Sunday, July 31, 2011

कितने भी ऩए दोस्त बना ले, पुराने दोस्त ही जिंदगी को नई तरोताजगी देते है..

फ्रेंडस- नई पीढ़ी इस शब्द का सामना डेली बेसिस पर कर रही है। सोशल नेटवर्किंग साइटस ने इस शब्द को इतना आम बना दिया है कि आज सब लोग आपके दोस्त है- आपके रिलेटिव हो या आपके पुराने दोस्त या आपके नए दोस्त, आपके सहकर्मी से लेकर आपके बॉस तक.. सब आज के दिन आपके फ्रेंड है। लेकिन नये पीढ़ी के ये नये दोस्त आपसे कितनी भी बात कर ले, चैटिंग कर ले ... उतना मजा नहीं आता है जितना पुराने दोस्तों से मिलने में आता है। स्कूल के दिनों के दोस्त की तुलना तो किसी से नहीं की जा सकती है। अब पिछले रविवार को ही भारतीय विद्या भवन के अल्मनायी मीट में अपने बैच के दोस्तों से मिलना काफी अच्छा रहा, लेकिन वो अपनापन नहीं झलका, जो इस रविवार यानि कल स्कूल टाइम के दोस्तों से मिलने में हुआ। बनारस में रह रहे साकेत का दिल्ली आने का कार्यक्रम हुआ तो उसने ही दिल्ली में रह रहे कुछ दोस्तों के गेट-टूगेदर का प्रोग्राम बनाया। लेकिन इस बार पहले की तरह दोस्तों का ही मिलना नहीं हुआ बल्कि दोस्तों के साथ उनकी धर्मपत्नियों भी थी, जिसमें बहुत लोग आपस में पहली बार मिल रहे थे। संडे की पार्ट टाइम कोर्स की क्लास लेने के बाद विवेक खेतान के घर पर चितरंजन पार्क जाना हुआ। आठ साल बाद जाने के बाद भी मकान आसानी से मिल गया। वहां विवेक राजगढ़िया सपत्नीक, ससाला व सपुत्री मौजूद थे। साकेत ऑफकोर्स था। साकेत व राजगढ़िया से ढ़ाई साल बाद मिलना हुआ और खेतान से तो उसकी शादी में अंतिम बार मिले थे। वहां से सब साकेत के सेलेक्ट सिटी वॉक मॉल में आए। थोड़े देऱ की विंडो शॉपिंग के बाद बड़े सात्विक अंदाज में सात्विक रेस्टूरेंट में सभी ने ़डिनर लिया और यहीं हमें मिस्टर एंड मिसेज नीरज अग्रवाल ने ज्वाइन किया। साकेत को साकेत छोड़ने की जल्दी थी क्योंकि उसे बनारस निकलना था। गेट-टूगेदर को यादगार बनाने के लिए हमने कुछ स्नैपस लिए। फिर हमने और साकेत ने बाकी दोस्तों को गुड बाय कह वहां से जल्द निकल लिए क्योंकि साकेत को बनारस लौटना था और मुझे नाइट शिफ्ट में ऑफिस आना था। खूब इन्ज़ॉय किया हमने इस पल को। जाते जाते साकेत ने स्टेशन से ये मैसेज किया- It ws a memorable & fantastic time we spent together. Let's do something to be together atleast once in a year. - Saket Saraf 31.07.2011 23:06. साकेत भी जानता है कि इस भागती दौड़ती जिंदगी में साल में एक बार भी इस तरह मिल लेना अपने आप में बड़ी बात है। मेरी इन सभी दोस्तों ( साकेत, विवेकद्वय) से अंतिम मुलाकात साकेत की शादी में हुई थी वो फरवरी 2007 में। अब इस सोशल नेटवर्क के जमाने में अगली बार कब मुलाकात होती है- ये भी देखने लायक होगा।