पापा के साथ जुड़ी हुई कुछ पुरानी बातें भी हो जाएं तो यह एक सच्ची ॽद्धांजलि होगी। सबसे पुरानी बात की जाए तो अभी तो एक थप्पड़ का ख्याल आ रहा है जो कि 2 अप्रैल 1988 को पापा ने मुझे रसीदा था। इससे पहले पापा ने कभी भी मुझपर गुस्सा नहीं किया था। बात कुछ यूँ थी कि मैं कोर्ट बाजार वाले घर में एक बार एक लोटा पानी बाहर के कल से ला रहा था तो रास्ते में एक छात्र जो वहीं रहा करता था, ने पानी माँगा, मैंने देने के बजाए पानी वहीं गिरा दिया और लौटा। इसी बीच पापा कहीं से आए और गुस्से में पहले से ही थे, मेरी बात जानकर मुझपर ही गुस्सा निकाल दिये। पानी न देने के कारण मुझे पहली बार मार खाना पड़ी। मेरे को इससे पहले कभी भी मार नहीं पड़ी थी, इसलिए तारीख मेरे दिमाग पर उत्कीर्ण हो गयी। उस समय यह सोचने समझने की शक्ति नहीं थी कि क्यों मारा? ऐसा क्यों हुआ? बस मारा, ये चीज थ्यान में रह गयी। इस खट्टे-मीठे अनुभव को यादकर यह बात हमेशा दिमाग में कचोटती है क्यों नहीं उनका और लंबा साथ मिला। यूँ तो बीच-बीच में कई बार गुस्से का शिकार होना पड़ा, लेकिन उसमें कुछ मेरा ही दोष रहा करता था, लेकिन मैं ये मानने को तैयार नहीं होता।
Sunday, February 14, 2010
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