(भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) नई दिल्ली में एक सप्ताह की रेडियो ट्रेनिंग के तहत हमें एक और रेडियो-प्ले करना था, इसके लिए शीतल ने वहाँ के कम्युनिटी रेडियो "अपना एफएएम" 96.9 के लिए एक शानदार नाटक लिखा। इसकी रिकॉर्डिंग भी की बाद में ऑन-एयर भी हुआ। स्क्रिप्टिंग ग्रुप के दो सदस्यों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी - शीतल और नेहा । लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन नेहा ना आ सकी तो हमें नमता गुप्ता से उसके अंश पढ़वाने पड़े। इस नाटक में दो आवाज और भी शामिल की गयी थी ऑटो ड्राईवर की आवाज़ दीपेंद्र ने दी थी और दरगाह पर खड़े व्यक्ति की आवाज़ योगेश ने दी .) ( जून २००७ में ट्रेनिंग की थी )
टॉपिक- संजय वन
नमस्कार दोस्तों, आपका स्वागत है 96.9 मेगाहर्ट्ज पर यानि अपना रेडियो वन पर। इंडिया गेट, लाल किला, पुराना किला, चिड़िया घर सब घूम आए। मगर फिर भी कुछ है, जो नहीं देखा। दक्षिणी दिल्ली का स्वर्ग, कुतुब मीनार के पास बसा संजय वन। आज हम आपको ले चलते है इसी की सैर पर।
(ऑटो की आवाज)
नेहा- हैलो शीतल
शीतल- अरे तुम...। कितना अच्छा लगा तुमसे मिलकर। मैं कब से कहती थी, पर तुम हो कि अपनी क्लास और कॉलेज से फुर्सत ही नहीं।
नेहा- अरे, अब बस भी करो। ये बताओ कैसी हो? जेएनयू में तुम्हारी क्लास कैसी चल रही है?
शीतल- मैं भी ठीक हूँ और क्लास भी ठीक चल रहा है।
नेहा- अब यही खड़ा रखोगी या चलोगी भी।
शीतल- अरे, मैं तो भूल ही गई थी। चलो तुम्हें अपना नया रुम दिखाती हूँ।
नेहा- पूरे मुनिरका में ऐसी ही गलियाँ और मकान है? शीतल- हाँ, क्योंकि यहाँ पर ज्यादातर स्टूडेंटस ही रहते हैं न...।
नेहा- तुम्हारा रूम तो देख लिया। अब कहाँ घूमने चलते है।
शीतल- चलो।
नेहा- पर चलेंगे कहाँ?
शीतल- कुतुब मीनार चले।
नेहा- वो तो देखा हुआ है।
शीतल- तो बताओ कहाँ चलना है? कहीं मंदिर, पार्क, मकबरा कहाँ?
नेहा- कहीं ऐसी जगह जहाँ इतना शोर न हो और दिल खुश हो जाए। दिल्ली के प्रदूषण और शोर से मैं बहुत परेशान हो गयी हूँ। जहाँ देखो धूल, धुँआ, भीड़-भाड़। हरियाली का तो नाम हीं नहीं है कहीं।
शीतल- ठीक है तो मैं तुम्हें ऐसी जगह ले चलती हूँ, जहाँ तुम्हें सब मिले- शांति भी, हरियाली भी और जहाँ भीड़-भाड़ भी ज्यादा न हो।
नेहा- पर कहाँ?
शीतल- संजय वन .... (ऑटो वाले को आवाज देते हुए) ... अरे ऑटो....
( ऑटो की आवाज)
शीतल- भईया संजय वन चलोगे?
ड्राईवर- पच्चीस रूपये देना।
नेहा- चलो..चलते है।
नेहा- ओह... रॉकलैंड अस्पताल...और ये आई आई पी एम?
शीतल- हाँ अरिंदम चौधरी का मीडिया और प्लानिंग इंस्टीच्यूट।
नेहा- वही अरिंदम चौधरी, जिन्होंने फिल्म रोक सको तो रोक लो बनाई थी।
शीतल- हाँ, वही। .... लो पहुँच गये हम।
नेहा- संजय वन (बोर्ड पढ़ते हुए) डीडीए उद्यान खंड 4, संजय वन रिज क्षेत्र, नजदीक जेएनयू।
शीतल- अब बोर्ड ही पढ़ती रहोगी या अंदर भी आओगी?
नेहा- आ रही हूँ। यहाँ प्रवेश शुल्क नहीं है क्या?
