कभी-कभी मन में यह ख्याल आता है कि मैं इन बातों को क्यूँ डायरी पर लिख रहा हूँ। पहले मैं लिखने की परिस्थितियों को बता देता हूँ। दिल्ली में मैं यहाँ टीवी पत्रकारिता का कोर्स कर चुका हूँ.. नौकरी की तलाश है। एक ऐसे ही स्ट्रगल का दौर चल रहा है और एकाकीपन खल रहा है। डायरी लिखने की आदत रही है। नियमित रूप से तो नहीं लेकिन '96 से अब तक टूटी श्रृंखला के रूप में कितनी डायरी के पन्नों में उल-जलूल लिख चुका हूँ। फिर मुझे इससे इतना प्रेम हो गया कि मैं संबोधन में भी प्रिय दैनंदिनी लिखा करता था। ये डायरी मूल रूप से मेरे अंदर चल रही बातों को लिखने का जरिया है और साथ ही एकाकीपन को भरने का भी। पिताजी का जाने का, वह भी आसमयिक, काफी दुख हुआ। उनकी स्मृतियाँ, उनके अतीत की बातों को सहेज के रखने का यह एक उचित जरिया लगा। साथ ही पिताजी की याद आने पर उनके विषय में इन पन्नों पर उनकी बातों और मेरे अंदर हो रहे उथल-पुथल को पन्नों पर लाना एक सुकून देता है। शायद ही मैं इन बातों को पढूँ,क्योंकि मैं इन्हें महसूस करते हुए लिख रहा हूँ, जो कि जीवन भर मेरे जेहन में रहेगा।
Sunday, February 14, 2010
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