Tuesday, July 8, 2014

15 अप्रैल 2014

'लेबर' और 'लीजर' - अंग्रेजी के ये दो टर्म हमारे मानव जीवन को पूरी तरह से परिभाषित करते है। अगर दिन की बात करे तो हम काम करते है या आराम। शरीर के लिए काम करना भी जरूरी है और आराम करना भी जरूरी है। अगर काम करने में ही आपकी पूरी ऊर्जा चली जाती है तो आपको और आराम की जरूरत होती है। पश्चिमी देशों में हैप्पी ऑवर्स की अवधारणा बनाई गई जिसे बड़ी-बड़ी कंपनियां एक्सप्लॉयट करती है। काम के घंटे के निर्धारण के बाद बचा हुआ समय आपका अपना है, जिसे या तो आप लीजर में प्रयोग करे या लेबर में..ओवरटाइम की अवधारणा यही से निकली.. अगर आपके ऑफिस को आपके लीजर ऑवर को कम कराकर उसका उपयोग अपने लिए करना है तो आपको ओवरटाइम करना होगा और इसके लिए आपको पैसे मिलेंगे, लेकिन वो आराम की शर्त पर। एक और बात... आराम की अवधारणा यहां तक की बाइबिल में भी थी। बाइबिल में लिखा है कि भगवान ने छह दिन के भीतर दुनिया बनाई और सातवें दिन आराम की सोची। तो आराम का कंसेप्ट सभी जगह है। बहुत मेहनत के बाद लोगों को स्वतः नींद जाती है। आराम शरीर के लिए बहुत जरूरी होता है। अब ये किसी इंसान पर निर्भर करता है कि वो इसे किस तरह उपयोग में लाता है। पूरे दुनिया में अलग-अलग ऑवर है। 35 घंटे प्रति सप्ताह से लेकर 54 घंटे प्रति सप्ताह तक काम के ऑवर होते है। 6 घंटे छह दिन या 9 घंटे 6 दिन तक लगातार काम करने के बाद 7वां दिन आराम का होना ही चाहिए, नहीं तो लगातार काम करने से शरीर थक जाता है, टूट जाता है। इसलिए अपने को पूरी तरह से दुरूस्त रखने की जरूरत है.. क्योंकि काम भी जरूरी है और आराम भी।    (0041)

Sunday, March 23, 2014

22 मार्च 21014

दुनिया मेरे आगे... अभी रोज रात 9 बजे खाना खाने के लिए आंटी के यहां जाता हूं। रास्ते में गली नंबर 4 ( ललिता पार्क) में एक चार मंजिला इमारत बन रही है। उसके भू-तल पर एक मजदूर महिला इस वक्त रोज मोबाइल को सीखने की कोशिश करती रहती है। कल के दिन तो कुछ मजदूर भी थे.. जो कि उसे मोबाइल चलाना सीखा रहे थे। आज वो महिला, शायद अनपढ़ है.. मोबाइल की स्क्रीन को घूरे जा रही थी। मोबाइल का टॉर्च ऊपर की तरफ ऑन था। पास में उसका एक बच्चा खेल रहा था। आज के जमाने में तकनीक तो पूरे देश तेजी से पैर पसार रही है, लेकिन साक्षरता की कमी से निरक्षर या कम-पढ़े लिखे लोग तकनीक का उपयोग कर तो रहे है लेकिन उनका ना पढ़ना- उनके आड़े आ जा रहा है, फिर भी किसी तरह काम चलाऊ तरीके से अपना काम चला ही लेते है। अभी जिस मोबाइल की बात कर रहा था, वो तो काफी साधारण-सा था। जिसे आसानी से सीखा जा सकता है। एक स्मार्ट फोन का भी केस है। मेरे ही फ्लोर पर एक फैमिली है, महिला कम पढ़ी-लिखी है.. कहिए तो सिर्फ अक्षरों का ज्ञान है, उसे मिलाकर भी पढ़ना नहीं आता। अभी हाल में ही बेटी की जिद पर (साथ में उसकी जिद भी शामिल थी) सैमसंग का तेरह हजार का मोबाइल खरीदा। वो भी अपनी औकात से बाहर। आर्थिक स्थिति ठीक है, पर इतनी भी ठीक नहीं कि सिर्फ बात करने के लिए स्मार्ट फोन ले ले- वो भी इतना महंगा। नेट भी चालू करवाया, लेकिन वही कहावत याद आ जाती है- काला अक्षर, भैंस बराबर। लेकिन नेट का फायदा ये हुआ कि कुछ गेम्स डाउनलोड हो गए, जिसे मजे से साढ़े चार साल की बेटी खेली एक-दो सप्ताह.. अब वो फोन अब इन सबके लिए किसी यूज का नहीं। बस बात करने के काम में आता है, जिसके लिए इतना बड़ा अमाउंट खर्च करना बेवकूफी है। तकनीक का तब मजा है, जब आप पढ़े लिखे हो, तकनीक सीख सके, समझ सके। नहीं तो दुनिया में भारत उपभोक्तावाद का डेस्टिनेशन तो बन सकता है, लेकिन पढऩे का नहीं.. ये सच है। (2151)