शीतल- नहीं, अब चलो।
नेहा- (फिर बोर्ड पढ़ते हुए) गर्मियों में सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक। और सर्दियों में सुबह 5 बजे से शाम 7 बजे तक। ..... चलो अभी तो 3 ही बजे है, शाम तक का समय है घूमने के लिए।
शीतल- अरे इधर आओ, आगे।
नेहा- वाह। ये तो गिर के वन या किसी बड़े अभ्यारण्य से कम नहीं लगता। ( कदमों की आहट... चलते हुए)ये क्या है?
शीतल- कोई पुराना बना स्टोर लगता है।
नेहा- यहाँ कितनी हरियाली है ना? जहाँ नजर घुमाओ वहीं पेड़ ही पेड़। वहाँ क्या? मंदिर?
शीतल- हाँ इतने विशाल क्षेत्र में बसे इस वन को किसी गाँव से कम थोड़े ही कह सकते है।
( चिड़ियों की चहचहाने की आवाज)
नेहा- ये पुल कितना खूबसूरत है? और ये नाला....
शीतल- हाँ यह पूरे वन की मिट्टी और गंदगी को अपने अंदर समा लेता है।
नेहा- ये लाल फूलों से लदे पेड़ तो लग रहे हैं जैसे- लाल फूलों का गुलदस्ता हो।
शीतल- और ये पीले फूल कितने सुंदर लग रहे है।
( नेचर का म्यूजिक)
नेहा( पढ़ते हुए)- दिस वे.... चलो इधर चलते है। देखो ये क्या है?
शीतल- यह तो कोई दरगाह लगती है। इनसे पूछते है। सुनिए, आप... यहाँ...
व्यक्ति- मैं शकील अहमद। बाबा साहब और उनकी मुँहबोली बेटी की खिदमत में यहाँ रहता हूँ।
नेहा- तो ये दो कब्र उन्हीं की है।
व्यक्ति- हाँ, ये हाजी फखरूद्दीन शाह और ये पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला रानी की कब्र है।करीब 1019 साल
पहले यहाँ बनाई गयी थी। अब तो लोग यहाँ फरियाद करने आते है। सोमवार खुदा की इबादत का दिन है, इस दिन यहाँ बहुत से लोग फूल चढ़ाने आते है। अपनी मुराद मांगते है और पूरी होने पर फिर से शुक्रिया अदा करने आते है।
नेहा- शुक्रिया, अब हम चलते है।
व्यक्ति- टीले की ओर जा रहे है?
शीतल- हाँ...(म्यूजिक).. चलो, जल्दी आगे आओ।
नेहा- अरे वाह कितना ऊंचा टीला है।( उत्साहित होकर).. ये तो रॉक क्लाइंबिंग होगा।
शीतल- मैं आगे बढ़ती हूँ, ये बैग मुझे दे दो और बस पैर जमाकर चढ़ती रहो।
नेहा- अरे, ये दुपट्टा भी झाड़ी में अटक गया।
शीतल- संभल के....। आह पहुँच गये। लाओ अपना हाथ दो।
नेहा- आह..। वाओ.. कितना खूबसूरत नजारा है। जहाँ नजर घुमाओ वहाँ हरियाली ही हरियाली।सच। यकीन नहीं होता दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ और प्रदूषण वाले इलाके में ऐसी जन्नत भी है कहीं।कुतुब मीनार, कितना करीब दिखता है यहाँ से। और वो मकबरा.... इसकी गुंबद भी कितनी बेहतरीन दिख रही है।
शीतल- वाकई.. यहाँ खड़े होकर तो पूरी दिल्ली दिख रही है। और वहाँ दूर...... पेड़ो के बीच रोड़ दिख रही है तुम्हें? वो जेएनयू है।
नेहा- हाँ, वो बस.. कैसी खिलौना सी दिख रही है।कुछ भी कहो, ये नजारा बेहद ही खूबसूरत है। बस अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहती हूँ इस दृश्य को।
( गहरी साँस लेते हुए)
शीतल- कुछ देर यहीं बैठते हैं...
नेहा- हाँ
शीतल- क्या सोच रही हो?
नेहा- यही कि, यहाँ पहले क्यों नहीं आई?
( दोनों हँसते हुए)
शीतल- यहाँ और भी कई टीले है। चलो दूसरे टीले पर चलते है।
नेहा- ठीक है। और ये रास्ता सीधे नीचे उतरता है?
