भारत के संविधान ने अपने नागरिकों को संविधान की धारा 19 के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। साथ ही धारा 19(1) के तहत कुछ एेसे कारणात्मक प्रतिबंध लगाए है जिससे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगता है। अभी हाल के दो उदाहरणों का जिक्र करना चाहूंगा- सबसे हालिया जयपुर साहित्य उत्सव में समाजशास्त्री आशीष नंदी ने एक चर्चा के दौरान अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति को सबसे भ्रष्ट करार दिया, यह भले ही चर्चा के परिप्रेक्ष्य में कही गई थी। ऐसा कहने से पहले नंदी ने स्पष्ट कहा था कि मेरे द्वारा दिया जा रहा कथन वल्गर होगा, फिर भी उन्होंने ये बात कही। मीडिया ने इस हिस्से को पकड़कर तूल दे दिया और नंदी साहब को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा, जहां उन्हें मुख्य न्यायधीश की भी फटकार सुननी पड़ी। अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में दायर एफआईआर को भी रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद ली। आशीष नंदी एक विद्वान प्रोफेसर के रूप में जाने जाते है, तो उन्हें इन सब चीजों से गुजरना पड़ा, उन्होंने समाज के एख तबके को सिर्फ भ्रष्ट बताया था, जबकि वहीं दूसरी तरफ राजनीतिज्ञ के तौर पर हैदराबाद के एक विधायक अकबरूद्दीन ओवैसी ने एक जलसे में गैर-धर्म के बारे में अनाप-शनाप कहा,तो शुरूआत में तो यह मुद्दा मीडिया में आया हीं नहीं, बाद में सोशल मीडिया पर चल रहे एक्टिविज्म के कारण कुछ दिनों के लिए मीडिया में आया। मामला एक बार फिर से दब गया। पहले तो खबर बनी ही नहीं, फिर बनी तो इसे राजनीतिक रोटी सेेंकने वाली बात कहकर महत्त्व नहीं दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भ्रष्ट को भ्रष्ट बताना- गलत हो सकता है तो किसी धर्म के प्रति अनर्गल बोलना उससे भी ज्यादा गलत है ऐसे दोहरे मापदंड अपने यहां चलते रहते है। इसकी पूरी स्वतंत्रता है। (2322)
Wednesday, January 22, 2014
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