21 मार्च 2014

मन अशांत है। बेचैन है। ऑफिस में पांच साल होने जा रहे है। यूपीए 2 हमारे सामने आई थी इसी चैनल में, कार्यस्थल दूसरा था। काम के हिसाब से देखा जाए तो थोड़ा बहुत ही काम सीखने को मिला। किसी से अपनी व्यथा कह भी नहीं सकते। बस.. काम किए चले जा रहे है.. एक ही तरह का। कहते है ना आपकी तरक्की सिर्फ आप पर निर्भर नहीं करती, इसके लिए पूरी कायनात का साथ देना भी जरूरी है.. आपके सहकर्मी, आपके वरिष्ठ, आपके बॉसेज... आपका काम, काम का स्वरूप, काम का क्राइटेरिया... सब चीज आपके फेवर में होना जरूरी है, लेकिन आपको याद दिलाया जाएगा- गीता का सार – काम करता चल, फल की चिंता क्यूं करता है। कर तो रहे है भई। कोई देख नहीं रहा है- ऐसा नहीं है। ऊपरवाला, ऑफ-कोर्स सब कुछ देख रहा है। लेकिन किस तरह चीजों को जस्टीफाई कर रहा है- ये उसके हाथ में ही है। हम कोई सवाल नहीं उठा रहे है। लेकिन एक किक तो मिलनी चाहिए। शैक्षणिक स्तर पर कुछ करने की सोचे तो रास्ता ही नहीं खुल रहा। एक परीक्षा जो है, पास ही नहीं हो पा रहे है। ऑबजेक्टिव ने तो पूरी ऑबजेक्टिविटी की झंड कर रखी है। खुद एक ऑबजेक्ट बन कर रहे गए है। न्यूटन का पहला नियम लगा पड़ा है। एक जगह से हिल ही नहीं पा रहे है। पता नहीं मेडियोक्रिटी से ही जिंदगी सटक रह गई। लेकिन ऐसी स्थिति नहीं है। चीजें बदलेंगी। चीजें बदलने के लिए होती है। कायनात को भी हमारा साथ देना होगा। दीवार पर टंगे कैलेंडर की तरह ही एक जगह, महीने के बदलने के अलावा, टंगे नहीं रह जाना है। नहीं तो साल भर बाद उसी कैलेंडर की तरह फेंक दिए जायेंगे। तो इनोवेट करना जरूरी है। नवप्रवर्तन। एक नया करने की सोच जन्म ली है। रूकावटें.. अड़चने आ रही है। लेकिन सब बाधाओं से लड़कर एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ना होगा। कर शपथ.. कर शपथ.. बढ़ेंगे जीवन के अग्निपथ पर। (2355)

Friday, March 21, 2014

20 मार्च 2014

ई-क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक हो गया, तो भला हमारे मोहल्ले और आस-पास के इलाकों में चलने वाला रिक्शा कैसे इससे अछूता रहता। दिल्ली में भले ही आपने नोटिस नहीं किया हो, किसी भी मेट्रो स्टेशन से आप बाहर निकलोगे, तो आस-पास के इलाकों में जाने के लिए रिक्शा-चालक रिक्शा खड़े हुए मिल जाते थे, लेकिन अब बड़ी तेजी से पैर से चलने वाले रिक्शा की जगह बैट्री से चलने वाले रिक्शे ने ले ली है। सवारी भी जल्दी से अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए इन ई-रिक्शा को पारंपरिक रिक्शे के मुकाबले बेहतर और सस्ता मानते है और झट से इस पर सवार भी हो लेते है। पारंपरिक रिक्शों की तरह ई-रिक्शा चारों तरफ से खुला होने की वजह से रास्ते में पड़ने वाले इमारतों और माइलस्टोनों को देखने में सवारी की मदद करता है। इस कारण से ये ऑटो पर भी भारी पड़ रहा है। लेकिन तेजी से बढ़ती इसकी संख्या यातायात विभाग के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। पहली बात तो इन ई-रिक्शों का कोई पंजीकरण नहीं हो रहा है, इसलिए इसकी संख्या बढ़ती जा रही है और एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली के सड़कों पर लगभग एक लाख ई-रिक्शा दौड़ रहे है। दिल्ली में पहले से ही सड़कों पर इतने वाहन दौड़ रहे है कि ट्रैफिक जाम काफी आम रहता है। ऐसे में सरकार के द्वारा इसको नियंत्रित ना करना- समस्या को जन्म दे सकता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस सिलसिले में सरकार को फटकार भी लगाई है, लेकिन इन ई-रिक्शा से जिन लोगों को रोजी-रोटी मिल रही है वे अपने को पंजीकृत कराना चाह रहे है, लेकिन अन्य संघों की तरह वे भी अपने लिए सुविधाओं की मांग कर रहे है। 250 वॉट और 25 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से कम गति वाले वाहन नॉन-मोटराइज्ड की श्रेणी में आते है, लेकिन यहां के ई-रिक्शा इससे ज्यादा वॉट की बैट्री उपयोग में ला रहे है, जो परेशानी का कारण है। इस समस्या से जल्द निजात पाना- सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। (2314)

20 मार्च 2014

सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई थी। इसके बाद दो दशक तक विश्व में अमेरिका का वर्चस्व कायम रहा। द्विधुव्रीय विश्व व्यवस्था का दौर भले ही कुछ दिनों तक के लिए खत्म हो गया था, लेकिन स्थिति जस-की-तस रहना संभव नहीं था। पिछले कुछ सालों में चीन के विश्व आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने से अमेरिका का एकाधिकारवाद खत्म हुआ। भारत भी एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है- लेकिन ये कोशिश अंदरूनी उठापटक के कारण निकट भविष्य में मूर्त होती नहीं दिखाई देती। इसी बीच पिछले माह से यूक्रेन में चल रहे संकट का अंत- इसके अधीन रहने वाले स्वायत्त प्रायद्वीप क्रीमिया का रूस में शामिल हो जाने के साथ हुआ। इससे पहले भी रूस ने जॉर्जिया, दागेस्तान को अपने अधीन कर इसे स्वायत्त प्रांत के रूप में रखा है। क्रीमिया भी इसी रूप में रूस का हिस्सा बनकर रहेगा। क्रीमिया के रूस में शामिल होने का विरोध अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भले ही किया हो, लेकिन ये नाममात्र का ही है। ब्लादीमीर पुतिन के इस रणनीतिक प्रयास से रूस एक शक्ति के रूप में विश्व पटल पर फिर से दस्तक दे रहा है। जितनी फूर्ति और करीने से क्रीमिया में जनमत संग्रह कराकर पुतिन ने इसे रूस के अधीन किया है, इसका व्यापक असर आगे देखने को मिलेगा। गैस और तेल से समृद्ध रूस पर यूरोपीय देश आश्रित है, अतः उनका मुखर विरोध सामने नहीं आया। अमेरिका भौगोलिक दृष्टि से रूस से बहुत दूर है और यूरोपीय देशों की मदद से ही कुछ बड़ा कदम उठा सकता था, लेकिन वो भी देखने को नहीं मिला। दो एशियाई ताकतों- चीन और भारत- ने पूरे संकट पर तटस्थता की नीति अपनाई। ऐसे में आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर बहुध्रुवीय व्यवस्था तो उभरती हुई दिखाई देती है, लेकिन जो राष्ट्र आर्थिक रूप से सशक्त होगा, वह अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिए सॉफ्ट पॉवर के साथ हॉर्ड पॉवर का उपयोग करने से भी नहीं हिचकेगा। (2247)

