( यह आलेख जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा सितंबर 2006 में आयोजित साइंस राइटिंग वर्कशॉप में जाने के लिए हमारे संस्थान डिपार्टमेंट ऑफ फिल्म्स एंड टेलीविजन स्टडीज, भारतीय विद्या भवन में निबंध लिखने के लिए पाँच विषय दिए गए थे, उसी में से एक विषय पर लिखा गया था।)
ज्योतिष एक पूर्ण विज्ञान है। इस कथन की सत्यता जानने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि 'ज्योतिष' क्या है और 'विज्ञान' क्या है? पहले हम विज्ञान के विषय में ही चर्चा करें।
'विज्ञान' शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द साइंटिया ( Scientia) से हुई है जिसका अर्थ knowledge होता है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार- "विज्ञान एक व्यवस्थित ज्ञान है जो कि पर्यवेक्षण, तथ्यों की जाँच के पश्चात् ही प्राप्त किया जाता है।" साधारण भाषा में विज्ञान को इस तरह परिभाषित कर सकते है कि यह ज्ञान की वह सतत् प्रक्रिया है जिसमें कुछ सिद्धांत होते है, जो कि उदाहरणों या ठोस प्रमाणों द्वारा सिद्ध किये जाते है और हमें तर्कसंगत निष्कर्ष तक ले जाते है। जिसे एक विशेष द्वारा भी समझा जा सके और एक साधारण व्यक्ति द्वारा भी समझा जा सके। आजकल विज्ञान सिर्फ भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान को ही समझा जाता है, जो कि अनुभव और प्रयोग पर आधारित ज्ञान है। एक तरह से देखा जाए तो समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, इतिहास आदि भी विज्ञान है, लेकिन विज्ञान के हिमायती ऐसा मानने से इंकार करते है।
ज्योतिष की उत्पत्ति दो शब्दों ज्योति और ईश से हुई है। ज्योति का अर्थ- प्रकाश और ईश का अर्थ ईश्वर है अर्थात् ईश्वर का प्रकाश। कई विद्वानों ने उसकी परिभाषा विभिन्न प्रकार से दी है लेकिन यह मुख्य रूप से मानव के जीवन और भविष्य पर ग्रहों और तारों का पड़ने वाला प्रभाव है। ज्योतिष के अनुसार, सूर्य और प्रत्येक ग्रह का मनुष्य, पृथ्वी और जीवों पर अपना एक विशेष प्रभाव होता है। मनुष्य के जन्म के वक्त सूर्य और अन्य ग्रहों की स्थिति के आधार पर ज्योतिषी उस मनुष्य का न केवल भूत,वर्तमान और भविष्य बताने का प्रयास करता है बल्कि उसकी वयक्तिगत विशेषता और गुणों को भी बताता है।
यह एक साधारण सी बात है कि ज्योतिषी ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही मनुष्य के भूत के साथ-ही-साथ भविष्य को भी बताने की कोशिश करते है। यह मुख्य रूप से गणितीय गणना पर आधारित होती है और यह गणितीय गणना वैसे ही विभिन्न प्रकार की होती है जैसे कि एक भौतिक-शास्त्री अपनी बातों को समझाने के लिए विभिन्न गणितीय सूत्रों का सहारा लेता है।
यह भी एक सत्य है कि ज्योतिषी भविष्यवाणी करते वक्त अपनी अंतःप्रज्ञा का भी इस्तेमाल करता है ,जिससे कि भविष्यवाणियां सही हुआ करती है। इस प्रकार, ज्योतिष मुख्य रूप से कारण और प्रभाव की अवधारणा पर आधारित होता है, अतः इसे हम विज्ञान या कला कहे, कोई फर्क नही पड़ता। लेकिन, मनुष्य को अपने जीवन और भविष्य के विषय में जानने की उत्सुकता कम नहीं होती है जो कि इस विशेष ज्ञान अर्थात् ज्योतिष का वर्षों तक टिके रहने का कारण भी है।
