अगस्त 3 तक स्वपन में रह रह कर पिताजी का बार-बार आना... कुछ ही ॿण के लिए उनके निकट ले जाता था, काफी अच्छा लगता था। नींद टूटने के बाद चेतना में आने पर चलता कि पिताजी अब हमारे बीच नहीं है .. काफी दुख पहुँचाता।
जब तक हम स्वप्न में रहते है तो ऐसा लगता है कि जो हम देख रहे है वही वास्तविक दुनिया है लेकिन वास्तविकता में आने पर हमें अपनी गलती का एहसास होता है कि जिसे हम देख रहे है वह वास्तविक नहीं है। वास्तविकता तो जागृत अवस्था यानि नींद से टूटने पर है। ठीक इसी प्रकार इस वास्तविकता से बाहर कोई परावास्तविक दुनिया होगी जो इस दुनिया की वास्तविकता से दूर हमें ऐसे धरातल पर ले जाएगी .. जहाँ पर क्या है? यह तो तब ही मालूम चलेगा।
पापा के मेरे स्वप्न में आने से यह बात तो सिद्ध होती है कि मैं उनके कितने करीब था। वैसे भी यह बात जग-जाहिर थी, वो पेट पर हाथ फेरना.. काफी चर्चा का विषय हुआ करता था दादी के घर में .. अब तो कुछ भी न रहा न स्वप्न न यथार्थ।
जब तक हम स्वप्न में रहते है तो ऐसा लगता है कि जो हम देख रहे है वही वास्तविक दुनिया है लेकिन वास्तविकता में आने पर हमें अपनी गलती का एहसास होता है कि जिसे हम देख रहे है वह वास्तविक नहीं है। वास्तविकता तो जागृत अवस्था यानि नींद से टूटने पर है। ठीक इसी प्रकार इस वास्तविकता से बाहर कोई परावास्तविक दुनिया होगी जो इस दुनिया की वास्तविकता से दूर हमें ऐसे धरातल पर ले जाएगी .. जहाँ पर क्या है? यह तो तब ही मालूम चलेगा।
पापा के मेरे स्वप्न में आने से यह बात तो सिद्ध होती है कि मैं उनके कितने करीब था। वैसे भी यह बात जग-जाहिर थी, वो पेट पर हाथ फेरना.. काफी चर्चा का विषय हुआ करता था दादी के घर में .. अब तो कुछ भी न रहा न स्वप्न न यथार्थ।
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