Wednesday, March 19, 2014

19 मार्च 2014

सूचना क्रांति के इस दौर में हमारे देश में प्रिंट मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में विकास देखने को मिल रहा है। देश में इस वक्त करीब 800 टीवी चैनल है, जिसमें लगभग 20 फीसदी चैनलों पर समाचार किसी ना किसी रूप में आता है। आधे घंटे के बुलेटिन से लेकरा 24 घंटे के न्यूज चैनल जहां प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इसे मजबूती देते है, वहीं लोगों को सीधा प्रसारण दिखाकर देश में तेजी से बदलते घटनाक्रम से लोगों को रू-ब-रू कराते है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आविर्भाव के कारण लोगों को समाचार को देखने, सुनने व जानने का नजरिया बदल गया, लेकिन समय के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने अस्तित्व को लेकर टीआरपी और नये हथकंडों पर आश्रित रहने लगा। समाचार की जगह ड्रामे ने ले ली है। कुछ खबरों को लेकर ने एक्टिविज्म दिखाया को उसका सकारात्मक परिणाम सामने आया भी, लेकिन ज्यादा मामले टीआरपी पर आश्रित होते है। 2011 का अन्ना आंदोलन मीडिया के कारण इतना बड़ा आंदोलन बना। 2012 में इस आंदोलन से निकली राजनीतिक पार्टी- आम आदमी पार्टी- ने 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की और 49 दिन तकर दिल्ली सरकार के रूप में ऑफिस में भी रही। सब मीडिया की मेहरबानी रही, लेकिन अब जब लोकसभा चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी को उतनी कवरेज नहीं मिल रही तो पार्टी प्रमुख की बेचैनी पत्रकारों को जेल भेजने की धमकी के रूप में मिल आ रही है। ये वही जनाब है जो अन्ना आंदोलन के समय मीडिया को फोल्डेड हैंड से अभिवादन करने को कहते है। मीडिया भी जनभावना से प्रेरित होकर उस वक्त अन्ना आंदोलन, विधानसभा चुनावों के दौरान आप का आविर्भाव और अब लोकसभा चुनाव के समय मोदी लहर पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। तो ऐसे में मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठता है। फिर मीडिया समूह के एक ग्रुप – एनबीए- का आप की खबरों को बॉयकॉट करने की बात तो और हास्यास्पद लगती है। इसलिए अभी भी देश में भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में काफी गति देखने को मिल रही है, लेकिन 20 साल पुराने इस मीडिया को अभी शैशवावस्था से बाहर निकलना है, कई नई चीजों को देखना व समझना है जो कि सभी के हितों के लिए अच्छा होगा। (1621)

Tuesday, March 18, 2014

18 मार्च 2014

भारत को हाल के वर्षों में क्रिकेट के अलावा कई अन्य खेलों में सफलता मिली है। खिलाड़ियों ने जहां ओलंपिक खेलों में भारत को पिछली बार छह पदक दिलवाए थे, वहीं कई अन्य प्रतिस्पर्धाओं में कुल मिलाकर तीस पदक जीते थे। पिछले नौ साल से भारतीय खेल से जुड़े एक नॉन-प्रॉफिट संस्था मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट ने खेल या यूं कहिए खिलाड़ियों से अपना नाता तोड़ लिया है। 2007 से खिलाड़ियों को हर तरह की सुविधा देने वाला ये निजी ट्रस्ट भारतीय खेलों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह सामने आया था। खिलाड़ी अपने खेल पर पूरी तरह से ध्यान दे सके और उन्हें किसी और बात की चिंता ना हो- इस बात का ख्याल ये ट्रस्ट बखूबी रखता था। ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतिस्पर्धाओं में खिलाड़ियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब जाकर दुनिया के दो सौ देशों के खिलाड़ियों को पीछे छोड़ते हुए देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने का अवसर मिलता है। खिलाड़ियों के लिए कोच, फिजियो, मनोचिकित्सक, मालिश करने वाला, सर्जन आदि के अलावा प्रशिक्षण सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत पड़ती है, प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए एक जगह से दूसरे जगह की यात्रा करना- इन सबकी व्यवस्था करना इतना आसान काम नहीं होताष अगर खिलाड़ी को खुद ये काम करना पड़े तो वो अपने खेल पर ध्यान कहां से दे पाएगा। ऐसी सभी जरूरतों को ये ट्रस्ट- खिलाड़ी के एक फोन कॉल पर कर दिया करता था। लेकिन खिलाड़ी एमसीटी के बंद होने से इन सुविधाओं को एक फोन कॉल पर हासिल नहीं कर सकते- ऐसा नहीं है। कई अन्य ट्रस्ट भी है, लेकिन काफी कम समय में खिलाड़ियों को सभी सुविधा देने का काम एमसीटी ने किया- वो मुश्किल ही दिखता है। सरकार या देश का खेल प्रशासन कब इस तरफ पेशेवर रवैया अपनाता है- ये तो भविष्य के गर्त में छिपा है, लेकिन फिलवक्त तो दूर-दूर तक ऐसी सुविधा देना इनके वश की बात नहीं है। ( 2009)

Monday, March 17, 2014

17 मार्च 2014

विश्व टी20 के लिए बांग्लादेश के स्टेडियम सज गए है। क्वालीफाइंग दौर के मुकाबले चल रहे है। छोटी टीमें मुख्य दौर में आने की जुगत में है। यहीं बांग्लादेश में हाल में एशिया कप के मुकाबले हुए, जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच मैच हुआ और पाकिस्तान ने रोमांचक जीत हासिल की थी, लेकिन ये जीत कुछ और कारणों से भारतीय मीडिया के सुर्खियों में छाई रही। विश्व टी20 में फिर भारत और पाकिस्तान आमने-सामने होंगे, कोई एक टीम जीतेगी। अगर भारत जीता- तो सुर्खियां होंगी- भारत ने पाक से एशिया कप की हार का बदला लिया। अगर पाकिस्तान जीता तो फिर क्या मेरठ के एक विश्वविद्यालय – स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय- के वे छात्र उन कश्मीरी छात्रों पर अपनी भड़ास निकाल सकेंगे, जिन्होंने पिछले मुकाबले में हार के बाद- उन कश्मीरी छात्रों को हॉस्टल से बाहर निकलवा दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक तरफ जहां भारत की किरकिरी करवाई, वहीं स्थानीय प्रशासन ने देशद्रोह का आरोप पहले लगाकर, फिर वापस लेकर- अपनी भद ही पिटवाई। उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री को इस सिलसिले में बात करनी पड़ी। अब लोगों को समझना चाहिए कि वे अस्सी के दशक में नहीं जी रहे। ये 2014 का भारत है। सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक तौर पर हम पिछले दशकों से काफी आगे बढ़ गए है। क्रिकेट की ही बात करे, तो फुटबॉल की तरह क्लब-संस्कृति आने के साथ क्रिकेट भी अपने आप को इवॉल्व कर रहा है। देश पीछे छूट रहा है। यहां तक की एशिया कप में भारत की कप्तानी कर रहे विराट कोहली को अपने देश में आईपीएल के मैच में आउट होने पर स्टेडियम में सन्नाटा नहीं, बल्कि दर्शकों की तालियां सुनने को मिलती है, जिसे वे हजम नहीं कर पाते है। दर्शक तो खेल आनंद उठाने के नजरिए से देखता है। वो किसी भी टीम को सपोर्ट कर सकता है, अपनी टीम की जीत पर खुशी मना सकता है। मेरठ में हुई घटना- भारत की सच्ची तस्वीर नहीं पेश करता। लोगों को अपने जेहन में एक बात हमेशा रखनी चाहिए- खेल को खेल की तरह लो।“ (2011)

Saturday, March 15, 2014

15 मार्च, 2014

हमारे भारतवर्ष का सबसे बड़ा पर्व आने को है... जी, नहीं, मैं होली की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि लोकतंत्र के महापर्व यानि लोकसभा चुनाव की बात कर रहा हूं। 2014 का सबसे बड़ा इवेंट- आम चुनाव- इसके लिए शतरंजी बिसात बिछ गई है। आज ही दूसरे और तीसरे चरण की अधिसूचना जारी होने के साथ बड़े राज्यों के कुछ लोकसभा सीटों के लिए नामांकन भरने का काम शुरू हो गया है। बड़ी पार्टियां अभी उम्मीदावारों के नाम पर माथापच्ची कर रही है कि किसे कहां से उम्मीदवार बनाया जाए ताकि उनकी जीत की संभावना बढ़ जाए। 272 के जादुई आंकड़े को छूने की बात तो बड़ी पार्टियां सोच भी नहीं रही है। पार्टियां तो छोड़िए... दो बड़े गठबंधन भी 272+ की सोच ही नही पा रहे है। तो ऐसे में क्षेत्रीय क्षत्रपों, जिनकी सीटें 1 से 30 के बीच रहने की संभावना बनती है, की भूमिका बढ़ जाती है। समाचार पत्रों या अन्य समाचार माध्यमों से दर्शकों को रोज किसी-ना-किसी के फलां पार्टी को छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल होने की खबरों से दो-चार होना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसे नेता दल-बदलने की प्रक्रिया में शामिल होते है जिन्होंने अपने तीन दशक एक नेता या एक पार्टी को दिया होता है, तो वाकई खबर बनने वाली बात होती है। छोटे दल या ऐसे नेता, जो दल बदलते है, वर्तमान परिस्थिति में हवा का रूख भांपकर उन दलों के साथ हो जाते है जिनके जीतने की संभावना बहुत होती है। लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व में एक बात को स्पष्ट हो जाती है कि होली की तरह ही लोग अपने चेहरे को उस रंग में रंगना चाहते जो कि उन्हें सत्ता के करीब ले जाएं। आदर्शवाद, नैतिकता, सिद्धांत- ये सभी कोई मायने नहीं रखता है। सेवा के नाम पर मेवा खाने की संस्कृति के पोषक ऐसे नेताओं से कोई उम्मीद रखना बेमानी होगी। (2147)

