आजकल ख़बर बनाने वाले ख़बर बन रहे है। चुनावी मौसम है, ऐसे में नेताओं के टीवी पर छाने की बात आम हुआ करती है, लेकिन अगर ख़बर बनाने वाले....... वो भी ऐसी-वैसी नहीं... बल्कि स्टिंग ऑपरेशन के जरिए भारतीय राजनीति में भूचाल लाने वाले और समय-समय पर अपनी खोजी पत्रकारिता के बल पर तहलका लाने वाले 'तहलका' समूह के निवर्तमान संपादक तरूण तेजपाल की बात हो, तो लाजिमी है कि चर्चा को खूब होगी। गोवा में पत्रिका के एक कार्यक्रम के दौरान एक महिला सहकर्मी द्वारा यौन उत्पीड़न के लगाए गए आरोपों से घिरे तरूण तेजपाल भले ही अच्छे लेखक, विचारक और समाचार जगत में क्रांति लाने वाले हो, लेकिन हाल के उनके कुकृत्य ने ये साबित कर दिया है कि आदमी की कुत्सित इच्छा उसका विनाश कर देती है। यौन प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे कृत्य किसी भी सभ्य समाज में क्षम्य नहीं हो सकते। अगर किसी व्यक्ति पर ऐसा आरोप आता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार तो तय है जैसा कि दिल्ली में 16 दिसंबर की बलात्कार घटना के आरोपियों के साथ हुआ था, साथ ही ये किसी निरक्षर या छोटे स्तर पर किए गए लोगों द्वारा हो या ऊपरलिखित किसी हाई-प्रोफाइल व्यक्ति द्वारा किया मामला हो, तब भी सामाजिक बहिष्कार के साथ-साथ उसे व उसके परिवार को काफी जलालत झेलनी पड़ती है, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि आज के दिन आरोपियों के डराने-धमकाने के बाद पीड़ित लोग भी मुखर रूप से अपनी बात रख रहे है। पीड़ित व्यक्ति के परिजनों द्वारा बदनामी के डर से इन बातों को दबाए जाने के कारण ऐसा कुकृत्य करने वालों का हौसला और बढ़ता है। इंसाफ की आस में सामने आने वाले पीड़ित लोगों की हमें कद्र करनी चाहिए, उन्हें समाज में समुचित सम्मान मिलना चाहिए ना कि आरोपियों को। ( 2336)
Wednesday, January 22, 2014
2 मार्च 2013
भारतीय गणराज्य के सालाना आय-व्यय का ब्यौरा यानि बजट को दो दिन पहले यानि 28 फरवरी को वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा में पेश किया। पिछले साल की तरह इस साल भी बजट क्वारनटाइन में बजट की कॉपी सवा आठ बजे तक हमें अग्रिम में मिल गई, लेकिन वैसा आउटपुट नहीं दे पाये जैसा देना चाहिए था। फिर भी काम की तारीफ हुई। बजट में इस बार अगले साल होने वाले आम चुनाव को देखते हुए किसी तरह के पॉपुलिस्ट बजट की यानि लोक-लुभावन वायदों की किसी झड़ी को लगाने से चिदंबरम ने साफ इंकार कर दिया। वित्तीय अनुशासन पर जोर देने की बात स्पष्ट रूप से दिखाई दी। भारत अभी विकास दर के उस स्तर को हासिल करने की सोच रहा है जो कि अभी दिवा-स्वप्न की भांति है। 5 प्रतिशत के आंकड़े के इर्द-गिर्द घूमता विकास-दर, राजस्व घाटे को कुल सकल घरेलू उत्पाद का 4.8 प्रतिशत तक लाने का बजट अनुमान- ये सब एक तरीके से किसी नट की तरह रस्सी पर चलने का काम करने के समान है। इसमें वित्त मंत्री ने काफी समझदारी दिखाई। सब्सिडी बिल को कम करना- भले ही महंगाई के रूप में आम जनता के सामने आ रहा है, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। विश्व की बड़ी- बड़ी रेटिंग एजेंसियों ने भारत का आर्थिक परिदृश्य को जस-का-तस रखा है, इसे जंक स्टेट के दर्जे में नहीं डाला। इससे जहां निवेशकों को उत्साह