Wednesday, January 22, 2014

12 फरवरी, 2013

आस्था के पर्व महाकुंभ के अवसर पर स्नान के लिए तीन करोड़ लोग मौनी अमावस्या के अवसर पर एकत्रित हुए। एक शहर में इतने लोगों का एक साथ आना और वहां से वापस लौटना- निश्चय ही एक बड़े प्रबंधन की जरूरत है। लेकिन सरकारें हमेशा पुराने मापदंडों पर नई प्रबंधन योजना आनन-फानन में बनाती है, जिसका नतीजा बदइंतजामी के रूप में सामने आता है और कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। रविवार को हुई घटना में 36 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। केंद्र व राज्य सरकारें एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ रही है। घटना रेलवे स्टेशन की है जहां पर फुटब्रिज की रेलिंग टूटने की घटना भगदड़ के रूप में तब्दील हुई और यह दर्दनाक हादसा हुआ। आस्था के पीछे लोग सब कुछ भूल-भालकर किसी भी स्थिति में रहते हुए स्नान करना हो, पूजा-अर्चना करना हो, पत्थर मारना हो या इस तरह के अन्य कार्य करना हो- इसके लिए जुट तो जाते है लेकिन अनुशासन की कमी के चलते कई बार इतनी बड़ी दर्दनाक घटनाओं के शिकार बन जाते है। अभी हाल हीं में बिहार के लोकपर्व छठ के अवसर पर पोंटून पुल/चचरी पुल (तात्कालिक व्यवस्था) के चलते दर्जन भर लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके लिए लोग तो जिम्मेदार है ही, सरकारें व प्रशासन भी पूरी तरह जिम्मेवार है। इलाहाबाद की बात करे, तो रेलवे को नहीं चाहिए कि वह स्टेशन पर स्थित फुट ओवर ब्रिज या ऐसी ही अन्य सुविधाओं की समय-समय पर जांच कराकर उसे अपग्रेड भी करवाते रहे। इसके लिए रेलवे पैसा का रोना रोएगी, तो इसके लिए पिछले रेल मंत्रीव उनके लोक लुभावन बजट जिम्मेदार है। किराया का एक दशक से ना बढ़ना, रेल में कई आधुनिक तकनीक के ना आने का रोड़ा बन अटका पड़ा है। साथ ही, मेला व कुंभ प्रशासन को भी बाहर से आने वाले लोगों की एंट्री प्वाइंट से एक्जिट प्वाइंट सभी को ध्यान में रखकर व्यवस्था करनी चाहिए ना कि सिर्फ मेला स्थल पर। इसमें सरकार के साथ-साथ जनता को भी अपना सहयोग देना होगा। (1326)

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