खाकी वर्दी, कंधे पर झोला लटकाए, साइकिल पर घर-घर जाकर चिठ्ठी देने वाले डाकिए- हमारे बचपन की यादों का एक अंग हुआ करता था। हमारे यहां तो लगभग हर दिन डाकिया डाक देने आता, यहां तक कि अगर सिर्फ नाम और शहर का नाम भी लिखा होता तो डाक हमारे यहां सही सलमात पहुंचती। दिल्ली जैसे बड़े शहर में आए बारह साल होने जा रहे है, कभी कभार डाकिए की जरूरत इस ई-मेल और कूरियर के जमाने में पड़ ही जाती है। प्रतिस्पर्द्धा के इस जमाने में जहां भारतीय डाक सेवा ने अपने को आधुनिक बनाने का भरसक प्रयास किया है, वहीं इसे अलग-अलग क्वार्टरों से कठिन चुनौती भी मिल रही है। कल ही कृष्णा नगर मुख्य डाकघर, नई दिल्ली 110 051 जाने का काम आ पड़ा। मेरा रिफंड चेक आने वाला है इसकी जानकारी नेट से मिली, लेकिन इंडिया पोस्ट की वेबसाइट पर मेरा स्पीड पोस्ट ट्रैक नहीं हो पा रहा था। सुबह नौ बजे कड़कड़ाती ठंड में कृष्णानगर डाक खाने पहुंचा। वहां अलग-अलग बीट के डाकियों का पहुंचना जारी था। चिठ्ठियों से भरे बड़े-बड़े बोरों को खोलकर उनकी डाक को छांटने का काम भी चल रहा था। स्पीड पोस्ट को नेट पर अपडेट करने का काम- यानि नई तकनीक के साथ कदमताल करने का काम भी चल रहा था, लेकिन मेरे बीट के डाक-बाबू आने में कुछ देर हो गए। गढ़वाली मोहल्ला 18 बीट नंबर था और ओम प्रकाश जी हमारे लक्षित डाकिए थे, उन्हें अपने डाक के बारे में इत्तला किया और उनका मोबाइल नंबर लिया ताकि मुझे डाक सही सलामत मिल सके। डिलेवरी सेंटर होने के कारण बड़ी संख्या में डाककर्मी पहुंच रहे थे और आने के साथ काम में लग जाना- उनके काम के बड़े और गंभीर होने का संकेत देता है। उसी गंभीरता से साइकिल पर छंटी डाकों को अपने झोले से निकालकर घरों तक पहुंचाना- वाकई एक भारी काम है जिसे वे बिना चिंता के करते है। (1846)
Wednesday, January 22, 2014
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