बढ़ेगा, वहीं रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स वाले मामले में स्पष्टता का अभाव विदेशी निवेशकों को कहीं-ना-कहीं निवेश करने से रोकेगा। अभी की स्थिति में वित्त मंत्री ने जो बजट पेश किया है, वह वाकई एक अच्छा बजट है। इससे पहले भी रेल बजट में आम जनता को किराया ना बढ़ाने का एक छद्म राहत दी गई। छद्म तरीके से अन्य भाड़े बढ़ाए गए, जिसका बाद में पता चलेगा। आम बजट कमरतोड़ महंगाई को लाने में सहयोगी होगा, लेकिन अभी की यह जरूरत भी है। (2221)
12 फरवरी, 2013
आस्था के पर्व महाकुंभ के अवसर पर स्नान के लिए तीन करोड़ लोग मौनी अमावस्या के अवसर पर एकत्रित हुए। एक शहर में इतने लोगों का एक साथ आना और वहां से वापस लौटना- निश्चय ही एक बड़े प्रबंधन की जरूरत है। लेकिन सरकारें हमेशा पुराने मापदंडों पर नई प्रबंधन योजना आनन-फानन में बनाती है, जिसका नतीजा बदइंतजामी के रूप में सामने आता है और कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। रविवार को हुई घटना में 36 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। केंद्र व राज्य सरकारें एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ रही है। घटना रेलवे स्टेशन की है जहां पर फुटब्रिज की रेलिंग टूटने की घटना भगदड़ के रूप में तब्दील हुई और यह दर्दनाक हादसा हुआ। आस्था के पीछे लोग सब कुछ भूल-भालकर किसी भी स्थिति में रहते हुए स्नान करना हो, पूजा-अर्चना करना हो, पत्थर मारना हो या इस तरह के अन्य कार्य करना हो- इसके लिए जुट तो जाते है लेकिन अनुशासन की कमी के चलते कई बार इतनी बड़ी दर्दनाक घटनाओं के शिकार बन जाते है। अभी हाल हीं में बिहार के लोकपर्व छठ के अवसर पर पोंटून पुल/चचरी पुल (तात्कालिक व्यवस्था) के चलते दर्जन भर लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके लिए लोग तो जिम्मेदार है ही, सरकारें व प्रशासन भी पूरी तरह जिम्मेवार है। इलाहाबाद की बात करे, तो रेलवे को नहीं चाहिए कि वह स्टेशन पर स्थित फुट ओवर ब्रिज या ऐसी ही अन्य सुविधाओं की समय-समय पर जांच कराकर उसे अपग्रेड भी करवाते रहे। इसके लिए रेलवे पैसा का रोना रोएगी, तो इसके लिए पिछले रेल मंत्रीव उनके लोक लुभावन बजट जिम्मेदार है। किराया का एक दशक से ना बढ़ना, रेल में कई आधुनिक तकनीक के ना आने का रोड़ा बन अटका पड़ा है। साथ ही, मेला व कुंभ प्रशासन को भी बाहर से आने वाले लोगों की एंट्री प्वाइंट से एक्जिट प्वाइंट सभी को ध्यान में रखकर व्यवस्था करनी चाहिए ना कि सिर्फ मेला स्थल पर। इसमें सरकार के साथ-साथ जनता को भी अपना सहयोग देना होगा। (1326)
5 फरवरी, 2013
बाहर बारिश हो रही है। मौसम में ये तब्दीली पिछले दो दिनों से है। आज सुबह के समय अभी आसमान में घने काले बादल छाये हुए है। बारिश लगता है आज थमेगी नहीं। कल ही कवरेज टीम के साथ भारतीय मौसम विभाग जाना हुआ। लोदी रोड स्थित मौसम विभाग के भवन में आँख-मिचौली करते, कभी खुशगवार, कभी थोड़ा दिक्कत देने वाला मौसम क्यूं हो रहा है- इसका कारण जानने पहुंचे। मुख्य बिल्डिंग में पूरे देश के मौसम का पूर्वानुमान किया जाता है, वहीं रिजनल मेट्रोलॉजिकल सेंटर में उत्तर-पूर्व भारत के राज्यों का पूर्वानुमान किया जाता है। अभी हाल के मौसम में बदलाव पश्चिम विक्षोभ के कारण