Thursday, February 11, 2010

दिल्ली लौटने की जल्दी ..

सभी क्रिया-कर्म संपन्न होने के बाद वापस लौटने की जल्दी थी.. ये चीज मुझमें हमेशा से रही। पहले तो चलो सही है। लेकिन इस बार एकदम मन नहीं लग रहा था, जल्दी से छाया-श्राद्ध (छमाही) हो और दिल्ली को जाए। छमाही का डेट भी फिक्स नहीं था .. अतः लौटने का डेट भी फिक्स न हो सका था। अंततः तिथि आयी तो टिकट भी जाकर तत्काल से करवाया। 29/4 को सुबह छह बजे निकला पैसेंजर से लेकिन पैसेंजर ने तो उस दिन हालत ही खराब कर दी 2.55 पर नरकटियागंज पहुँची और दिल्ली वाली ट्रेन वहीं से 2.34 पर थी। मैं तो कहा ट्रेन छूटी। मैं अपनी जिद से जल्दी टिकट बनाकर आने के क्रम में था। मै तो कहा ये तत्काल वाली टिकट भी बर्बाद गयी और वापस घर जाना होगा सो अलग। पर जैसे ही ट्रेन नरकटियागंज स्टेशन पहुँची वैसे ही सप्तक्रांति भी पहुँची। 5 मिनट का स्टे था। दौड़ते-दौड़ते पहुँचे। मौसी पमपम के साथ स्टेशन पर एस-दो के आगे इंतजार कर रही थी मैं जैसे ही पहुँचा, सामान रखा कि ट्रेन निकल पड़ी। ठीक से मौसी से बात भी नहीं हो सकी। जल्दी के चक्कर में.. ट्रेन नहीं मिलती तो क्या हालत होती.. सोचकर हालत खराब हो जाती है।

No comments:

Post a Comment