Saturday, March 20, 2010

संजय वन

(भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) नई दिल्ली में एक सप्ताह की रेडियो ट्रेनिंग के तहत हमें एक और रेडियो-प्ले करना था, इसके लिए शीतल ने वहाँ के कम्युनिटी रेडियो "अपना एफएएम" 96.9 के लिए एक शानदार नाटक लिखा। इसकी रिकॉर्डिंग भी की बाद में ऑन-एयर भी हुआ। स्क्रिप्टिंग ग्रुप के दो सदस्यों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी - शीतल और नेहा । लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन नेहा ना आ सकी तो हमें नमता गुप्ता से उसके अंश पढ़वाने पड़े। इस नाटक में दो आवाज और भी शामिल की गयी थी ऑटो ड्राईवर की आवाज़ दीपेंद्र ने दी थी और दरगाह पर खड़े व्यक्ति की आवाज़ योगेश ने दी .) ( जून २००७ में ट्रेनिंग की थी )


टॉपिक- संजय वन
नमस्कार दोस्तों, आपका स्वागत है 96.9 मेगाहर्ट्ज पर यानि अपना रेडियो वन पर। इंडिया गेट, लाल किला, पुराना किला, चिड़िया घर सब घूम आए। मगर फिर भी कुछ है, जो नहीं देखा। दक्षिणी दिल्ली का स्वर्ग, कुतुब मीनार के पास बसा संजय वन। आज हम आपको ले चलते है इसी की सैर पर।

(ऑटो की आवाज)
नेहा- हैलो शीतल
शीतल- अरे तुम...। कितना अच्छा लगा तुमसे मिलकर। मैं कब से कहती थी, पर तुम हो कि अपनी क्लास और कॉलेज से फुर्सत ही नहीं।
नेहा- अरे, अब बस भी करो। ये बताओ कैसी हो? जेएनयू में तुम्हारी क्लास कैसी चल रही है?
शीतल- मैं भी ठीक हूँ और क्लास भी ठीक चल रहा है।
नेहा- अब यही खड़ा रखोगी या चलोगी भी।
शीतल- अरे, मैं तो भूल ही गई थी। चलो तुम्हें अपना नया रुम दिखाती हूँ।
नेहा- पूरे मुनिरका में ऐसी ही गलियाँ और मकान है? शीतल- हाँ, क्योंकि यहाँ पर ज्यादातर स्टूडेंटस ही रहते हैं न...।
नेहा- तुम्हारा रूम तो देख लिया। अब कहाँ घूमने चलते है।
शीतल- चलो।
नेहा- पर चलेंगे कहाँ?
शीतल- कुतुब मीनार चले।
नेहा- वो तो देखा हुआ है।
शीतल- तो बताओ कहाँ चलना है? कहीं मंदिर, पार्क, मकबरा कहाँ?
नेहा- कहीं ऐसी जगह जहाँ इतना शोर न हो और दिल खुश हो जाए। दिल्ली के प्रदूषण और शोर से मैं बहुत परेशान हो गयी हूँ। जहाँ देखो धूल, धुँआ, भीड़-भाड़। हरियाली का तो नाम हीं नहीं है कहीं।
शीतल- ठीक है तो मैं तुम्हें ऐसी जगह ले चलती हूँ, जहाँ तुम्हें सब मिले- शांति भी, हरियाली भी और जहाँ भीड़-भाड़ भी ज्यादा न हो।
नेहा- पर कहाँ?
शीतल- संजय वन .... (ऑटो वाले को आवाज देते हुए) ... अरे ऑटो....
( ऑटो की आवाज)
शीतल- भईया संजय वन चलोगे?
ड्राईवर- पच्चीस रूपये देना।
नेहा- चलो..चलते है।

नेहा- ओह... रॉकलैंड अस्पताल...और ये आई आई पी एम?

शीतल- हाँ अरिंदम चौधरी का मीडिया और प्लानिंग इंस्टीच्यूट।
नेहा- वही अरिंदम चौधरी, जिन्होंने फिल्म रोक सको तो रोक लो बनाई थी।
शीतल- हाँ, वही। .... लो पहुँच गये हम।
नेहा- संजय वन (बोर्ड पढ़ते हुए) डीडीए उद्यान खंड 4, संजय वन रिज क्षेत्र, नजदीक जेएनयू।
शीतल- अब बोर्ड ही पढ़ती रहोगी या अंदर भी आओगी?
नेहा- आ रही हूँ। यहाँ प्रवेश शुल्क नहीं है क्या?
शीतल- नहीं, अब चलो।
नेहा- (फिर बोर्ड पढ़ते हुए) गर्मियों में सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक। और सर्दियों में सुबह 5 बजे से शाम 7 बजे तक। ..... चलो अभी तो 3 ही बजे है, शाम तक का समय है घूमने के लिए।
शीतल- अरे इधर आओ, आगे।
नेहा- वाह। ये तो गिर के वन या किसी बड़े अभ्यारण्य से कम नहीं लगता। ( कदमों की आहट... चलते हुए)ये क्या है?
शीतल- कोई पुराना बना स्टोर लगता है।
नेहा- यहाँ कितनी हरियाली है ना? जहाँ नजर घुमाओ वहीं पेड़ ही पेड़। वहाँ क्या? मंदिर?
शीतल- हाँ इतने विशाल क्षेत्र में बसे इस वन को किसी गाँव से कम थोड़े ही कह सकते है।
( चिड़ियों की चहचहाने की आवाज)
नेहा- ये पुल कितना खूबसूरत है? और ये नाला....
शीतल- हाँ यह पूरे वन की मिट्टी और गंदगी को अपने अंदर समा लेता है।
नेहा- ये लाल फूलों से लदे पेड़ तो लग रहे हैं जैसे- लाल फूलों का गुलदस्ता हो।
शीतल- और ये पीले फूल कितने सुंदर लग रहे है।
( नेचर का म्यूजिक)
नेहा( पढ़ते हुए)- दिस वे.... चलो इधर चलते है। देखो ये क्या है?
शीतल- यह तो कोई दरगाह लगती है। इनसे पूछते है। सुनिए, आप... यहाँ...

