी ही कर सकता है। जिंदगी के कितने उतार-चढ़ाव के साक्षी पापा से काफी कुछ सीखने को मिला। शारीरिक रूप से जन्म देने वाले पिताजी से से मानसिक रूप से काफी कुछ पढ़ने लिखने जानने को मिला। जन्म से लेकर आज तक खिलौनों से कफी पाला पड़ा ही नहीं- जब से होश संभाला अपने को दो-चार अखबारों व दो दर्जन मैंगजीनों के बीच पाया। पढ़ने का वातावरण था क्यों ना कहानी की ही किताब पढ़े। चंदामामा,नंदन, गुड़िया,नन्हे सम्राट न जाने कब साप्ताहिक हिन्दुस्तान, रविवार,माया में बदल गये। अंग्रेजी अखबार पढ़ते-पढ़ते कब अंग्रेजी समझ में आ गयी... पता ही नहीं चला। मानसिक रूप से तैयार करने में इतना योगदान देने वाले के विषय में अपनी कलम भी ना चलाऊं तो अपने प्रोफेशन पर भी हमें शर्म आएगी। काफी कुछ लिखूँगा.. यही ध्येय है।
Friday, February 12, 2010
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