रंगमंच की अपनी अनोखी दुनिया होती है। जीवन के कई रंगों को हम अपने सामने घटते देखते है तो सहसा यकीन नहीं होता। मौका था- भारतीय रंग महोत्सव के 15वें संस्करण के उद्घाटन समारोह का और उद्धाटन नाटक - आत्मकथा- के मंचन का। भारतीय रंग महोत्सव- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का वार्षिक कार्यक्रम हर साल नए रंग के साथ अवतरित होता है। देश के अलावा विदेशों से भी नाट्य-मंडली आकर अपना नाटक प्रस्तुत करती है। फिल्मकार श्याम बेनेगल ने उद्धाटन समारोह में विशिष्ट अतिथि की भूमिका निभाते हुए इसे समाज की जरूरत बताया। नाट्य विद्यालय से निकले कलाकारों ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई है। इसी पहचान को भुनाने का काम उद्याटन नाटक आत्मकथा में कुलभूषण खरबंदा (शान के शाकाल चरित्र को जीवंत बनाने वाले) के जरिए किया गया। दो घंटे की अवधि वाले इस नाटक में मानवीय संबंधों के ताने-बाने को बड़ी जीवंतता से प्रकट किया गया है। राजाध्यक्ष नामक महान लेखक का किरदार निभाने वाले कुलभूषण खरबंदा ने अन्य तीन कलाकारों अनुभा फतेहपुरिया, चेतना जालान, संचयिता भट्टाचार्य की मदद से निर्देशक विनय शर्मा के निर्देशन में जीवन चक्र में आने वाली उलझनों को बखूबी दर्शाया है। महेश इलकुंचवर ने नाटक में अपने कथानक से जान डालने का काम किया है। इंटरवल से पहले नाटक की गति थोड़ी धीमी भले ही थी लेकिन मध्यांतर बाद सभी पात्रों को अपने जीवन में झांकने, परत दर परत जीवन की गुत्थियों को समझने में- अपना जीवन एकाएक फ्लैशबैक के रूप में सामने आता है। आज के नाटक मंचन में विभिन्न उपकरणों के मदद से ऐसे दृश्य कायम किए जाते है कि दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है। रंगमंच पर पहले की तरह प्रस्तुति एकरेखीय ना होकर अनेक रेखाओं में चलने वाली है गई है ताकि दर्शक नाटक से आगे ना जा सके। जीवंतता इसका एक प्रखर आयाम है, वह अपने में ही रंगमंच की दुनिया को जीवंत बनाए रखने में सक्षम है। ( 1924)
Wednesday, January 22, 2014
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment