दुनिया मेरे आगे...
अभी रोज रात 9 बजे खाना खाने के लिए आंटी के यहां जाता हूं। रास्ते में गली नंबर 4
( ललिता पार्क) में एक चार मंजिला इमारत बन रही है। उसके भू-तल पर एक मजदूर महिला
इस वक्त रोज मोबाइल को सीखने की कोशिश करती रहती है। कल के दिन तो कुछ मजदूर भी
थे.. जो कि उसे मोबाइल चलाना सीखा रहे थे। आज वो महिला, शायद अनपढ़ है.. मोबाइल की
स्क्रीन को घूरे जा रही थी। मोबाइल का टॉर्च ऊपर की तरफ ऑन था। पास में उसका एक
बच्चा खेल रहा था। आज के जमाने में तकनीक तो पूरे देश तेजी से पैर पसार रही है,
लेकिन साक्षरता की कमी से निरक्षर या कम-पढ़े लिखे लोग तकनीक का उपयोग कर तो रहे
है लेकिन उनका ना पढ़ना- उनके आड़े आ जा रहा है, फिर भी किसी तरह काम चलाऊ तरीके
से अपना काम चला ही लेते है। अभी जिस मोबाइल की बात कर रहा था, वो तो काफी
साधारण-सा था। जिसे आसानी से सीखा जा सकता है। एक स्मार्ट फोन का भी केस है। मेरे
ही फ्लोर पर एक फैमिली है, महिला कम पढ़ी-लिखी है.. कहिए तो सिर्फ अक्षरों का
ज्ञान है, उसे मिलाकर भी पढ़ना नहीं आता। अभी हाल में ही बेटी की जिद पर (साथ में
उसकी जिद भी शामिल थी) सैमसंग का तेरह हजार का मोबाइल खरीदा। वो भी अपनी औकात से
बाहर। आर्थिक स्थिति ठीक है, पर इतनी भी ठीक नहीं कि सिर्फ बात करने के लिए
स्मार्ट फोन ले ले- वो भी इतना महंगा। नेट भी चालू करवाया, लेकिन वही कहावत याद आ
जाती है- काला अक्षर, भैंस बराबर। लेकिन नेट का फायदा ये हुआ कि कुछ गेम्स डाउनलोड
हो गए, जिसे मजे से साढ़े चार साल की बेटी खेली एक-दो सप्ताह.. अब वो फोन अब इन
सबके लिए किसी यूज का नहीं। बस बात करने के काम में आता है, जिसके लिए इतना बड़ा
अमाउंट खर्च करना बेवकूफी है। तकनीक का तब मजा है, जब आप पढ़े लिखे हो, तकनीक सीख
सके, समझ सके। नहीं तो दुनिया में भारत उपभोक्तावाद का डेस्टिनेशन तो बन सकता है,
लेकिन पढऩे का नहीं.. ये सच है। (2151)
Sunday, March 23, 2014
21 मार्च 2014
मन अशांत है। बेचैन
है। ऑफिस में पांच साल होने जा रहे है। यूपीए 2 हमारे सामने आई थी इसी चैनल में,
कार्यस्थल दूसरा था। काम के हिसाब से देखा जाए तो थोड़ा बहुत ही काम सीखने को
मिला। किसी से अपनी व्यथा कह भी नहीं सकते। बस.. काम किए चले जा रहे है.. एक ही
तरह का। कहते है ना आपकी तरक्की सिर्फ आप पर निर्भर नहीं करती, इसके लिए पूरी
कायनात का साथ देना भी जरूरी है.. आपके सहकर्मी, आपके वरिष्ठ, आपके बॉसेज... आपका
काम, काम का स्वरूप, काम का क्राइटेरिया... सब चीज आपके फेवर में होना जरूरी है,
लेकिन आपको याद दिलाया जाएगा- गीता का सार – काम करता चल, फल की चिंता क्यूं करता
है। कर तो रहे है भई। कोई देख नहीं रहा है- ऐसा नहीं है। ऊपरवाला, ऑफ-कोर्स सब कुछ
देख रहा है। लेकिन किस तरह चीजों को जस्टीफाई कर रहा है- ये उसके हाथ में ही है।
हम कोई सवाल नहीं उठा रहे है। लेकिन एक किक तो मिलनी चाहिए। शैक्षणिक स्तर पर कुछ
करने की सोचे तो रास्ता ही नहीं खुल रहा। एक परीक्षा जो है, पास ही नहीं हो पा रहे
है। ऑबजेक्टिव ने तो पूरी ऑबजेक्टिविटी की झंड कर रखी है। खुद एक ऑबजेक्ट बन कर
रहे गए है। न्यूटन का पहला नियम लगा पड़ा है। एक जगह से हिल ही नहीं पा रहे है।
पता नहीं मेडियोक्रिटी से ही जिंदगी सटक रह गई। लेकिन ऐसी स्थिति नहीं है। चीजें
बदलेंगी। चीजें बदलने के लिए होती है। कायनात को भी हमारा साथ देना होगा। दीवार पर
टंगे कैलेंडर की तरह ही एक जगह, महीने के बदलने के अलावा, टंगे नहीं रह जाना है।
नहीं तो साल भर बाद उसी कैलेंडर की तरह फेंक दिए जायेंगे। तो इनोवेट करना जरूरी
है। नवप्रवर्तन। एक नया करने की सोच जन्म ली है। रूकावटें.. अड़चने आ रही है।
लेकिन सब बाधाओं से लड़कर एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ना होगा। कर शपथ.. कर शपथ..