व्यक्ति- मैं शकील अहमद। बाबा साहब और उनकी मुँहबोली बेटी की खिदमत में यहाँ रहता हूँ।
नेहा- तो ये दो कब्र उन्हीं की है।
व्यक्ति- हाँ, ये हाजी फखरूद्दीन शाह और ये पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला रानी की कब्र है।करीब 1019 साल
पहले यहाँ बनाई गयी थी। अब तो लोग यहाँ फरियाद करने आते है। सोमवार खुदा की इबादत का दिन है, इस दिन यहाँ बहुत से लोग फूल चढ़ाने आते है। अपनी मुराद मांगते है और पूरी होने पर फिर से शुक्रिया अदा करने आते है।
नेहा- शुक्रिया, अब हम चलते है।
व्यक्ति- टीले की ओर जा रहे है?
शीतल- हाँ...(म्यूजिक).. चलो, जल्दी आगे आओ।
नेहा- अरे वाह कितना ऊंचा टीला है।( उत्साहित होकर).. ये तो रॉक क्लाइंबिंग होगा।
शीतल- मैं आगे बढ़ती हूँ, ये बैग मुझे दे दो और बस पैर जमाकर चढ़ती रहो।
नेहा- अरे, ये दुपट्टा भी झाड़ी में अटक गया।
शीतल- संभल के....। आह पहुँच गये। लाओ अपना हाथ दो।
नेहा- आह..। वाओ.. कितना खूबसूरत नजारा है। जहाँ नजर घुमाओ वहाँ हरियाली ही हरियाली।सच। यकीन नहीं होता दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ और प्रदूषण वाले इलाके में ऐसी जन्नत भी है कहीं।कुतुब मीनार, कितना करीब दिखता है यहाँ से। और वो मकबरा.... इसकी गुंबद भी कितनी बेहतरीन दिख रही है।
शीतल- वाकई.. यहाँ खड़े होकर तो पूरी दिल्ली दिख रही है। और वहाँ दूर...... पेड़ो के बीच रोड़ दिख रही है तुम्हें? वो जेएनयू है।
नेहा- हाँ, वो बस.. कैसी खिलौना सी दिख रही है।कुछ भी कहो, ये नजारा बेहद ही खूबसूरत है। बस अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहती हूँ इस दृश्य को।

( गहरी साँस लेते हुए)
शीतल- कुछ देर यहीं बैठते हैं...
नेहा- हाँ
शीतल- क्या सोच रही हो?
नेहा- यही कि, यहाँ पहले क्यों नहीं आई?
( दोनों हँसते हुए)
शीतल- यहाँ और भी कई टीले है। चलो दूसरे टीले पर चलते है।
नेहा- ठीक है। और ये रास्ता सीधे नीचे उतरता है?
शीतल- हाँ, मगर हम उस टीले पर चलकर नीचे उतरते है।
नेहा- अरे थक गए...।
शीतल- अभी देखा ही क्या है? अब चलते हैं चिड़ियाघर का मजा लेने, उस तरफ..।
नेहा- आज तो तुम थका डालोगी। ( मोर की आवाज)... वो देखो मोर, कैसे नाच रहा है।
शीतल- और आगे चलो। देखो गिरगिट...
नेहा- अरे ये उल्लू और वो बिच्छू कैसे डंक फैलाए हुए है।
शीतल- उस बंदर को देखो कैसे कोने में छिपा बैठा है। और ये दोनों उस्ताद कैसे मस्ती कर रहे है।
नेहा- मेरे पास कुछ चने है। ऐ रेंचो चने खाओगे? (बंदर गुर्राते हुए).... देखो कैसे दांत दिखा रहा है।
शीतल- वहां देखो नील गाय। तुम जानती हो नील गाय अब काफी कम देखने को मिलती है।
नेहा- वो काला साँप कैसे फूँकार मार रहा है। और ये--- घोड़ा पछा़ड़ साँप। (पढ़ते हुए)....
शीतल- ये देखो पंख फैलाए मोर-मोरनी।
नेहा- ब्यूटीफूल। ये तो मिनी चिड़ियाघर लग रहा है या यूँ कहूँ कि साउथ दिल्ली का चिड़ियाघर। ये जलमुर्गी.... मगर जल कहाँ है?
शीतल- आगे चलो जल भी मिलेगा।
नेहा- बस झील की ही कमी थी। अब थोड़ी देर यहीं बैठते हैं।
शीतल- आह। ये थकान झील के किनारे बैठने से ही कम होगी।
नेहा- झील में ये बत्तखें कैसे घूम रही हैं।
शीतल- हाँ, हमारी तरह वो भी सैर कर रही है। जरा पानी की बोतल देना, प्यास लग आई।
नेहा- ये लो (पानी पीने की आवाज) अरे सात बज गए। (चौंककर) पता भी नहीं चला घूमते हुए, कब चार घंटे बीत गए।
शीतल- चलो अब बाहर निकलते हैं। फिर तुम्हें शाहदरा की बस भी लेनी होगी। (चलने की आवाज)नेहा- चलिए, आ गए बाहर।
शीतल- तो कैसा लगा तुम्हें संजय वन?
नेहा- बेहद खूबसूरत...। सच... एक साथ इतने पेड़ पौधे देखकर दिल खुश हो गया। वरना दिल्ली में इतनी हरियाली और कहाँ है। और फिर चिड़ियाघर,झील, रॉक क्लाइंबिंग, दरगाह.... सब कुछ एक ही जगह पर। वाकई दक्षिण दिल्ली का स्वर्ग है--- संजय वन

