मीडिया का कोर्स अपनी जिद पर मैंने ज्वाइन किया, ज्वाइन कर लेने के बाद अक्टूबर 2006 में घर जाना हुआ बैंक से लोन लेने के सिलसिले में, पापा से वही अंतिम मुलाकात थी, ---- के तहत पूरे एक सवाल के लिए दिल्ली के ताज होटल ने दो पत्र भेजे थे- दोनों केबीच काफी लंबा गैप था,लेकिन पत्र एक जैसे थे। पापा ने पूछा था- बाद वाला लेटर क्यूँ भेजा, मेरी निगाहें अंतर को पहचान ना सकी, तब पापा ने कहा था- क्या पॼकार बनोगे। आज जब सरकार के भोंपू यानि डी डी न्यूज में पैकेजिंग डेस्क पर हूँ तो भी मैं अपने को पत्रकार नहीं मानता अभी भी पॼकार बनने के लिए काफी कुछ सीखने की जरूरत है। कैसे शुरू करूँ, कहाँ से शुरू करूँ, कुछ समझ में नहीं आता। पत्र-पत्रिका में छपा आलेख निश्चय ही ज्यादा सुख देता है। नाम व प्रसिद्धि भी देता है, इसलिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा। वैसे मेरा कोर्स पूरा होने से पहले पाया पापा का हनें छोड़ चले जाना काफी बुरा लगा। जॉब भी शुरू के दिनों में अच्छी नहीं लगी, अब पापा के जाने के पूरे दो साल बाद डी डी न्यूज ज्वाइन किया तो खुशी तो है, लेकिन उतनी नहीं। अभी जिंदगी में बहुत आगे जाना है। कुछ न कुछ इस पत्रकारिता जगत को देना जरूर है, इसी आशा के साथ....... शुभ रात्रि
( 13 जून 2009 को लिखा गया)
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