बढ़ेंगे जीवन के अग्निपथ पर। (2355)
Friday, March 21, 2014
20 मार्च 2014
ई-क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ
इलेक्ट्रॉनिक हो गया, तो भला हमारे
मोहल्ले और आस-पास के इलाकों में चलने वाला रिक्शा कैसे इससे अछूता रहता। दिल्ली
में भले ही आपने नोटिस नहीं किया हो, किसी भी
मेट्रो स्टेशन से आप बाहर निकलोगे, तो आस-पास के
इलाकों में जाने के लिए रिक्शा-चालक रिक्शा खड़े हुए मिल जाते थे, लेकिन अब बड़ी तेजी से पैर से चलने वाले रिक्शा की जगह बैट्री से चलने
वाले रिक्शे ने ले ली है। सवारी भी जल्दी से अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए इन
ई-रिक्शा को पारंपरिक रिक्शे के मुकाबले बेहतर और सस्ता मानते है और झट से इस पर
सवार भी हो लेते है। पारंपरिक रिक्शों की तरह ई-रिक्शा चारों तरफ से खुला होने की
वजह से रास्ते में पड़ने वाले इमारतों और माइलस्टोनों को देखने में सवारी की मदद
करता है। इस कारण से ये ऑटो पर भी भारी पड़ रहा है। लेकिन तेजी से बढ़ती इसकी
संख्या यातायात विभाग के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। पहली बात तो इन ई-रिक्शों
का कोई पंजीकरण नहीं हो रहा है, इसलिए इसकी संख्या
बढ़ती जा रही है और एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली के सड़कों पर लगभग एक लाख
ई-रिक्शा दौड़ रहे है। दिल्ली में पहले से ही सड़कों पर इतने वाहन दौड़ रहे है कि
ट्रैफिक जाम काफी आम रहता है। ऐसे में सरकार के द्वारा इसको नियंत्रित ना करना-
समस्या को जन्म दे सकता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस सिलसिले में सरकार को
फटकार भी लगाई है, लेकिन इन ई-रिक्शा से जिन लोगों को
रोजी-रोटी मिल रही है वे अपने को पंजीकृत कराना चाह रहे है, लेकिन अन्य संघों की तरह वे भी अपने लिए सुविधाओं की मांग कर रहे है। 250
वॉट और 25 किलोमीटर
प्रति घंटे की गति से कम गति वाले वाहन नॉन-मोटराइज्ड की श्रेणी में आते है,
लेकिन यहां के ई-रिक्शा इससे ज्यादा वॉट की
बैट्री उपयोग में ला रहे है, जो परेशानी का कारण
है। इस समस्या से जल्द निजात पाना- सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। (2314)
20 मार्च 2014
सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध की
समाप्ति हो गई थी। इसके बाद दो दशक तक विश्व में अमेरिका का वर्चस्व कायम रहा।
द्विधुव्रीय विश्व व्यवस्था का दौर भले ही कुछ दिनों तक के लिए खत्म हो गया था,
लेकिन स्थिति जस-की-तस रहना संभव नहीं था। पिछले
कुछ सालों में चीन के विश्व आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने से अमेरिका का
एकाधिकारवाद खत्म हुआ। भारत भी एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने की कोशिश कर
रहा है- लेकिन ये कोशिश अंदरूनी उठापटक के कारण निकट भविष्य में मूर्त होती नहीं
दिखाई देती। इसी बीच पिछले माह से यूक्रेन में चल रहे संकट का अंत- इसके अधीन रहने
वाले स्वायत्त प्रायद्वीप क्रीमिया का रूस में शामिल हो जाने के साथ हुआ। इससे
पहले भी रूस ने जॉर्जिया, दागेस्तान को अपने
अधीन कर इसे स्वायत्त प्रांत के रूप में रखा है। क्रीमिया भी इसी रूप में रूस का
हिस्सा बनकर रहेगा। क्रीमिया के रूस में शामिल होने का विरोध अमेरिका और पश्चिमी
देशों ने भले ही किया हो, लेकिन ये नाममात्र
का ही है। ब्लादीमीर पुतिन के इस रणनीतिक प्रयास से रूस एक शक्ति के रूप में विश्व
पटल पर फिर से दस्तक दे रहा है। जितनी फूर्ति और करीने से क्रीमिया में जनमत