हुआ है। कैस्पियन सागर, भू-मध्यसागर, अरब सागर के ऊपर कई बदलाव का असर अब जाकर हमें देखने को मिल रहा है। टेलीविजन चैनल के लिए बाइट देने से पहले दो अधिकारियों बिशन सिंह और एम. दुरईस्वामी सर ने दस-पंद्रह मिनट तक तीन सिस्टम पर तरह-तरह के भारतीय मानचित्र के ग्राफिक्स पर तरह-तरह के चिह्न, रेखाएं इत्यादि को देखकर मौसम का अध्ययन किया, फिर एएनआई और हमारे चैनल को साथ में बाइट दिया। एएनआई वालों ने तो उसका सीधा प्रसारण कर डाला एक 3-जी डिब्बे की मदद से। तकनीक के बारे में सुन रखा था लेकिन देखने का मौका पहली बार मिला। काफी अच्छा अनुभव रहा। यह मेरे पैकेजिंग की ड्यूटी के बीच में करना पड़ा। वैसे मौसम विभाग जाने का उद्देश्य दूसरा भी था। लेकिन उससे संबंधित काम ना हो सका। मौसम विभाग में उपयोग में लाया जाने वाला सिस्टम 206 करोड़ का था, जिसे फ्रांस से मंगाया गया था, लेकिन सरकारी सिस्टम की मार झेलने का दर्द यहां के अधिकारी ने बताया। सरकारी महकमें में फाइल चलने की गति के कारण जिस सिस्टम को लाने की बात होती है, उसके आने तक वह आउटडेटेड और आधी कीमत का हो जाता है। नया सिस्टम उससे ज्यादा उपयोगी होता है और इस तरह हम नए सिस्टम का फायदा उठा नहीं पाते। (0810)
2 फरवरी, 2013
भारत के संविधान ने अपने नागरिकों को संविधान की धारा 19 के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। साथ ही धारा 19(1) के तहत कुछ एेसे कारणात्मक प्रतिबंध लगाए है जिससे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगता है। अभी हाल के दो उदाहरणों का जिक्र करना चाहूंगा- सबसे हालिया जयपुर साहित्य उत्सव में समाजशास्त्री आशीष नंदी ने एक चर्चा के दौरान अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति को सबसे भ्रष्ट करार दिया, यह भले ही चर्चा के परिप्रेक्ष्य में कही गई थी। ऐसा कहने से पहले नंदी ने स्पष्ट कहा था कि मेरे द्वारा दिया जा रहा कथन वल्गर होगा, फिर भी उन्होंने ये बात कही। मीडिया ने इस हिस्से को पकड़कर तूल दे दिया और नंदी साहब को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा, जहां उन्हें मुख्य न्यायधीश की भी फटकार सुननी पड़ी। अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में दायर एफआईआर को भी रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद ली। आशीष नंदी एक विद्वान प्रोफेसर के रूप में जाने जाते है, तो उन्हें इन सब चीजों से गुजरना पड़ा, उन्होंने समाज के एख तबके को सिर्फ भ्रष्ट बताया था, जबकि वहीं दूसरी तरफ राजनीतिज्ञ के तौर पर हैदराबाद के एक विधायक अकबरूद्दीन ओवैसी ने एक जलसे में गैर-धर्म के बारे में अनाप-शनाप कहा,तो शुरूआत में तो यह मुद्दा मीडिया में आया हीं नहीं, बाद में सोशल मीडिया पर चल रहे एक्टिविज्म के कारण कुछ दिनों के लिए मीडिया में आया। मामला एक बार फिर से दब गया। पहले तो खबर बनी ही नहीं, फिर बनी तो इसे राजनीतिक रोटी सेेंकने वाली बात कहकर महत्त्व नहीं दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भ्रष्ट को भ्रष्ट बताना- गलत हो सकता है तो किसी धर्म के प्रति अनर्गल बोलना उससे भी ज्यादा गलत है ऐसे दोहरे मापदंड अपने यहां चलते रहते है। इसकी पूरी स्वतंत्रता है। (2322)
17 जनवरी, 2013
नए साल में भी खबरों का उसी तरह आना जारी है। पिछले सितंबर माह में एयर इंडिया के बेड़े में ड्रीमलाइनर विमान शामिल हुआ तो काफी मीडिया में छाया रहा। यह भारतीय वायुसेवा में शामिल पहला ड्रीमलाइनर विमान था। आज तक इनकी संख्या बढ़कर छह हो गई है जिसमें तीन विमान घरेलू और तीन अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए प्रयोग किए जा रहे है, उन्हें आज से सेवा में नहीं लिया जा रहा है। इसी तरह विश्व की अलग- अलग एयरलाइनों के अधीन उड़ने वाले 50 ड्रीमलाइनर विमानों को अंतर्राष्ट्रीय उड्डयन नियामक संस्था के आदेश पर भूमि पर उतार दिया गया है। यह सब कल (16 जनवरी) जापान की ऑल निप्पन एय़रलाइंस के ड्रीमलाइनर विमान में कॉकपिट में लगी बैट्री की खराबी के कारण औऱ धुंए के अलर्ट के संकेत आने पर उस विमान को मध्य रास्ते में एक एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिंग करवानी पड़ी। इसके साथ ही जापान की ऑल निप्पॉन एयरलाइंस और जापान एयरलाइंस ने अपने बेड़े के 24 ड्रीमलाइनर विमानों को ग्राउंड कर दिया। इसी प्रकार की कई गड़बड़ी के कारण अमेरिका ने पिछले सप्ताह और भारत ने भी दिसंबर माह में विमान को एक दिन के परीक्षण के बाद फिर से सेवा में लगाया था। बोइंग की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत ड्रीमलाइनर विमानों का निर्माण तीव्र गति से किया जा रहा है जिस कारण से गुणवत्ता में कहीं ना कहीं कोई चूक रह जाती है। भारत ने ही अब तक 27 विमानों का ऑर्डर दे रखा था, जिसमें से 6 मिले। साथ ही बोइंग को इस सेगमेंट में एयरबस की ए-380 विमान से चुनौती मिल रही है। बोइंग को अगर बाजार में अपनी साख को बनाए रखना है और आगे जिन ड्रीमलाइनर विमानों की डिलेवरी करनी है, उसमें गुणवत्ता परीक्षण पर ध्यान दे और पुराने विमानों की खामियों को जल्द दूर करने का प्रयास करे नहीं तो नये साल में गलत कारणों से खबरों में रहना- उसके लिए ठीक नहीं है। (2221)
8 जनवरी, 2013
अपनी मातृभाषा अपनी होती है। हमारी सोच, हमारे बोलने और हमारे लिखने में सबसे अहम योगदान बचपन में बोली गई भाषा का होता है। अपने विचारों को व्यक्त करने में हम अपनी भाषा में ही अपने को आरामदायक महसूस करते है, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम किसी दूसरे भाषा को सीखे नहीं या उसकी आलोचना या भर्त्सना करे। लेकिन ऐसी भाषा जिससे हमारा जीवन भर वास्ता नहीं पड़ने वाला, उसे सीखकर क्या फायदा? फिर भी विज्ञान के इस युग में कंप्यूटर पर हम अलग-अलग सॉफ्टवेयर की मदद से किसी भी भाषा से किसी अन्य भाषा में अनुवाद आसानी से कर लेते है, लेकिन यह पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होती। इसी प्रकार, मोबाइल पर आजकल ना जाने कितने एप्स यानि एप्पलिकेशन विकसित कर लिए गए है जिससे आप कोई अन्य भाषा को अनूदित कर अपनी भाषा में सुन सकते है लेकिन यह अभी सीमित तौर पर ही है। इसके अलावा दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट, गूगल के अलावा जापान की कंपनी डोकोमो और इसी तरह की अन्य कंपनियां स्पीच सॉफ्टवेयर पर काम कर रही है जिससे आप किसी गैर-भाषा के शब्दों को तत्क्षण अपनी भाषा में सुन व समझ पायेंगे। अभी यह कार्य चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है और हर नए अनुसंधान के साथ अशुद्धियां कम होती जा रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब हम किसी अन्य भाषा में बोले जा रहे किसी भी वक्तव्य को उसी वक्त अपनी भाषा में सुन-समझ सकेंगे। लेकिन ये मशीन भी कोई साधारण मशीन नहीं है, यह मशीन ठीक उसी प्रकार बनाई जा रही है जिस प्रकार हमारा मस्तिष्क और उसमें स्थित तंत्रिका की अलग सतहें काम करती हैं। हर एक सतह का अपना कार्य होता है। अभी जो मशीनें बन रही है वह नौ सतह युक्त है, जो ज्यादा से ज्यादा अशुद्धियों को कम करने का काम कर रही है। यह अविष्कार निश्चय ही हमारे लिए वरदान साबित होगा, लेकिन इससे उन अनुवादकों की रोजी-रोटी पर खतरा हो जाएगा, जो इससे अपना पेट पालते है। ( 2306)
6 जनवरी, 2013 (3)
रंगमंच की अपनी अनोखी दुनिया होती है। जीवन के कई रंगों को हम अपने सामने घटते देखते है तो सहसा यकीन नहीं होता। मौका था- भारतीय रंग महोत्सव के 15वें संस्करण के उद्घाटन समारोह का और उद्धाटन नाटक - आत्मकथा- के मंचन का। भारतीय रंग महोत्सव- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का वार्षिक कार्यक्रम हर साल नए रंग के साथ अवतरित होता है। देश के अलावा विदेशों से भी नाट्य-मंडली आकर अपना नाटक प्रस्तुत करती है। फिल्मकार श्याम बेनेगल ने उद्धाटन समारोह में विशिष्ट अतिथि की भूमिका निभाते हुए इसे समाज की जरूरत बताया। नाट्य विद्यालय से निकले कलाकारों ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई है। इसी पहचान को भुनाने का काम उद्याटन नाटक आत्मकथा में कुलभूषण खरबंदा (शान के शाकाल चरित्र को जीवंत बनाने वाले) के जरिए किया गया। दो घंटे की अवधि वाले इस नाटक में मानवीय संबंधों के ताने-बाने को बड़ी जीवंतता से प्रकट किया गया है। राजाध्यक्ष नामक महान लेखक का किरदार निभाने वाले कुलभूषण खरबंदा ने अन्य तीन कलाकारों अनुभा फतेहपुरिया, चेतना जालान, संचयिता भट्टाचार्य की मदद से निर्देशक विनय शर्मा के निर्देशन में जीवन चक्र में आने वाली उलझनों को बखूबी दर्शाया है। महेश इलकुंचवर ने नाटक में अपने कथानक से जान डालने का काम किया है। इंटरवल से पहले नाटक की गति थोड़ी धीमी भले ही थी लेकिन मध्यांतर बाद सभी पात्रों को अपने जीवन में झांकने, परत दर परत जीवन की गुत्थियों को समझने में- अपना जीवन एकाएक फ्लैशबैक के रूप में सामने आता है। आज के नाटक मंचन में विभिन्न उपकरणों के मदद से ऐसे दृश्य कायम किए जाते है कि दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है। रंगमंच पर पहले की तरह प्रस्तुति एकरेखीय ना होकर अनेक रेखाओं में चलने वाली है गई है ताकि दर्शक नाटक से आगे ना जा सके। जीवंतता इसका एक प्रखर आयाम है, वह अपने में ही रंगमंच की दुनिया को जीवंत बनाए रखने में सक्षम है। ( 1924)
6 जनवरी, 2013 (2)
खाकी वर्दी, कंधे पर झोला लटकाए, साइकिल पर घर-घर जाकर चिठ्ठी देने वाले डाकिए- हमारे बचपन की यादों का एक अंग हुआ करता था। हमारे यहां तो लगभग हर दिन डाकिया डाक देने आता, यहां तक कि अगर सिर्फ नाम और शहर का नाम भी लिखा होता तो डाक हमारे यहां सही सलमात पहुंचती। दिल्ली जैसे बड़े शहर में आए बारह साल होने जा रहे है, कभी कभार डाकिए की जरूरत इस ई-मेल और कूरियर के जमाने में पड़ ही जाती है। प्रतिस्पर्द्धा के इस जमाने में जहां