Sunday, February 14, 2010

मंडलजी...

परिवार के एक सदस्य के रूप में मंडलजी ने काफी कम दिनों में अपना स्थान बना लिया। पापा का पेटेंट रिक्शेवाले के रूप में मंडलजी को लगभग कॉलेज, दूकान और बाकी उन जगहों पर पापा जहाँ-जहाँ जाते, सभी पहचानते थे। सुबह कॉलेज जाना हो तब या शाम में बाजार जाना हो पापा को..... मंडलजी रिक्शा लेकर हाजिर। उनके बिना तो पापा को कही जाना भी मुश्किल लगता था। कभी लेट हो जाने पर काफी गुस्सा आता... लेकिन कुछ बोलते नहीं। ऐसा नहीं है कि किसी और रिक्शेवाले से काम नहीं चलता ... लेकिन घर की गली इतनी लंबी थी कि वहाँ से निकलना ही थोड़ा मुश्किल होता। वैसे मंडलजी को भी रिक्शा लगाने के लिए घर के आगे सड़क पर लगा देते। और उनके दिन की शुरूआत पापा के कॉलेज जाने से ही होती। एक पूरक बन गए थे। पापा द्वारा भाड़ा के रूप में भी अच्छा पैसा मंडलजी को मिलता, जिसका मैं काफी विरोध करता। लेकिन पापा के अंतिम समय में (काम के वक्त) इस व्यक्ति ने जितना काम किया... उतना अन्य कोई ने नहीं किया। एक ऋण चुकाया रामअनेकजी ने ( मंडलजी का नाम).

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