शीतल- हाँ, मगर हम उस टीले पर चलकर नीचे उतरते है।
नेहा- अरे थक गए...।
शीतल- अभी देखा ही क्या है? अब चलते हैं चिड़ियाघर का मजा लेने, उस तरफ..।
नेहा- आज तो तुम थका डालोगी। ( मोर की आवाज)... वो देखो मोर, कैसे नाच रहा है।
शीतल- और आगे चलो। देखो गिरगिट...
नेहा- अरे ये उल्लू और वो बिच्छू कैसे डंक फैलाए हुए है।
शीतल- उस बंदर को देखो कैसे कोने में छिपा बैठा है। और ये दोनों उस्ताद कैसे मस्ती कर रहे है।
नेहा- मेरे पास कुछ चने है। ऐ रेंचो चने खाओगे? (बंदर गुर्राते हुए).... देखो कैसे दांत दिखा रहा है।
शीतल- वहां देखो नील गाय। तुम जानती हो नील गाय अब काफी कम देखने को मिलती है।
नेहा- वो काला साँप कैसे फूँकार मार रहा है। और ये--- घोड़ा पछा़ड़ साँप। (पढ़ते हुए)....
शीतल- ये देखो पंख फैलाए मोर-मोरनी।
नेहा- ब्यूटीफूल। ये तो मिनी चिड़ियाघर लग रहा है या यूँ कहूँ कि साउथ दिल्ली का चिड़ियाघर। ये जलमुर्गी.... मगर जल कहाँ है?
शीतल- आगे चलो जल भी मिलेगा।
नेहा- बस झील की ही कमी थी। अब थोड़ी देर यहीं बैठते हैं।
शीतल- आह। ये थकान झील के किनारे बैठने से ही कम होगी।
नेहा- झील में ये बत्तखें कैसे घूम रही हैं।
शीतल- हाँ, हमारी तरह वो भी सैर कर रही है। जरा पानी की बोतल देना, प्यास लग आई।
नेहा- ये लो (पानी पीने की आवाज) अरे सात बज गए। (चौंककर) पता भी नहीं चला घूमते हुए, कब चार घंटे बीत गए।
शीतल- चलो अब बाहर निकलते हैं। फिर तुम्हें शाहदरा की बस भी लेनी होगी। (चलने की आवाज)नेहा- चलिए, आ गए बाहर।
शीतल- तो कैसा लगा तुम्हें संजय वन?
नेहा- बेहद खूबसूरत...। सच... एक साथ इतने पेड़ पौधे देखकर दिल खुश हो गया। वरना दिल्ली में इतनी हरियाली और कहाँ है। और फिर चिड़ियाघर,झील, रॉक क्लाइंबिंग, दरगाह.... सब कुछ एक ही जगह पर। वाकई दक्षिण दिल्ली का स्वर्ग है--- संजय वन
टॉपिक- संजय वन
नमस्कार दोस्तों, आपका स्वागत है 96.9 मेगाहर्ट्ज पर यानि अपना रेडियो वन पर। इंडिया गेट, लाल किला, पुराना किला, चिड़िया घर सब घूम आए। मगर फिर भी कुछ है, जो नहीं देखा। दक्षिणी दिल्ली का स्वर्ग, कुतुब मीनार के पास बसा संजय वन। आज हम आपको ले चलते है इसी की सैर पर।
(ऑटो की आवाज)
नेहा- हैलो शीतल
शीतल- अरे तुम...। कितना अच्छा लगा तुमसे मिलकर। मैं कब से कहती थी, पर तुम हो कि अपनी क्लास और कॉलेज से फुर्सत ही नहीं।
नेहा- अरे, अब बस भी करो। ये बताओ कैसी हो? जेएनयू में तुम्हारी क्लास कैसी चल रही है?
शीतल- मैं भी ठीक हूँ और क्लास भी ठीक चल रहा है।
नेहा- अब यही खड़ा रखोगी या चलोगी भी।
शीतल- अरे, मैं तो भूल ही गई थी। चलो तुम्हें अपना नया रुम दिखाती हूँ।
नेहा- पूरे मुनिरका में ऐसी ही गलियाँ और मकान है? शीतल- हाँ, क्योंकि यहाँ पर ज्यादातर स्टूडेंटस ही रहते हैं न...।
नेहा- तुम्हारा रूम तो देख लिया। अब कहाँ घूमने चलते है।
शीतल- चलो।
नेहा- पर चलेंगे कहाँ?
शीतल- कुतुब मीनार चले।
नेहा- वो तो देखा हुआ है।
शीतल- तो बताओ कहाँ चलना है? कहीं मंदिर, पार्क, मकबरा कहाँ?
