अपनी मातृभाषा अपनी होती है। हमारी सोच, हमारे बोलने और हमारे लिखने में सबसे अहम योगदान बचपन में बोली गई भाषा का होता है। अपने विचारों को व्यक्त करने में हम अपनी भाषा में ही अपने को आरामदायक महसूस करते है, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम किसी दूसरे भाषा को सीखे नहीं या उसकी आलोचना या भर्त्सना करे। लेकिन ऐसी भाषा जिससे हमारा जीवन भर वास्ता नहीं पड़ने वाला, उसे सीखकर क्या फायदा? फिर भी विज्ञान के इस युग में कंप्यूटर पर हम अलग-अलग सॉफ्टवेयर की मदद से किसी भी भाषा से किसी अन्य भाषा में अनुवाद आसानी से कर लेते है, लेकिन यह पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होती। इसी प्रकार, मोबाइल पर आजकल ना जाने कितने एप्स यानि एप्पलिकेशन विकसित कर लिए गए है जिससे आप कोई अन्य भाषा को अनूदित कर अपनी भाषा में सुन सकते है लेकिन यह अभी सीमित तौर पर ही है। इसके अलावा दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट, गूगल के अलावा जापान की कंपनी डोकोमो और इसी तरह की अन्य कंपनियां स्पीच सॉफ्टवेयर पर काम कर रही है जिससे आप किसी गैर-भाषा के शब्दों को तत्क्षण अपनी भाषा में सुन व समझ पायेंगे। अभी यह कार्य चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है और हर नए अनुसंधान के साथ अशुद्धियां कम होती जा रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब हम किसी अन्य भाषा में बोले जा रहे किसी भी वक्तव्य को उसी वक्त अपनी भाषा में सुन-समझ सकेंगे। लेकिन ये मशीन भी कोई साधारण मशीन नहीं है, यह मशीन ठीक उसी प्रकार बनाई जा रही है जिस प्रकार हमारा मस्तिष्क और उसमें स्थित तंत्रिका की अलग सतहें काम करती हैं। हर एक सतह का अपना कार्य होता है। अभी जो मशीनें बन रही है वह नौ सतह युक्त है, जो ज्यादा से ज्यादा अशुद्धियों को कम करने का काम कर रही है। यह अविष्कार निश्चय ही हमारे लिए वरदान साबित होगा, लेकिन इससे उन अनुवादकों की रोजी-रोटी पर खतरा हो जाएगा, जो इससे अपना पेट पालते है। ( 2306)
Wednesday, January 22, 2014
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