Monday, March 15, 2010

JNU भ्रमण

( भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) नई दिल्ली में एक सप्ताह की रेडियो ट्रेनिंग के तहत हमें एक रेडियो-प्ले करना था, इसके लिए योगेश ने वहाँ के कम्युनिटी रेडियो "अपना एफएएम" 96.9 के लिए एक शानदार नाटक लिखा। इसकी रिकॉर्डिंग भी की बाद में ऑन-एयर भी हुआ। स्क्रिप्टिंग ग्रुप के तीन सदस्यों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी - योगेश, नितेश और नेहा । लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन नेहा ना आ सकी तो हमें नमता गुप्ता से उसके अंश पढ़वाने पड़े। इस नाटक में एक आवाज और भी शामिल की गयी थी- दीपेंद्र की ढ़ाबा मालिक के रूप में.....) ( जून २००७ में ट्रेनिंग की थी )

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Title: JNU भ्रमण

Synopsis: दो भाई, नितेश और योगेश, दिल्ली पहुँचते है। योगेश जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पढ़ता है और अपने छोटे भाई नितेश को JNU की सैर कराने के लिए दिल्ली लेकर आता है... JNU के बारे में जानकर नितेश भी निश्चय करता है वो भी JNU में पढ़कर अपनी शिक्षा पूरी करेगा।

Script: (Sound of train and crowd at the station)

Yogesh: लो पहुँच गये हम दिल्ली...

Nitesh: योगेश भैया..... अब यहाँ से JNU कितनी दूर है?

Yogesh: अरे तुम इतने उतावले क्यों हो रहे हो? बहुत जल्द हम JNU में होंगे..... आओ....
(Sound of Buses)

Yogesh: नितेश.... ये है मिन्टो रोड.... यहाँ से हम 615 नंबर की बस पर बैठेंगे जो हमें सीधे JNU ले जायेगी।
Nitesh: भैया.... वो रही 615 नंबर की बस

Yogesh: हाँ....... वही है..... चलो
(Bus leaves....)

Yogesh: अच्छा सुनो..... मैं जरा थक गया हूँ...... थोड़ा सो लेता हूँ जब JNU आ जाए तब मुझे जगा देना। Nitesh: ठीक है भैया.... तब तक मैं दिल्ली देखता हूँ..... पर भैया.... जब JNU आएगा तो मुझे कैसे पता चलेगा? मैंने तो कभी JNU देखा ही नहीं है।Yogesh: हा...हा....हा..... इसकी फिक्र तुम मत करो...... तुम्हें पता चल जाएगा।
(Sound of Bus with some music)
(Aeroplane की आवाज)
Nitesh: भैया(चौंककर).... ये कैसी आवाज है?

Yogesh: अरे..... आ गया JNU..... ये plane की आवाज थी... यही है JNU आने की पहचान...
Nitesh: ये Aeroplane?Yogesh: हाँ..... चलो तैयार हो जाओ..... अगले stop पर हमें उतरना है......

Nitesh( खुशी से) जी भैया.....
(Bus रूकने की आवाज)

Yogesh: चलो......

Nitesh: ये Hostel है क्या भैया?

Yogesh: हाँ....... ये Ganga Hostel है, girls hostel.... और उस तरफ Jhelum Hostel है और वहाँ Satluj Hostel....Nitesh: आप Satluj Hostel में रहते हो न?

Yogesh: हाँ.... और ये सामने Ganga dhaba.....

Nitesh: Oh..... यही है ganga dhaba....जिसके बारे में आप इतना कुछ बताते रहते है.......Yogesh: हाँ...... ये वही Ganga dhaba है।

Nitesh: पर ये तो बहुत Normal सा dhaba है?Yogesh: यही तो खासयित है इस ढ़ाबे की.... कि इतने सालों बाद भी ये Normal है...... वरना आज की तेज जिन्दगी में Normal रहना बड़ा मुश्किल होता है..... खैर....चलो पहले ढ़ाबे पर चाय पीते है उसके बाद रूम पर चलेंगे...

Nitesh: ठीक है भैया...

(Sound of people)

Yogesh: दो चाय देना भैया...

Dhaba man: 5 रूपये खुले दो......

Music...

Yogesh: ये लो..... यहाँ की स्पेशल चाय

Nitesh: हाँ... वाकई बहुत अच्छी चाय है.... भैया.... यहाँ और भी तो ढ़ाबे होंगे?Yogesh: हाँ..... लगभग हर 200 मीटर की दूरी पर एक ढ़ाबा है।

Nitesh: और यहाँ Hostel कितने है?

Yogesh: यहाँ 16 hostels है जिनमें 3 Girls hostel है 7 boys hostel, 4 co-hostel और 1 Married Hostel....

Nitesh: Co-Hostel?

Yogesh: हाँ...... आधे में Boys रहते है और आधे में Girls ...

Nitesh: अच्छा... ये बताइए भैया.... यहाँ सारे Hostels का नाम नदियों के नाम पर क्यों है?

Yogesh: वो इसलिए क्योंकि नदियाँ हमारे देश की एकता और अखण्डता को दर्शाती है.... और यहाँ तो अपने देश के हर कोने से लोग आते है.... जब वो अपने शहर से गुजरने वाली नदी का नाम यहाँ देखते है तो उन्हें बहुत अपनापन सा महसूस होता है।
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Neha: Hi Yogesh!

Yogesh: Hi !
Neha: तुम घर से कब आए?

Yogesh: बस अभी 5 मिनट पहले ही उतरा हूँ बस से.... अरे हाँ.... ये मेरा छोटा भाई..... नितेश, नितेश ये है नेहा.... यहाँ Political Science से MA कर रही है....Neha: हेल्लो

Nitesh: नमस्ते !

Yogesh: नेहा ..पढ़ाई के साथ थियेटर भी करती है... बहुत अच्छा गाना गाती है और क्रांतिकारी खयालात की है।

Neha: अरे बस-बस.... ये क्या बता रहे हो उसे

Yogesh: दरअसल अगली साल ये भी यहाँ एडमिशन लेना चाह रहा है। तो यहाँ की आबो-हवा से रूबरू कराना जरूरी है।

Neha: हाँ... तब तो बताना जरूरी है

Yogesh: वैसे तुम क्या कर रही थी?

Neha: मैं ये Posters लगा रही थी... आज रात Procession है... वो Nandigram में जो हुआ न..... उसके लिए

Yogesh: अरे हाँ.... बहुत बुरा हुआ॥


Nitesh: नेहा दीदी आप कुछ बताइए यहाँ के बारे में....

Neha: पहले मैं Posters चिपका कर आती हूँ..... फिर इत्मिनान से बैठकर तुम लोगों से बात करती हूँ।

Nitesh: ठीक है... (to Yogesh) भैया...... Nandigram में जो हुआ उसका Protest यहाँ करने से क्या होगा?

Nitesh: दरअसल यही तो lifeline है JNU की.... जब भी देश में कुछ ऐसा घटता है जो इंसानियत के खिलाफ हो तो हम उस पर अपना Protest जरूर दर्ज कराते है। एक तरह से देखा जाए तो ऐसा करने से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता.... पर इतना जरूर है हमारे मन को थोड़ी शांति मिलती है और यहाँ रहने वाले अंजान लोगों को और इस देश के नेताओं को इस बात का आभास हो जाता है कि जो कुछ हुआ वो गलत हुआ।

Nitesh: ह्म्म्म

Yogesh: हम अपने freedom of speech and expression का पूरा इस्तेमाल करते है।

Nitesh: शायद इसी लिए लोग JNU को intellectuals का गढ़ कहते है।

Yogesh: हाँ..... लोगों को बहुत भरोसा है इस जगह पर..... पता है जब 1984 में दंगे हुए थे तब सिखों ने Police Station के बजाए JNU आकर शरण ली थी।

Nitesh:अच्छाYogesh: हाँ.... और 75 में जब Indira Gandhi ने emergency लगायी थी और सारे देश का कामकाज ठप्प हो गया था तब उसके Protest में एक दिन का Administrative work खुद किया था.....

Neha: चलो.... लग गए

Yogesh: अब जो पूछना है.... नेहा से पूछो

Nitesh: नेहा दीदी.... आप इतने सारे काम करती है.... आप थक नहीं जाती

Neha: ऐसा कुछ नहीं है..... दरअसल मैं जो कुछ करती हूँ दिल से करती हूँ ..... और दिल से किये गए काम में थकान नहीं होती।

Nitesh: और आप theatre के लिए कब Time निकालती है?

Neha: Theatre का rehearsal मैं शाम को करती हूँ..... यहाँ पर 4 theatre group है...... Bahroop,IPTA,Jugnu और Dastak... मैं Bahroop के साथ काम करती हूँ।

Nitesh: अपना नाटक कब दिखाएंगी आप ?

Neha: जरूर दिखाऊँगी.... एक बार यहाँ आ तो जाओ।

Yogesh:अरे इसे तुम कोई Revolutionary song ही सुना दो....

Nitesh: हाँ हाँ दीदी.....

Neha: अरे तुम्हारे भैया भी तो खूब गाने गाते है......