नेहा- कहीं ऐसी जगह जहाँ इतना शोर न हो और दिल खुश हो जाए। दिल्ली के प्रदूषण और शोर से मैं बहुत परेशान हो गयी हूँ। जहाँ देखो धूल, धुँआ, भीड़-भाड़। हरियाली का तो नाम हीं नहीं है कहीं।
शीतल- ठीक है तो मैं तुम्हें ऐसी जगह ले चलती हूँ, जहाँ तुम्हें सब मिले- शांति भी, हरियाली भी और जहाँ भीड़-भाड़ भी ज्यादा न हो।
नेहा- पर कहाँ?
शीतल- संजय वन .... (ऑटो वाले को आवाज देते हुए) ... अरे ऑटो....
( ऑटो की आवाज)
शीतल- भईया संजय वन चलोगे?
ड्राईवर- पच्चीस रूपये देना।
नेहा- चलो..चलते है।
नेहा- ओह... रॉकलैंड अस्पताल...और ये आई आई पी एम?
शीतल- हाँ अरिंदम चौधरी का मीडिया और प्लानिंग इंस्टीच्यूट।
नेहा- वही अरिंदम चौधरी, जिन्होंने फिल्म रोक सको तो रोक लो बनाई थी।
शीतल- हाँ, वही। .... लो पहुँच गये हम।
नेहा- संजय वन (बोर्ड पढ़ते हुए) डीडीए उद्यान खंड 4, संजय वन रिज क्षेत्र, नजदीक जेएनयू।

शीतल- अब बोर्ड ही पढ़ती रहोगी या अंदर भी आओगी?
नेहा- आ रही हूँ। यहाँ प्रवेश शुल्क नहीं है क्या?
शीतल- नहीं, अब चलो।
नेहा- (फिर बोर्ड पढ़ते हुए) गर्मियों में सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक। और सर्दियों में सुबह 5 बजे से शाम 7 बजे तक। ..... चलो अभी तो 3 ही बजे है, शाम तक का समय है घूमने के लिए।
शीतल- अरे इधर आओ, आगे।
नेहा- वाह। ये तो गिर के वन या किसी बड़े अभ्यारण्य से कम नहीं लगता। ( कदमों की आहट... चलते हुए)ये क्या है?
शीतल- कोई पुराना बना स्टोर लगता है।
नेहा- यहाँ कितनी हरियाली है ना? जहाँ नजर घुमाओ वहीं पेड़ ही पेड़। वहाँ क्या? मंदिर?
शीतल- हाँ इतने विशाल क्षेत्र में बसे इस वन को किसी गाँव से कम थोड़े ही कह सकते है।
( चिड़ियों की चहचहाने की आवाज)
नेहा- ये पुल कितना खूबसूरत है? और ये नाला....
शीतल- हाँ यह पूरे वन की मिट्टी और गंदगी को अपने अंदर समा लेता है।
नेहा- ये लाल फूलों से लदे पेड़ तो लग रहे हैं जैसे- लाल फूलों का गुलदस्ता हो।
शीतल- और ये पीले फूल कितने सुंदर लग रहे है।
( नेचर का म्यूजिक)
नेहा( पढ़ते हुए)- दिस वे.... चलो इधर चलते है। देखो ये क्या है?
शीतल- यह तो कोई दरगाह लगती है। इनसे पूछते है। सुनिए, आप... यहाँ...
व्यक्ति- मैं शकील अहमद। बाबा साहब और उनकी मुँहबोली बेटी की खिदमत में यहाँ रहता हूँ।
नेहा- तो ये दो कब्र उन्हीं की है।
व्यक्ति- हाँ, ये हाजी फखरूद्दीन शाह और ये पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला रानी की कब्र है।करीब 1019 साल
पहले यहाँ बनाई गयी थी। अब तो लोग यहाँ फरियाद करने आते है। सोमवार खुदा की इबादत का दिन है, इस दिन यहाँ बहुत से लोग फूल चढ़ाने आते है। अपनी मुराद मांगते है और पूरी होने पर फिर से शुक्रिया अदा करने आते है।
नेहा- शुक्रिया, अब हम चलते है।
व्यक्ति- टीले की ओर जा रहे है?