Wednesday, January 22, 2014

25 नवंबर, 2013

आजकल ख़बर बनाने वाले ख़बर बन रहे है। चुनावी मौसम है, ऐसे में नेताओं के टीवी पर छाने की बात आम हुआ करती है, लेकिन अगर ख़बर बनाने वाले....... वो भी ऐसी-वैसी नहीं... बल्कि स्टिंग ऑपरेशन के जरिए भारतीय राजनीति में भूचाल लाने वाले और समय-समय पर अपनी खोजी पत्रकारिता के बल पर तहलका लाने वाले 'तहलका' समूह के निवर्तमान संपादक तरूण तेजपाल की बात हो, तो लाजिमी है कि चर्चा को खूब होगी। गोवा में पत्रिका के एक कार्यक्रम के दौरान एक महिला सहकर्मी द्वारा यौन उत्पीड़न के लगाए गए आरोपों से घिरे तरूण तेजपाल भले ही अच्छे लेखक, विचारक और समाचार जगत में क्रांति लाने वाले हो, लेकिन हाल के उनके कुकृत्य ने ये साबित कर दिया है कि आदमी की कुत्सित इच्छा उसका विनाश कर देती है। यौन प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे कृत्य किसी भी सभ्य समाज में क्षम्य नहीं हो सकते। अगर किसी व्यक्ति पर ऐसा आरोप आता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार तो तय है जैसा कि दिल्ली में 16 दिसंबर की बलात्कार घटना के आरोपियों के साथ हुआ था, साथ ही ये किसी निरक्षर या छोटे स्तर पर किए गए लोगों द्वारा हो या ऊपरलिखित किसी हाई-प्रोफाइल व्यक्ति द्वारा किया मामला हो, तब भी सामाजिक बहिष्कार के साथ-साथ उसे व उसके परिवार को काफी जलालत झेलनी पड़ती है, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि आज के दिन आरोपियों के डराने-धमकाने के बाद पीड़ित लोग भी मुखर रूप से अपनी बात रख रहे है। पीड़ित व्यक्ति के परिजनों द्वारा बदनामी के डर से इन बातों को दबाए जाने के कारण ऐसा कुकृत्य करने वालों का हौसला और बढ़ता है। इंसाफ की आस में सामने आने वाले पीड़ित लोगों की हमें कद्र करनी चाहिए, उन्हें समाज में समुचित सम्मान मिलना चाहिए ना कि आरोपियों को। ( 2336)

2 मार्च 2013

भारतीय गणराज्य के सालाना आय-व्यय का ब्यौरा यानि बजट को दो दिन पहले यानि 28 फरवरी को वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा में पेश किया। पिछले साल की तरह इस साल भी बजट क्वारनटाइन में बजट की कॉपी सवा आठ बजे तक हमें अग्रिम में मिल गई, लेकिन वैसा आउटपुट नहीं दे पाये जैसा देना चाहिए था। फिर भी काम की तारीफ हुई।  बजट में इस बार अगले साल होने वाले आम चुनाव को देखते हुए किसी तरह के पॉपुलिस्ट बजट की यानि लोक-लुभावन वायदों की किसी झड़ी को लगाने से चिदंबरम ने साफ इंकार कर दिया। वित्तीय अनुशासन पर जोर देने की बात स्पष्ट रूप से दिखाई दी। भारत अभी विकास दर के उस स्तर को हासिल करने की सोच रहा है जो कि अभी दिवा-स्वप्न की भांति है। 5 प्रतिशत के आंकड़े के इर्द-गिर्द घूमता विकास-दर, राजस्व घाटे को कुल सकल घरेलू उत्पाद का 4.8 प्रतिशत तक लाने का बजट अनुमान- ये सब एक तरीके से किसी नट की तरह रस्सी पर चलने का काम करने के समान है। इसमें वित्त मंत्री ने काफी समझदारी दिखाई। सब्सिडी बिल को कम करना- भले ही महंगाई के रूप में आम जनता के सामने आ रहा है, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। विश्व की बड़ी- बड़ी रेटिंग एजेंसियों ने भारत का आर्थिक परिदृश्य को जस-का-तस रखा है, इसे जंक स्टेट के दर्जे में नहीं डाला। इससे जहां निवेशकों को उत्साह बढ़ेगा, वहीं रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स वाले मामले में स्पष्टता का अभाव विदेशी निवेशकों को कहीं-ना-कहीं निवेश करने से रोकेगा। अभी की स्थिति में वित्त मंत्री ने जो बजट पेश किया है, वह वाकई एक अच्छा बजट है। इससे पहले भी रेल बजट में आम जनता को किराया ना बढ़ाने का एक छद्म राहत दी गई। छद्म तरीके से अन्य भाड़े बढ़ाए गए, जिसका बाद में पता चलेगा। आम बजट कमरतोड़ महंगाई को लाने में सहयोगी होगा, लेकिन अभी की यह जरूरत भी है। (2221)

12 फरवरी, 2013

आस्था के पर्व महाकुंभ के अवसर पर स्नान के लिए तीन करोड़ लोग मौनी अमावस्या के अवसर पर एकत्रित हुए। एक शहर में इतने लोगों का एक साथ आना और वहां से वापस लौटना- निश्चय ही एक बड़े प्रबंधन की जरूरत है। लेकिन सरकारें हमेशा पुराने मापदंडों पर नई प्रबंधन योजना आनन-फानन में बनाती है, जिसका नतीजा बदइंतजामी के रूप में सामने आता है और कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। रविवार को हुई घटना में 36 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। केंद्र व राज्य सरकारें एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ रही है। घटना रेलवे स्टेशन की है जहां पर फुटब्रिज की रेलिंग टूटने की घटना भगदड़ के रूप में तब्दील हुई और यह दर्दनाक हादसा हुआ। आस्था के पीछे लोग सब कुछ भूल-भालकर किसी भी स्थिति में रहते हुए स्नान करना हो, पूजा-अर्चना करना हो, पत्थर मारना हो या इस तरह के अन्य कार्य करना हो- इसके लिए जुट तो जाते है लेकिन अनुशासन की कमी के चलते कई बार इतनी बड़ी दर्दनाक घटनाओं के शिकार बन जाते है। अभी हाल हीं में बिहार के लोकपर्व छठ के अवसर पर पोंटून पुल/चचरी पुल (तात्कालिक व्यवस्था) के चलते दर्जन भर लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके लिए लोग तो जिम्मेदार है ही, सरकारें व प्रशासन भी पूरी तरह जिम्मेवार है। इलाहाबाद की बात करे, तो रेलवे को नहीं चाहिए कि वह स्टेशन पर स्थित फुट ओवर ब्रिज या ऐसी ही अन्य सुविधाओं की समय-समय पर जांच कराकर उसे अपग्रेड भी करवाते रहे। इसके लिए रेलवे पैसा का रोना रोएगी, तो इसके लिए पिछले रेल मंत्रीव उनके लोक लुभावन बजट जिम्मेदार है। किराया का एक दशक से ना बढ़ना, रेल में कई आधुनिक तकनीक के ना आने का रोड़ा बन अटका पड़ा है। साथ ही, मेला व कुंभ प्रशासन को भी बाहर से आने वाले लोगों की एंट्री प्वाइंट से एक्जिट प्वाइंट सभी को ध्यान में रखकर व्यवस्था करनी चाहिए ना कि सिर्फ मेला स्थल पर। इसमें सरकार के साथ-साथ जनता को भी अपना सहयोग देना होगा। (1326)