भारतीय डाक सेवा ने अपने को आधुनिक बनाने का भरसक प्रयास किया है, वहीं इसे अलग-अलग क्वार्टरों से कठिन चुनौती भी मिल रही है। कल ही कृष्णा नगर मुख्य डाकघर, नई दिल्ली 110 051 जाने का काम आ पड़ा। मेरा रिफंड चेक आने वाला है इसकी जानकारी नेट से मिली, लेकिन इंडिया पोस्ट की वेबसाइट पर मेरा स्पीड पोस्ट ट्रैक नहीं हो पा रहा था। सुबह नौ बजे कड़कड़ाती ठंड में कृष्णानगर डाक खाने पहुंचा। वहां अलग-अलग बीट के डाकियों का पहुंचना जारी था। चिठ्ठियों से भरे बड़े-बड़े बोरों को खोलकर उनकी डाक को छांटने का काम भी चल रहा था। स्पीड पोस्ट को नेट पर अपडेट करने का काम- यानि नई तकनीक के साथ कदमताल करने का काम भी चल रहा था, लेकिन मेरे बीट के डाक-बाबू आने में कुछ देर हो गए। गढ़वाली मोहल्ला 18 बीट नंबर था और ओम प्रकाश जी हमारे लक्षित डाकिए थे, उन्हें अपने डाक के बारे में इत्तला किया और उनका मोबाइल नंबर लिया ताकि मुझे डाक सही सलामत मिल सके। डिलेवरी सेंटर होने के कारण बड़ी संख्या में डाककर्मी पहुंच रहे थे और आने के साथ काम में लग जाना- उनके काम के बड़े और गंभीर होने का संकेत देता है। उसी गंभीरता से साइकिल पर छंटी डाकों को अपने झोले से निकालकर घरों तक पहुंचाना- वाकई एक भारी काम है जिसे वे बिना चिंता के करते है। (1846)
6 जनवरी, 2013
दिल्ली ने 2013 का स्वागत कुछ बुझे मन से
किया क्योंकि गत महीने में घटी सामूहिक दुष्कर्म की घटना की घटना से ना
सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरा देश शर्मसार हुआ। कुछ घटनाएं अपनी ऐसी अमिट छाप
छोड़ जाती है कि वे भुलाएं नहीं भूली जा सकती। ये घटना इतिहास में अमिट छाप
छोड़ने की हिम्मत इसलिए रखती है क्योंकि इसने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया।
अभी इस घटना के कारण जो भी परिवर्तन नजर आ रहा है जैसे कि फास्ट ट्रैक
कोर्ट की स्थापना, महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध के खिलाफ सरकार द्वारा
किये जा रहे प्रयास, लोगों के द्वारा सिस्टम को बदलने के लिए सरकार को
मजबूर करना- ये सभी एक सुनहरे भविष्य की तस्वीर दिखाते है। ऐसे ही माहौल
में जब हमने नये साल में कदम रखा तो हम एक नए समाज और एक नये देश की कल्पना
भी कर सकते है, लेकिन ये बदलाव इतनी जल्दी परिलक्षित नहीं होंगे। इसमें
सभी पक्षों की भूमिका काफी अहम् है। जन आंदोलन ने जहां एक तरफ सरकार को
सड़े-गले सिस्टम को बदलने के लिए सोचने के लिए मजबूर किया है, वहीं मीडिया
ने भी अपनी भूमिका निभाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। प्रिंट मीडिया हो या
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या पूरे विश्व में परिवर्तन की एक अनोखी लहर लाने
वाला सोशल मीडिया- सभी ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। लोकतंत्र के चौथे
स्तंभ के रूप में मीडिया ने जो लोगों के आक्रोश को व्यक्त करने का काम किया
है, वह समय की मांग है। बाकी स्तंभों में न्यायपालिका भी मुस्तैदी दिखा
रही है। बस कार्यपालिका और विधायिका कुछ ठोस कदम उठाए ताकि हम हर नए साल,
साल का स्वागत गर्मजोशी से करे और ऐसे किसी घटना का गवाह ना बनना पड़े
जिससे हमें शर्मसार होना पड़े।
( 1826)
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