शीतल- हाँ...(म्यूजिक).. चलो, जल्दी आगे आओ।
नेहा- अरे वाह कितना ऊंचा टीला है।( उत्साहित होकर).. ये तो रॉक क्लाइंबिंग होगा।
शीतल- मैं आगे बढ़ती हूँ, ये बैग मुझे दे दो और बस पैर जमाकर चढ़ती रहो।
नेहा- अरे, ये दुपट्टा भी झाड़ी में अटक गया।
शीतल- संभल के....। आह पहुँच गये। लाओ अपना हाथ दो।
नेहा- आह..। वाओ.. कितना खूबसूरत नजारा है। जहाँ नजर घुमाओ वहाँ हरियाली ही हरियाली।सच। यकीन नहीं होता दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ और प्रदूषण वाले इलाके में ऐसी जन्नत भी है कहीं।कुतुब मीनार, कितना करीब दिखता है यहाँ से। और वो मकबरा.... इसकी गुंबद भी कितनी बेहतरीन दिख रही है।
शीतल- वाकई.. यहाँ खड़े होकर तो पूरी दिल्ली दिख रही है। और वहाँ दूर...... पेड़ो के बीच रोड़ दिख रही है तुम्हें? वो जेएनयू है।
नेहा- हाँ, वो बस.. कैसी खिलौना सी दिख रही है।कुछ भी कहो, ये नजारा बेहद ही खूबसूरत है। बस अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहती हूँ इस दृश्य को।
( गहरी साँस लेते हुए)
शीतल- कुछ देर यहीं बैठते हैं...
नेहा- हाँ
शीतल- क्या सोच रही हो?
नेहा- यही कि, यहाँ पहले क्यों नहीं आई?
( दोनों हँसते हुए)
शीतल- यहाँ और भी कई टीले है। चलो दूसरे टीले पर चलते है।
नेहा- ठीक है। और ये रास्ता सीधे नीचे उतरता है?
शीतल- हाँ, मगर हम उस टीले पर चलकर नीचे उतरते है।
नेहा- अरे थक गए...।
शीतल- अभी देखा ही क्या है? अब चलते हैं चिड़ियाघर का मजा लेने, उस तरफ..।
नेहा- आज तो तुम थका डालोगी। ( मोर की आवाज)... वो देखो मोर, कैसे नाच रहा है।
शीतल- और आगे चलो। देखो गिरगिट...
नेहा- अरे ये उल्लू और वो बिच्छू कैसे डंक फैलाए हुए है।
शीतल- उस बंदर को देखो कैसे कोने में छिपा बैठा है। और ये दोनों उस्ताद कैसे मस्ती कर रहे है।
नेहा- मेरे पास कुछ चने है। ऐ रेंचो चने खाओगे? (बंदर गुर्राते हुए).... देखो कैसे दांत दिखा रहा है।
शीतल- वहां देखो नील गाय। तुम जानती हो नील गाय अब काफी कम देखने को मिलती है।
नेहा- वो काला साँप कैसे फूँकार मार रहा है। और ये--- घोड़ा पछा़ड़ साँप। (पढ़ते हुए)....
शीतल- ये देखो पंख फैलाए मोर-मोरनी।
नेहा- ब्यूटीफूल। ये तो मिनी चिड़ियाघर लग रहा है या यूँ कहूँ कि साउथ दिल्ली का चिड़ियाघर। ये जलमुर्गी.... मगर जल कहाँ है?
शीतल- आगे चलो जल भी मिलेगा।
नेहा- बस झील की ही कमी थी। अब थोड़ी देर यहीं बैठते हैं।
शीतल- आह। ये थकान झील के किनारे बैठने से ही कम होगी।
नेहा- झील में ये बत्तखें कैसे घूम रही हैं।
शीतल- हाँ, हमारी तरह वो भी सैर कर रही है। जरा पानी की बोतल देना, प्यास लग आई।
नेहा- ये लो (पानी पीने की आवाज) अरे सात बज गए। (चौंककर) पता भी नहीं चला घूमते हुए, कब चार घंटे बीत गए।
शीतल- चलो अब बाहर निकलते हैं। फिर तुम्हें शाहदरा की बस भी लेनी होगी। (चलने की आवाज)नेहा- चलिए, आ गए बाहर।
शीतल- तो कैसा लगा तुम्हें संजय वन?
नेहा- बेहद खूबसूरत...। सच... एक साथ इतने पेड़ पौधे देखकर दिल खुश हो गया। वरना दिल्ली में इतनी हरियाली और कहाँ है। और फिर चिड़ियाघर,झील, रॉक क्लाइंबिंग, दरगाह.... सब कुछ एक ही जगह पर। वाकई दक्षिण दिल्ली का स्वर्ग है--- संजय वन
Acha hai ......puraane dino ki yaad aa gayi.................welldone................Dipendra Kumar
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