यह भी उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर सत्य को सीमित नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसे समझने हेतु हमें दो प्रकार के ज्ञान की चर्चा करनी होगी- .तर्कसंगत ज्ञान 2. सहज बुद्धि। पहला ज्ञान मुख्य रूप से आँकड़ों, तथ्यों और घटनाओं से प्राप्त होता है, जिसका कि वैज्ञानिक आधार भी होता है। लेकिन सहज बुद्धि या अंतःप्रज्ञा मुख्य रूप से सत्य का सीधा आभास कराने से आती है, इसमें बुद्धि या तर्कसंगतता का कोई आधार नहीं होता है। इसे मुख्य रूप से इसे ईश्वरीय वरदान समझा जा सकता है। नास्त्रेदमस एक भौतिक-शास्त्री थे, न कि भविष्यवक्ता, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने अंतःप्रज्ञा के आधार पर ऐतिहासिक भविष्यवाणियाँ की।
उपरोक्त बातों का उल्लेख करने का एक ही मकसद है कि ज्योतिष में भी आँकड़ों का संग्रह किया जाता है, यथा किसी व्यक्ति विशेष की चारित्रिक विशेषता और उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं का अध्ययन ग्रहों की स्थिति और उस व्यक्ति पर ग्रहों के प्रभाव के कारण की जाती है। अगर हमें इस अध्ययन की जरूरत किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की विशेषता या घटनाओं के विषय में जानने के लिए पड़ती है, तो हम इसे कर सकते है। यह एक वैज्ञानिक विधि है, जिसका उपयोग विज्ञान की अन्य शाखाएँ भी करती है।
ज्योतिष चिर काल से चली आ रही विद्या है, जो कि मनुष्य के भविष्य संबंधी प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम है, जो कि विज्ञान की अन्य शाखाओं द्वारा संभव नहीं है। इसके अलावा यह मनुष्य के विश्वास पर आधारित ज्ञान है। ज्योतिष को खगोलशास्त्रीय आधार देकर हमने अपने विश्वासों को और भी आधार प्रदान किया है।
ज्योतिषिय भविष्यवाणियों के संदर्भ में यह प्रश्न उठाया जाता है कि सभी भविष्यवाणी सत्य नहीं होती या एक भविष्य में होने वाली घटना के विषय में विभिन्न ज्योतिषियों की राय भिन्न होती है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि ज्योतिष ज्ञान की विश्वसनीय शाखा नहीं है। वैज्ञानिक सिद्धांत भी समय समय पर नये तथ्यों के आने के पश्चात मामूली रूप से परिवर्तित होते है। वैज्ञानिक सिद्धांत में मामूली से परिवर्तन के लिए गहन अनुसंधान की जरूरत पड़ती है, तो इस प्रकार ज्योतिष में भी गहन अनुसंधान कर नये प्रकार के और ज्यादा सटीक ज्ञान को भी हासिल किया जा सकता है।
लेकिन वैज्ञानिक सोच रखने वाले व्यक्ति क्या इस बात का जवाब दे पाएँगें कि जो भविष्यवाणियां सही हुई, उसके पीछे क्या कारण थे? क्यों वे सत्य हुई? तभी हम उन्हें विज्ञान के विशेषज्ञ या छात्र कह पाएँगे।
यहाँ भारत में परमाणु युग की शुरूआत करने वाले होमी जहाँगीर भाभा का उल्लेख आवश्यक है क्योंकि वह एक महान वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक अच्छे ज्योतिषविद् भी थे और अपने ज्योतिषीय ज्ञान को बढ़ाने के लिए काफी अध्ययन भी किया था। तो क्या, डॉ भाभा की वैज्ञानिक सोच उनके इस विधा के अध्ययन में आड़े आयी?
अंततः निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि विज्ञान ने जिस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित किया है, उसी प्रकार ज्योतिष ने भी हमारे जीवन में काफी हद तक जगह बना रखी है। इसी कारण से अपने देश में विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया है। वह भी ज्योर्तिविज्ञान के रूप में। यह भी एक सत्य है कि कोई भी विद्या अपने आप में पूर्ण नहीं होती, लेकिन वह पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। विज्ञान की अन्य शाखाएं भी ज्योतिष की भाँति पूर्णता या उच्चतम संभव स्थिति की ओर अग्रसर हो रही है। अतः ज्योतिष, विज्ञान की अन्य शाखाओं की ही एक विज्ञान है जो कि मनुष्य की ज्ञान-पिपासा पर आधारित है।
नाम- नितेश कुमार गोयनका
रोल- J-48
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