Thursday, January 14, 2010
जुलाई 03, 2003
जुलाई 02, 2003
जिंदगी एक आईना होती है, तो कुछ और बात होती। लेकिन यह एक कंघा है जिसे सिर्फ चलना है कभी बियावान पर, कभी सुनसान में तो कभी हरी-भरी खेतों के बीच से। एक निश्चित सफर ही तय करना है लेकिन सफर के बीच में किस तरह सफर करना पड़ सकता है यह कोई नहीं जान सकता है, लेकिन अनुभव व तकाजे द्वारा इसको भी कम किया जा सकता है। निश्चय ही अनुभव उम्रदराज व्यक्ति के पास होता है लेकिन युवा पीढ़ी कम समय में ही अपने को उस श्रेणी में रखने लगी है जिसे वृद्धों द्वारा अधिकृत क्षेत्र ही समझा जाता है। अब उम्रदराज न होकर कम उम्र में सभी राज जानना ही सुपात्रता की निशानी है।
दर्पण की बात करें तो महापुरुषों का जीवन आईने की भांति अभी भी साफ नजर आता है लेकिन हम किसी औरों के लिए दर्पण बन सके... यह तो मुश्किल ही प्रतीत होता है। स्वयं दूसरों की जीवनी जानना व पढ़ना काफी भारी प्रतीत होता है तो हम जैसे दुष्कर कार्य न करने वाले व्यक्ति के जीवन को कोई क्यों कर देखेगा और क्या प्रतिबिंब पाएगा।
जुलाई 01, 2003
जैविक घड़ी की सूईयां जब अपने निश्चित अंतराल पर नहीं चलती है तो मनुष्य के समक्ष परेशानियों का अंबार खड़ा उठता है। यूँ ही आधुनिकता के आवरण ने हमें अंदर से खोखला, भावहीन, संवेदनशून्य बना दिया है। हमने नया करने के लिए नये मिथक गढ़ डाले है। वास्तविकता से परे एक नया आसमान और एक नई धरातल की रचना कर डाली है और इस मुगालते में रहते है कि हमारे द्वारा रची गयी यह दुनिया ही सत्य है, लेकिन ऐसा नहीं है। अब तो हमारा अहं हमें सही करने से रोक रहा है, हम जो कर रहे है वही सत्य है- इस आभासी सत्यता के पीछे ना जाने कब तक हम अपने आप को सिद्ध करते-फिरते है। शहरों की चकाचौंध के बीच जीवन व्यतीत करने वाला शख्स महानगरों की विशाल चमक-दमक के समक्ष अपने को बौना पाता है, वहीं गाँव के अंधेरे के समक्ष अपने को भाग्यवान समझता है। जिस बिंदु पर हम है,उस स्थान से तुलना करने पर हम भिन्न होती हुई चीजों को देखते है लेकिन दूसरे बिंदु से उस नवीन भिन्नता से भी परिचित होते है।यही अंतर है- वह भी द्वंदात्मक। समझने भर की बात है। जो समझा वह ज्ञानी , जो ना समझा, वह अभ्यासी।