5 फरवरी, 2013

बाहर बारिश हो रही है। मौसम में ये तब्दीली पिछले दो दिनों से है। आज सुबह के समय अभी आसमान में घने काले बादल छाये हुए है। बारिश लगता है आज थमेगी नहीं। कल ही कवरेज टीम के साथ भारतीय मौसम विभाग जाना हुआ। लोदी रोड स्थित मौसम विभाग के भवन में आँख-मिचौली करते, कभी खुशगवार, कभी थोड़ा दिक्कत देने वाला मौसम क्यूं हो रहा है- इसका कारण जानने पहुंचे। मुख्य बिल्डिंग में पूरे देश के मौसम का पूर्वानुमान किया जाता है, वहीं रिजनल मेट्रोलॉजिकल सेंटर में  उत्तर-पूर्व भारत के राज्यों का पूर्वानुमान किया जाता है। अभी हाल के मौसम में बदलाव पश्चिम विक्षोभ के कारण हुआ है। कैस्पियन सागर, भू-मध्यसागर, अरब सागर के ऊपर कई बदलाव का असर अब जाकर हमें देखने को मिल रहा है। टेलीविजन चैनल के लिए बाइट देने से पहले दो अधिकारियों बिशन सिंह और एम. दुरईस्वामी सर ने दस-पंद्रह मिनट तक तीन सिस्टम पर तरह-तरह के भारतीय मानचित्र के ग्राफिक्स पर तरह-तरह के चिह्न, रेखाएं इत्यादि को देखकर मौसम का अध्ययन किया, फिर एएनआई और हमारे चैनल को साथ में बाइट दिया। एएनआई वालों ने तो उसका सीधा प्रसारण कर डाला एक 3-जी डिब्बे की मदद से। तकनीक के बारे में सुन रखा था लेकिन देखने का मौका पहली बार मिला। काफी अच्छा अनुभव रहा। यह मेरे पैकेजिंग की ड्यूटी के बीच में करना पड़ा। वैसे मौसम विभाग जाने का उद्देश्य दूसरा भी था। लेकिन उससे संबंधित काम ना हो सका। मौसम विभाग में उपयोग में लाया जाने वाला सिस्टम 206 करोड़ का था, जिसे फ्रांस से मंगाया गया था, लेकिन सरकारी सिस्टम की मार झेलने का दर्द यहां के अधिकारी ने बताया। सरकारी महकमें में फाइल चलने की गति के कारण जिस सिस्टम को लाने की बात होती है, उसके आने तक वह आउटडेटेड और आधी कीमत का हो जाता है। नया सिस्टम उससे ज्यादा उपयोगी होता है और इस तरह हम नए सिस्टम का फायदा उठा नहीं पाते। (0810)

2 फरवरी, 2013

भारत के संविधान ने अपने नागरिकों को संविधान की धारा 19 के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। साथ ही धारा 19(1) के तहत कुछ एेसे कारणात्मक प्रतिबंध लगाए है जिससे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगता है। अभी हाल के दो उदाहरणों का जिक्र करना चाहूंगा- सबसे हालिया जयपुर साहित्य उत्सव में समाजशास्त्री आशीष नंदी ने एक चर्चा के दौरान अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति को सबसे भ्रष्ट करार दिया, यह भले ही चर्चा के परिप्रेक्ष्य में कही गई थी। ऐसा कहने से पहले नंदी ने स्पष्ट कहा था कि मेरे द्वारा दिया जा रहा कथन वल्गर होगा, फिर भी उन्होंने ये बात कही। मीडिया ने इस हिस्से को पकड़कर तूल दे दिया और नंदी साहब को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा, जहां उन्हें मुख्य न्यायधीश की भी फटकार सुननी पड़ी। अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में दायर एफआईआर को भी रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद ली। आशीष नंदी एक विद्वान प्रोफेसर के रूप में जाने जाते है, तो उन्हें इन सब चीजों से गुजरना पड़ा, उन्होंने समाज के एख तबके को सिर्फ भ्रष्ट बताया था, जबकि वहीं दूसरी तरफ राजनीतिज्ञ के तौर पर हैदराबाद के एक विधायक अकबरूद्दीन ओवैसी ने एक जलसे में गैर-धर्म के बारे में अनाप-शनाप कहा,तो शुरूआत में तो यह मुद्दा मीडिया में आया हीं नहीं, बाद में सोशल मीडिया पर चल रहे एक्टिविज्म के कारण कुछ दिनों के लिए मीडिया में आया। मामला एक बार फिर से दब गया। पहले तो खबर बनी ही नहीं, फिर बनी तो इसे राजनीतिक रोटी सेेंकने वाली बात कहकर महत्त्व नहीं दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भ्रष्ट को भ्रष्ट बताना- गलत हो सकता है तो किसी धर्म के प्रति अनर्गल बोलना उससे भी ज्यादा गलत है ऐसे दोहरे मापदंड अपने यहां चलते रहते है। इसकी पूरी स्वतंत्रता है। (2322)