Yogesh: अच्छा ठीक है मिलकर गाते है....

Neha: ठीक है.... चलो... वो गाते है॥ ले मशालें...

ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गाँव के

अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के

पूछती है झोपड़ी और पूछते है खेत भी

कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के....

ले मशाले.....

Nitesh: वाह मजा आ गया....

Yogesh: अच्छा अब काफी देर हो गई है.... नेहा को जाने दो..... अब हम Hostel चलते है...

Nitesh: ठीक है....


( Music...)
Nitesh: भैया हम डिनर कहाँ करेंगे?

Yogesh: Mess .....

Nitesh: मैं आपके साथ mess में खा सकता हूँ?

Yogesh: हाँ क्यों नहीं... बस एक गेस्ट कूपन लेना पड़ेगा ...

( Music...)
Nitesh: भैया अब तो मुझे नींद आ रही है....

Yogesh: इतनी जल्दी.... यहाँ तो लोग 12 बजे के बाद सोते है ...

Nitesh: घर की आदत है ना...Yogesh: ठीक है सो जाओ ...
(Aeroplane की आवाज.)

The End

Yogesh Kumar
J-29
RTVJ


Thursday, March 11, 2010

वो पहला डम्मी टॉक-शो.....

( जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान एक बार दो लोगों को 3-4 मिनट का टॉक शो करना था। इसके लिए स्क्रिप्ट लिखने का काम हमनें और हमारी सहपाठी मधुस्मिता ने किया था। बाद में क्लास के सामने परफॉर्म भी किया। टिप्पणी भी सुनने को मिली।)

एंकरः नमस्कार दोस्तों, दीवान-ए-खास कार्यक्रम में आपका स्वागत है। जैसा कि आप सब जानते है कि इस साप्ताहिक कार्यक्रम में हम आपकी मुलाकात एक खास मेहमान से कराते है। तो आइए, आज मिलते है अपने खास मेहमान डॉक्टर चारू दुआ से, जो कि पेशे से एक डायटिशियन है। आइए, इनसे हम जानेंगे आज की पीढ़ी के खान-पान एवं उनसे उनके जीवन में पड़ने वाली असर के विषय में।

एंकरः चारूजी, स्टूडियो में आपका स्वागत है।


चारूः जी, धन्यवाद

एंकरः आज की पीढ़ी फास्ट फूड पर ज्यादा आश्रित हो गयी है, जिसे कि हम जंक फूड के नाम से भी जानते है। इस पर आपकी क्या राय है।


चारूः जी, आपका कहना सही है। आज की पीढ़ी भाग-दौड़ की जिंदगी जीती है, अतः उन्हें सुबह नाश्ते के टेबल से रात के खाने तक के बीच में जो फटाफट तैयार फूड मिलता है, उसे खाती है लेकिन उसमें न्यूट्रीशन का लेवल काफी कम होता है, जिससे उनका पोषण ठीक से नहीं हो पाता है। ये मोटापा और हाई कोलेस्ट्राल का भी कारण बनता है।

एंकरः ये मोटापा और हाई कोलेस्ट्राल आम लोगों के लिए क्या क्या परेशानियाँ लाती है और इनसे कैसे बचा जा सकता है।

चारूः यह मोटापा और हाई कोलेस्ट्राल बीमारियों की जड़ है। इससे छोटी-मोटी बीमारियाँ जैसे थकान, जोड़ों में दर्द से लेकर हार्ट-अटैक जैसी बड़ी बीमारियाँ भी हो सकती है। इसमें हार्ट की नसों में फैट जमा हो जाता है जिससे खून का संचरण ठीक से नहीं हो पाता है, इसी तकलीफ से हार्ट-अटैक हो सकता है, कभी-कभी यह जानलेवा भी हो सकता है। अतः मैं दर्शकों को कम-से-कम ऑयली फूड और ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियाँ खाने की सलाह दूँगी।


एंकरः चारूजी, हमारे स्टूडियो में आने के लिए आपका धन्यवाद

चारूः जी, धन्यवाद

एंकरः तो दोस्तों, ये थी हमारी खास मेहमान चारू दुआ। अगले सप्ताह हम आपकी मुलाकात कराएँगे एक नये मेहमान से... तब तक के लिए हमें इजाजत दीजीए। नमस्कार।

भारत में 'न्यू सिनेमा' की शुरूआत 'भुवन सोम' से

( जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान शनिवार को फिल्म एप्रीशिएसन की क्लास होती थी, उसी में पहली फिल्म भुवन सोम दिखाई गयी थी। उस पर एक आलेख लिख कर लाना था। हमने लिखा, लेकिन शिक्षक महोदय को फिल्म के टेक्नीकल आस्पेक्टस पर टिप्पणी चाहिए थी, जिसे हम नहीं कर पाए थे।)


भारतीय सिने जगत में 'न्यू सिनेमा' की शुरूआत करने वाली फिल्म भुवन सोम वाकई एक कुशल निर्देशन में बनने वाली फिल्म है। मृणाल सेन ने जहाँ इस फिल्म से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी, वहीं हिन्दी सिनेमा को एक नया आयाम प्रदान किया। फिल्म की एक और विशेषता यह है कि निर्देशक मृणाल सेन, कैमरा मैन के के महाजन, अभिनेता उत्पल दत्त व अभिनेत्री सुहासिनी मुले सभी ने पहली बार हिन्दी फिल्म के लिए काम किया और सभी के कुशल कार्य व अभिनय ने इसे एक मील का पत्थर बना दिया।

