एम.ए. करने के तीन साल बाद फिर दिल्ली जाकर मास कम्युनिकेशन करने का मौका बना। भिन्न-भिन्न एन.जी.ओ. में कामकर के 20-22 हजार रूपये स्टेट बैंक में जमा कर लिए थे और ए.टी.एम. कार्ड साथ था। पिछली बार ऐसी सुविधा ना थी। सभी कार्यक्रम गुपचुप बन गया था। पापा को इसकी जानकारी थी कि मुझे पता नहीं। 19 जून '06 की यात्रा थी नरकटियागंज से, इसलिए सुबह छह बजे वाली ट्रेन पकड़नी थी। मैं सुबह उठकर तैयार होने के क्रम में लगा, इसी बीच पापा जो कि आठ-नौ बजे से पहले कभी उठते नहीं वे सुबह छह-सवा छह बजे उठकर आगे गेस्ट रूम में लैपटॉप पर अपने ताश के गेम्स खेल रहे थे। मुझे ये डर था कि बता दूँगा, तो जाने की परमिशन नहीं मिलेगी,इसलिए सूटकेश भी तैयार कर बिछावन के पीछे छिपाकर रखा था। सब तैयार होने के बाद जब जाने को हुआ क्योंकि अब पापा के सामने से ही जाना था, तो पापा ने पूछा, तो मैंने बताया ऐसे ऐसे दिल्ली जा रहा है और एक दोस्त जिसके यहाँ जा रहे है उसका नंबर और अपना बैंक एकाउंट नंबर खर्चें वाली कॉपी में लिख दिया है। संपर्क करना और पैसा भेजने के तरीके की जानकारी दे दी। पापा ने कहा- ठीक है। उस दिन को याद करके यह समझ में आता है कि उनसे कुछ भी छिपा नहीं था, आज भी कुछ छिपा नहीं होगा। सब कुछ उनके सामने ही तो घटित हो रहा है, ऐसा मानना है।
Sunday, February 14, 2010
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महोदय
ReplyDeleteनमस्कार
आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया बताएं क्या जनसंचार और जनसम्प्रेषण समानार्थी शब्द है ?
क्या ये शब्द एक दूसरे के पर्याय है ? Mass Communication को हिंदी में क्या लिखना चाहिए ?
धन्यवाद