17 जनवरी, 2013

नए साल में भी खबरों का उसी तरह आना जारी है। पिछले सितंबर माह में एयर इंडिया के बेड़े में ड्रीमलाइनर विमान शामिल हुआ तो काफी मीडिया में छाया रहा। यह भारतीय वायुसेवा में शामिल पहला ड्रीमलाइनर विमान था। आज तक इनकी संख्या बढ़कर छह हो गई है जिसमें तीन विमान घरेलू और तीन अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए प्रयोग किए जा रहे है, उन्हें आज से सेवा में नहीं लिया जा रहा है। इसी तरह विश्व की अलग- अलग एयरलाइनों के अधीन उड़ने वाले 50 ड्रीमलाइनर विमानों को अंतर्राष्ट्रीय उड्डयन नियामक संस्था के आदेश पर भूमि पर उतार दिया गया है। यह सब कल (16 जनवरी) जापान की ऑल निप्पन एय़रलाइंस के ड्रीमलाइनर विमान में कॉकपिट में लगी बैट्री की खराबी के कारण औऱ धुंए के अलर्ट के संकेत आने पर उस विमान को मध्य रास्ते में एक एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिंग करवानी पड़ी। इसके साथ ही जापान की ऑल निप्पॉन एयरलाइंस और जापान एयरलाइंस ने अपने बेड़े के 24 ड्रीमलाइनर विमानों को ग्राउंड कर दिया। इसी प्रकार की कई गड़बड़ी के कारण अमेरिका ने पिछले सप्ताह और भारत ने भी दिसंबर माह में  विमान को एक दिन के परीक्षण के बाद फिर से सेवा में लगाया था। बोइंग की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत ड्रीमलाइनर विमानों का निर्माण तीव्र गति से किया जा रहा है जिस कारण से गुणवत्ता में कहीं ना कहीं कोई चूक रह जाती है। भारत ने ही अब तक 27 विमानों का ऑर्डर दे रखा था, जिसमें से 6 मिले। साथ ही बोइंग को इस सेगमेंट में एयरबस की ए-380 विमान से चुनौती मिल रही है। बोइंग को अगर बाजार में अपनी साख को बनाए रखना है और आगे जिन ड्रीमलाइनर विमानों की डिलेवरी करनी है, उसमें गुणवत्ता परीक्षण पर ध्यान दे और पुराने विमानों की खामियों को जल्द दूर करने का प्रयास करे नहीं तो नये साल में गलत कारणों से खबरों में रहना- उसके लिए ठीक नहीं है। (2221)

8 जनवरी, 2013

अपनी मातृभाषा अपनी होती है। हमारी सोच, हमारे बोलने और हमारे लिखने में सबसे अहम योगदान बचपन में बोली गई भाषा का होता है। अपने विचारों को व्यक्त करने में हम अपनी भाषा में ही अपने को आरामदायक महसूस करते है, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम किसी दूसरे भाषा को सीखे नहीं या उसकी आलोचना या भर्त्सना करे। लेकिन ऐसी भाषा जिससे हमारा जीवन भर वास्ता नहीं पड़ने वाला, उसे सीखकर क्या फायदा? फिर भी विज्ञान के इस युग में कंप्यूटर पर हम अलग-अलग सॉफ्टवेयर की मदद से किसी भी भाषा से किसी अन्य भाषा में अनुवाद आसानी से कर लेते है, लेकिन यह पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होती। इसी प्रकार, मोबाइल  पर आजकल ना जाने कितने एप्स यानि एप्पलिकेशन विकसित कर लिए गए है जिससे आप कोई अन्य भाषा को अनूदित कर अपनी भाषा में सुन सकते है लेकिन यह अभी सीमित तौर पर ही है। इसके अलावा दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट, गूगल के अलावा जापान की कंपनी डोकोमो और इसी तरह की अन्य कंपनियां स्पीच सॉफ्टवेयर पर काम कर रही है जिससे आप किसी गैर-भाषा के शब्दों को तत्क्षण अपनी भाषा में सुन व समझ पायेंगे। अभी यह कार्य चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है और हर नए अनुसंधान के साथ अशुद्धियां कम होती जा रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब हम किसी अन्य भाषा में बोले जा रहे किसी भी वक्तव्य को उसी वक्त अपनी भाषा में सुन-समझ सकेंगे। लेकिन ये मशीन भी कोई साधारण मशीन नहीं है, यह मशीन ठीक उसी प्रकार बनाई जा रही है जिस प्रकार हमारा मस्तिष्क और उसमें स्थित तंत्रिका की अलग सतहें काम करती हैं। हर एक सतह का अपना कार्य होता है। अभी जो मशीनें बन रही है वह नौ सतह युक्त है, जो ज्यादा से ज्यादा अशुद्धियों को कम करने का काम कर रही है। यह अविष्कार निश्चय ही हमारे लिए वरदान साबित होगा, लेकिन इससे उन अनुवादकों की रोजी-रोटी पर खतरा हो जाएगा, जो इससे अपना पेट पालते है। ( 2306)

6 जनवरी, 2013 (3)

