Wednesday, January 22, 2014

6 जनवरी, 2013

दिल्ली ने 2013 का स्वागत कुछ बुझे मन से किया क्योंकि गत महीने में घटी सामूहिक दुष्कर्म की घटना की घटना से ना सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरा देश शर्मसार हुआ। कुछ घटनाएं अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ जाती है कि वे भुलाएं नहीं भूली जा सकती। ये घटना इतिहास में अमिट छाप छोड़ने की हिम्मत इसलिए रखती है क्योंकि इसने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया। अभी इस घटना के कारण जो भी परिवर्तन नजर आ रहा है जैसे कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना, महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध के खिलाफ सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास, लोगों के द्वारा सिस्टम को बदलने के लिए सरकार को मजबूर करना- ये सभी एक सुनहरे भविष्य की तस्वीर दिखाते है। ऐसे ही माहौल में जब हमने नये साल में कदम रखा तो हम एक नए समाज और एक नये देश की कल्पना भी कर सकते है, लेकिन ये बदलाव इतनी जल्दी परिलक्षित नहीं होंगे। इसमें सभी पक्षों की भूमिका काफी अहम् है। जन आंदोलन ने जहां एक तरफ सरकार को सड़े-गले सिस्टम को बदलने के लिए सोचने के लिए मजबूर किया है, वहीं मीडिया ने भी अपनी भूमिका निभाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या पूरे विश्व में परिवर्तन की एक अनोखी लहर लाने वाला सोशल मीडिया- सभी ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया ने जो लोगों के आक्रोश को व्यक्त करने का काम किया है, वह समय की मांग है। बाकी स्तंभों में न्यायपालिका भी मुस्तैदी दिखा रही है। बस कार्यपालिका और विधायिका कुछ ठोस कदम उठाए ताकि हम हर नए साल, साल का स्वागत गर्मजोशी से करे और ऐसे किसी घटना का गवाह ना बनना पड़े जिससे हमें शर्मसार होना पड़े।
( 1826) 

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