भय- फिल्म का केंद्र-बिन्दु, जिसका एहसास होने पर भुवन सोम, जिसने अपने चारों ओर अनुशासन की कड़ी दुनिया बना रखी थी, जीवन की सच्चाई से वाकिफ हो जाते है। रेत की वादियों के बीच जब भुवन सोम शौकिया तौर पर शिकार करने जाते है तो वहाँ पर निशाना साधने के क्रम में एक पक्षी बंदूक की गोली से न घायल होकर उसकी आवाज से घायल हो जाता है, तो उसे इस बात का एहसास होता है कि भय से आम जीवन में बातें बिगड़ती ही है और इसके बाद फिल्म में नायक एक स्वच्छंद और उन्मुक्त जीवन जीने को आतुर दिखायी देता है।

फिल्म की एक कड़ी की बात न की जाए तो चर्चा अधूरी रह जाएगी। वह है- भ्रष्टाचार, जिसे कि हम सदियों से अपने समाज में पाते है। यहाँ पर चाय-पानी शब्द का उपयोग किया गया है, जिसके विषय में अभिनेत्री बड़ी मासूमियत से पूछती है कि क्या चाय-पानी का पैसा लेना गलत है क्या इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि भ्रष्टाचार के रूपों से समाज परिचित होते हुए भी अनजान बना रहता है। यहाँ निर्देशक समाज के भ्रष्ट आचरण को दिखाता तो है, लेकिन उसका समाधान नहीं ढूँढ़ता है।



अंततः यह कहा जा सकता है कि जीवन की वास्तविक सच्चाइयों को एक सूत्र में पिरोकर निर्देशक ने इस चलचित्र को एक उत्कृष्टता प्रदान की है।

साइंटून ( SCIENTOON)

( जामिया में ही साइंस राइटिंग वर्कशॉप के दौरान बनाया गया साइंटून = साइंस +कार्टून )

Wednesday, March 10, 2010

चाँद के लिए नयी सवारी

( फीचर के रूप में साइंस राइटिंग वर्कशॉप , जामिया मिल्लिया इसलामिया, सितम्बर 2006 के लिए लिखा गया वैज्ञानिक फीचर।)

आकाश में पंछी को उड़ता देख मानव ने कल्पना की- क्या हम भी उड़ सकते है? तो, इसका जवाब राइट बंधुओं ने हवाई जहाज बनाकर दिया। फिर तो मानव अंतरिक्ष में गया, चाँद पर पहुँचा और अब उससे भी आगे जाने की तैयारी में है। इसके लिए अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने अंतरिक्ष में तथा चाँद पर जाने के लिए एक नयी सवारी बनाने का फैसला किया है। वह नयी सवारी है- ओरिऑन अंतरिक्ष यान


आज से सैंतीस साल पहले जब मानव ने पहली बार चाँद पर पहुँचा, तो उसे नन्हे कदम की संज्ञा दी गयी। तब से लेकर आज तक हम अगला कदम बढ़ाने की तैयारी में जुटे है। मंगल पर जाने की सोच रहे है। उसके लिए हाल में ही नासा ने अत्याधुनिक तकनीक से युक्त एक नया अंतरिक्ष यान बनाने की घोषणा की है। जो कि पिछले यान अपोलो से ज्यादा विकसित होगा। नये अंतरिक्ष यान का नाम ओरिऑन रखा गया है जो कि काफी सोच विचार कर रखा गया है। जिस प्रकार पहले यान अपोलो का संबंध यूनान की पौराणिक कथा से है। इसी प्रकार ओरिऑन का नाम रात में आकाश में चमकने वाले नक्षत्र मंडल ओरिऑन से लिया गया है। इससे पहले साठ के दशक में भी नासा ने इस नाम का उपयोग नाभिकीय अंतरिक्ष यान के संदर्भ में किया था। इस नक्षत्र मंडल के काफी तारे दिशा बताने के लिए उपयोग किये जाते है जिससे कि खोजकर्ता हमें एक नयी दुनिया में ले जाते है।

ओरिऑन अपनी पहली उड़ान 2014 ईंस्वी में करेगा। जिससे अंतरिक्ष यात्री सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक ही जा सकते है। फिर इसके बाद 2020 ईंस्वी तक ओरिऑन द्वारा चाँद पर जाने की योजना है। इसके बाद ही मंगल या दूसरे ग्रहों की तरफ कदम बढ़ाने की बात सोची जा सकती है। तब हमें इस सौर-मंडल के अन्य ग्रहों की नयी दुनिया का पता चल सकेगा।

जून महीने में नासा ने इस कार्यक्रम के तहत विकसित होने वाले प्रक्षेपित यानों यानि लांच वेहकिल का नाम एरिस रखा गया है, जो कि मंगल का दूसरा नाम है। इसे प्रक्षेपित करने वाले बूस्टर का नाम एरिस 1 रखा गया है। एक बड़े भारी प्रक्षेपित हिस्से को एरिस 5 के नाम से जाना जाएगा।

नयी सवारी यानि कि नयी गाड़ी सुनते ही दिमाग में आता है कि जरूर इसमें नयी खूबियाँ भी होंगी। अब एक कार की बात करें, तो लोग कार में ज्यादा से ज्यादा सीट चाहते है और जगह भी। यह खूबियाँ ओरिऑन में भी है। यह अब ज्यादा से ज्यादा अंतरिक्ष यात्रियों को ले जा सकेगा और साथ ही साथ काफी सारा सामान भी। इससे चाँद और मंगल पर जाने में मदद मिलेगी। ओरिऑन का आकार पुराने अंतरिक्ष यानों के समान ही होगा, लेकिन इसमें अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जाएगा। इसका आकार अमेरिका और रूस में उपयोग होने वाले शंक्वाकार अंतरिक्ष यानों की ही भाँति होगा, लेकिन टाइल्स नहीं होंगे। जबकि पुराने ऊष्मारोधी कवच यानि हीट शील्डस और पैराशूटस का उपयोग किया जाएगा।

अभी हाल में ही नासा ने काफी सारी जाँचों को किया है, जिससे कि ओरिऑन अंतरिक्ष यान की डिजाइन को और अच्छा बनाने में मदद मिलेगी। इन जाँचों में मुख्य रूप से पैराशूट का समय पर खुलना आता है। इसके लिए नासा के इंजीनियरों ने अमेरिकी थल सेना के प्रशिक्षण केंद्र पर दो पैराशूट की जाँच की। जाँच के आँकड़ों को संग्रह कर प्रक्षेपास्त्र के प्रथम चरण को विकसित करने में मदद मिलेगी। पैराशूट 8,000 फीट की ऊँचाई से गिराकर जाँच की गई है और यह जाँच 2008 ईंस्वी तक लगातार चलती रहेगी।

ज्योतिष: एक पूर्ण विज्ञान

( यह आलेख जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा सितंबर 2006 में आयोजित साइंस राइटिंग वर्कशॉप में जाने के लिए हमारे संस्थान डिपार्टमेंट ऑफ फिल्म्स एंड टेलीविजन स्टडीज, भारतीय विद्या भवन में निबंध लिखने के लिए पाँच विषय दिए गए थे, उसी में से एक विषय पर लिखा गया था।)

ज्योतिष एक पूर्ण विज्ञान है। इस कथन की सत्यता जानने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि 'ज्योतिष' क्या है और 'विज्ञान' क्या है? पहले हम विज्ञान के विषय में ही चर्चा करें।

'विज्ञान' शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द साइंटिया ( Scientia) से हुई है जिसका अर्थ knowledge होता है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार- "विज्ञान एक व्यवस्थित ज्ञान है जो कि पर्यवेक्षण, तथ्यों की जाँच के पश्चात् ही प्राप्त किया जाता है।" साधारण भाषा में विज्ञान को इस तरह परिभाषित कर सकते है कि यह ज्ञान की वह सतत् प्रक्रिया है जिसमें कुछ सिद्धांत होते है, जो कि उदाहरणों या ठोस प्रमाणों द्वारा सिद्ध किये जाते है और हमें तर्कसंगत निष्कर्ष तक ले जाते है। जिसे एक विशेष द्वारा भी समझा जा सके और एक साधारण व्यक्ति द्वारा भी समझा जा सके। आजकल विज्ञान सिर्फ भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान को ही समझा जाता है, जो कि अनुभव और प्रयोग पर आधारित ज्ञान है। एक तरह से देखा जाए तो समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, इतिहास आदि भी विज्ञान है, लेकिन विज्ञान के हिमायती ऐसा मानने से इंकार करते है।
ज्योतिष की उत्पत्ति दो शब्दों ज्योति और ईश से हुई है। ज्योति का अर्थ- प्रकाश और ईश का अर्थ ईश्वर है अर्थात् ईश्वर का प्रकाश। कई विद्वानों ने उसकी परिभाषा विभिन्न प्रकार से दी है लेकिन यह मुख्य रूप से मानव के जीवन और भविष्य पर ग्रहों और तारों का पड़ने वाला प्रभाव है। ज्योतिष के अनुसार, सूर्य और प्रत्येक ग्रह का मनुष्य, पृथ्वी और जीवों पर अपना एक विशेष प्रभाव होता है। मनुष्य के जन्म के वक्त सूर्य और अन्य ग्रहों की स्थिति के आधार पर ज्योतिषी उस मनुष्य का न केवल भूत,वर्तमान और भविष्य बताने का प्रयास करता है बल्कि उसकी वयक्तिगत विशेषता और गुणों को भी बताता है।

यह एक साधारण सी बात है कि ज्योतिषी ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही मनुष्य के भूत के साथ-ही-साथ भविष्य को भी बताने की कोशिश करते है। यह मुख्य रूप से गणितीय गणना पर आधारित होती है और यह गणितीय गणना वैसे ही विभिन्न प्रकार की होती है जैसे कि एक भौतिक-शास्त्री अपनी बातों को समझाने के लिए विभिन्न गणितीय सूत्रों का सहारा लेता है।