रंगमंच की अपनी अनोखी दुनिया होती है। जीवन के कई रंगों को हम अपने सामने घटते देखते है तो सहसा यकीन नहीं होता। मौका था- भारतीय रंग महोत्सव के 15वें संस्करण के उद्घाटन समारोह का और उद्धाटन नाटक - आत्मकथा- के मंचन का। भारतीय रंग महोत्सव- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का वार्षिक कार्यक्रम हर साल नए रंग के साथ अवतरित होता है। देश के अलावा विदेशों से भी नाट्य-मंडली आकर अपना नाटक प्रस्तुत करती है। फिल्मकार श्याम बेनेगल ने उद्धाटन समारोह में विशिष्ट अतिथि की भूमिका निभाते हुए इसे समाज की जरूरत बताया। नाट्य विद्यालय से निकले कलाकारों ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई है। इसी पहचान को भुनाने का काम उद्याटन नाटक आत्मकथा में कुलभूषण खरबंदा (शान के शाकाल चरित्र को जीवंत बनाने वाले) के जरिए किया गया। दो घंटे की अवधि वाले इस नाटक में मानवीय संबंधों के ताने-बाने को बड़ी जीवंतता से प्रकट किया गया है। राजाध्यक्ष नामक महान लेखक का किरदार निभाने वाले कुलभूषण खरबंदा ने अन्य तीन कलाकारों अनुभा फतेहपुरिया, चेतना जालान, संचयिता भट्टाचार्य की मदद से निर्देशक विनय शर्मा के निर्देशन में जीवन चक्र में आने वाली उलझनों को बखूबी दर्शाया है। महेश इलकुंचवर ने नाटक में अपने कथानक से जान डालने का काम किया है। इंटरवल से पहले नाटक की गति थोड़ी धीमी भले ही थी लेकिन मध्यांतर बाद सभी पात्रों को अपने जीवन में झांकने, परत दर परत जीवन की गुत्थियों को समझने में- अपना जीवन एकाएक फ्लैशबैक के रूप में सामने आता है। आज के नाटक मंचन में विभिन्न उपकरणों के मदद से ऐसे दृश्य कायम किए जाते है कि दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है। रंगमंच पर पहले की तरह प्रस्तुति एकरेखीय ना होकर अनेक रेखाओं में चलने वाली है गई है ताकि दर्शक नाटक से आगे ना जा सके। जीवंतता इसका एक प्रखर आयाम है, वह अपने में ही रंगमंच  की दुनिया को जीवंत बनाए रखने में सक्षम है। ( 1924)

6 जनवरी, 2013 (2)

खाकी वर्दी, कंधे पर झोला लटकाए, साइकिल पर घर-घर जाकर चिठ्ठी देने वाले डाकिए- हमारे बचपन की यादों का एक अंग हुआ करता था। हमारे यहां तो लगभग हर दिन डाकिया डाक देने आता, यहां तक कि अगर सिर्फ नाम और शहर का नाम भी लिखा होता तो डाक हमारे यहां सही सलमात पहुंचती। दिल्ली जैसे बड़े शहर में आए बारह साल होने जा रहे है, कभी कभार डाकिए की जरूरत इस ई-मेल और कूरियर के जमाने में पड़ ही जाती है। प्रतिस्पर्द्धा के इस जमाने में जहां भारतीय डाक सेवा ने अपने को आधुनिक बनाने का भरसक प्रयास किया है, वहीं इसे अलग-अलग क्वार्टरों से कठिन चुनौती भी मिल रही है। कल ही कृष्णा नगर मुख्य डाकघर, नई दिल्ली 110 051 जाने का काम आ पड़ा। मेरा रिफंड चेक आने वाला है इसकी जानकारी नेट से मिली, लेकिन इंडिया पोस्ट की वेबसाइट पर मेरा स्पीड पोस्ट ट्रैक नहीं हो पा रहा था। सुबह नौ बजे कड़कड़ाती ठंड में कृष्णानगर डाक खाने पहुंचा। वहां अलग-अलग बीट के डाकियों का पहुंचना जारी था। चिठ्ठियों से भरे बड़े-बड़े बोरों को खोलकर उनकी डाक को छांटने का काम भी चल रहा था। स्पीड पोस्ट को नेट पर अपडेट करने का काम- यानि नई तकनीक के साथ कदमताल करने का काम भी चल रहा था, लेकिन मेरे बीट के डाक-बाबू आने में कुछ देर हो गए। गढ़वाली मोहल्ला 18 बीट नंबर था और ओम प्रकाश जी हमारे लक्षित डाकिए थे, उन्हें अपने डाक के बारे में इत्तला किया और उनका मोबाइल नंबर लिया ताकि मुझे डाक सही सलामत मिल सके। डिलेवरी सेंटर होने के कारण बड़ी संख्या में डाककर्मी पहुंच रहे थे और आने के साथ काम में लग जाना- उनके काम के बड़े और गंभीर होने का संकेत देता है। उसी गंभीरता से साइकिल पर छंटी डाकों को अपने झोले से निकालकर घरों तक पहुंचाना- वाकई एक  भारी काम है जिसे वे बिना चिंता के करते है। (1846)

6 जनवरी, 2013

दिल्ली ने 2013 का स्वागत कुछ बुझे मन से किया क्योंकि गत महीने में घटी सामूहिक दुष्कर्म की घटना की घटना से ना सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरा देश शर्मसार हुआ। कुछ घटनाएं अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ जाती है कि वे भुलाएं नहीं भूली जा सकती। ये घटना इतिहास में अमिट छाप छोड़ने की हिम्मत इसलिए रखती है क्योंकि इसने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया। अभी इस घटना के कारण जो भी परिवर्तन नजर आ रहा है जैसे कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना, महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध के खिलाफ सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास, लोगों के द्वारा सिस्टम को बदलने के लिए सरकार को मजबूर करना- ये सभी एक सुनहरे भविष्य की तस्वीर दिखाते है। ऐसे ही माहौल में जब हमने नये साल में कदम रखा तो हम एक नए समाज और एक नये देश की कल्पना भी कर सकते है, लेकिन ये बदलाव इतनी जल्दी परिलक्षित नहीं होंगे। इसमें सभी पक्षों की भूमिका काफी अहम् है। जन आंदोलन ने जहां एक तरफ सरकार को सड़े-गले सिस्टम को बदलने के लिए सोचने के लिए मजबूर किया है, वहीं मीडिया ने भी अपनी भूमिका निभाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या पूरे विश्व में परिवर्तन की एक अनोखी लहर लाने वाला सोशल मीडिया- सभी ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया ने जो लोगों के आक्रोश को व्यक्त करने का काम किया है, वह समय की मांग है। बाकी स्तंभों में न्यायपालिका भी मुस्तैदी दिखा रही है। बस कार्यपालिका और विधायिका कुछ ठोस कदम उठाए ताकि हम हर नए साल, साल का स्वागत गर्मजोशी से करे और ऐसे किसी घटना का गवाह ना बनना पड़े जिससे हमें शर्मसार होना पड़े।
( 1826)