यह भी एक सत्य है कि ज्योतिषी भविष्यवाणी करते वक्त अपनी अंतःप्रज्ञा का भी इस्तेमाल करता है ,जिससे कि भविष्यवाणियां सही हुआ करती है। इस प्रकार, ज्योतिष मुख्य रूप से कारण और प्रभाव की अवधारणा पर आधारित होता है, अतः इसे हम विज्ञान या कला कहे, कोई फर्क नही पड़ता। लेकिन, मनुष्य को अपने जीवन और भविष्य के विषय में जानने की उत्सुकता कम नहीं होती है जो कि इस विशेष ज्ञान अर्थात् ज्योतिष का वर्षों तक टिके रहने का कारण भी है।

यह भी उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर सत्य को सीमित नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसे समझने हेतु हमें दो प्रकार के ज्ञान की चर्चा करनी होगी- .तर्कसंगत ज्ञान 2. सहज बुद्धि। पहला ज्ञान मुख्य रूप से आँकड़ों, तथ्यों और घटनाओं से प्राप्त होता है, जिसका कि वैज्ञानिक आधार भी होता है। लेकिन सहज बुद्धि या अंतःप्रज्ञा मुख्य रूप से सत्य का सीधा आभास कराने से आती है, इसमें बुद्धि या तर्कसंगतता का कोई आधार नहीं होता है। इसे मुख्य रूप से इसे ईश्वरीय वरदान समझा जा सकता है। नास्त्रेदमस एक भौतिक-शास्त्री थे, न कि भविष्यवक्ता, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने अंतःप्रज्ञा के आधार पर ऐतिहासिक भविष्यवाणियाँ की।

उपरोक्त बातों का उल्लेख करने का एक ही मकसद है कि ज्योतिष में भी आँकड़ों का संग्रह किया जाता है, यथा किसी व्यक्ति विशेष की चारित्रिक विशेषता और उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं का अध्ययन ग्रहों की स्थिति और उस व्यक्ति पर ग्रहों के प्रभाव के कारण की जाती है। अगर हमें इस अध्ययन की जरूरत किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की विशेषता या घटनाओं के विषय में जानने के लिए पड़ती है, तो हम इसे कर सकते है। यह एक वैज्ञानिक विधि है, जिसका उपयोग विज्ञान की अन्य शाखाएँ भी करती है।
ज्योतिष चिर काल से चली आ रही विद्या है, जो कि मनुष्य के भविष्य संबंधी प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम है, जो कि विज्ञान की अन्य शाखाओं द्वारा संभव नहीं है। इसके अलावा यह मनुष्य के विश्वास पर आधारित ज्ञान है। ज्योतिष को खगोलशास्त्रीय आधार देकर हमने अपने विश्वासों को और भी आधार प्रदान किया है।

ज्योतिषिय भविष्यवाणियों के संदर्भ में यह प्रश्न उठाया जाता है कि सभी भविष्यवाणी सत्य नहीं होती या एक भविष्य में होने वाली घटना के विषय में विभिन्न ज्योतिषियों की राय भिन्न होती है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि ज्योतिष ज्ञान की विश्वसनीय शाखा नहीं है। वैज्ञानिक सिद्धांत भी समय समय पर नये तथ्यों के आने के पश्चात मामूली रूप से परिवर्तित होते है। वैज्ञानिक सिद्धांत में मामूली से परिवर्तन के लिए गहन अनुसंधान की जरूरत पड़ती है, तो इस प्रकार ज्योतिष में भी गहन अनुसंधान कर नये प्रकार के और ज्यादा सटीक ज्ञान को भी हासिल किया जा सकता है।

लेकिन वैज्ञानिक सोच रखने वाले व्यक्ति क्या इस बात का जवाब दे पाएँगें कि जो भविष्यवाणियां सही हुई, उसके पीछे क्या कारण थे? क्यों वे सत्य हुई? तभी हम उन्हें विज्ञान के विशेषज्ञ या छात्र कह पाएँगे।

यहाँ भारत में परमाणु युग की शुरूआत करने वाले होमी जहाँगीर भाभा का उल्लेख आवश्यक है क्योंकि वह एक महान वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक अच्छे ज्योतिषविद् भी थे और अपने ज्योतिषीय ज्ञान को बढ़ाने के लिए काफी अध्ययन भी किया था। तो क्या, डॉ भाभा की वैज्ञानिक सोच उनके इस विधा के अध्ययन में आड़े आयी?

अंततः निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि विज्ञान ने जिस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित किया है, उसी प्रकार ज्योतिष ने भी हमारे जीवन में काफी हद तक जगह बना रखी है। इसी कारण से अपने देश में विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया है। वह भी ज्योर्तिविज्ञान के रूप में। यह भी एक सत्य है कि कोई भी विद्या अपने आप में पूर्ण नहीं होती, लेकिन वह पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। विज्ञान की अन्य शाखाएं भी ज्योतिष की भाँति पूर्णता या उच्चतम संभव स्थिति की ओर अग्रसर हो रही है। अतः ज्योतिष, विज्ञान की अन्य शाखाओं की ही एक विज्ञान है जो कि मनुष्य की ज्ञान-पिपासा पर आधारित है।

नाम- नितेश कुमार गोयनका
रोल- J-48