संग्रह कराकर पुतिन ने इसे रूस के अधीन किया है, इसका
व्यापक असर आगे देखने को मिलेगा। गैस और तेल से समृद्ध रूस पर यूरोपीय देश आश्रित
है, अतः उनका मुखर विरोध सामने नहीं आया।
अमेरिका भौगोलिक दृष्टि से रूस से बहुत दूर है और यूरोपीय देशों की मदद से ही कुछ
बड़ा कदम उठा सकता था, लेकिन वो भी देखने
को नहीं मिला। दो एशियाई ताकतों- चीन और भारत- ने पूरे संकट पर तटस्थता की नीति
अपनाई। ऐसे में आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर बहुध्रुवीय व्यवस्था तो
उभरती हुई दिखाई देती है, लेकिन जो राष्ट्र
आर्थिक रूप से सशक्त होगा, वह अपनी प्रभुता
स्थापित करने के लिए सॉफ्ट पॉवर के साथ हॉर्ड पॉवर का उपयोग करने से भी नहीं
हिचकेगा। (2247)
Wednesday, March 19, 2014
19 मार्च 2014
सूचना क्रांति के इस
दौर में हमारे देश में प्रिंट मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में
विकास देखने को मिल रहा है। देश में इस वक्त करीब 800 टीवी चैनल है, जिसमें लगभग
20 फीसदी चैनलों पर समाचार किसी ना किसी रूप में आता है। आधे घंटे के बुलेटिन से
लेकरा 24 घंटे के न्यूज चैनल जहां प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इसे मजबूती
देते है, वहीं लोगों को सीधा प्रसारण दिखाकर देश में तेजी से बदलते घटनाक्रम से
लोगों को रू-ब-रू कराते है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आविर्भाव के कारण लोगों को
समाचार को देखने, सुनने व जानने का नजरिया बदल गया, लेकिन समय के साथ इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया अपने अस्तित्व को लेकर टीआरपी और नये हथकंडों पर आश्रित रहने लगा। समाचार
की जगह ड्रामे ने ले ली है। कुछ खबरों को लेकर ने एक्टिविज्म दिखाया को उसका
सकारात्मक परिणाम सामने आया भी, लेकिन ज्यादा मामले टीआरपी पर आश्रित होते है।
2011 का अन्ना आंदोलन मीडिया के कारण इतना बड़ा आंदोलन बना। 2012 में इस आंदोलन से
निकली राजनीतिक पार्टी- आम आदमी पार्टी- ने 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में
जीत हासिल की और 49 दिन तकर दिल्ली सरकार के रूप में ऑफिस में भी रही। सब मीडिया
की मेहरबानी रही, लेकिन अब जब लोकसभा चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी को उतनी कवरेज
नहीं मिल रही तो पार्टी प्रमुख की बेचैनी पत्रकारों को जेल भेजने की धमकी के रूप
में मिल आ रही है। ये वही जनाब है जो अन्ना आंदोलन के समय मीडिया को फोल्डेड हैंड
से अभिवादन करने को कहते है। मीडिया भी जनभावना से प्रेरित होकर उस वक्त अन्ना
आंदोलन, विधानसभा चुनावों के दौरान आप का आविर्भाव और अब लोकसभा चुनाव के समय मोदी
लहर पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। तो ऐसे में मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल
उठता है। फिर मीडिया समूह के एक ग्रुप – एनबीए- का आप की खबरों को बॉयकॉट करने की
बात तो और हास्यास्पद लगती है। इसलिए अभी भी देश में भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
के क्षेत्र में काफी गति देखने को मिल रही है, लेकिन 20 साल पुराने इस मीडिया को
अभी शैशवावस्था से बाहर निकलना है, कई नई चीजों को देखना व समझना है जो कि सभी के
हितों के लिए अच्छा होगा। (1621)
Tuesday, March 18, 2014
18 मार्च 2014
भारत को हाल के
वर्षों में क्रिकेट के अलावा कई अन्य खेलों में सफलता मिली है। खिलाड़ियों ने जहां
ओलंपिक खेलों में भारत को पिछली बार छह पदक दिलवाए थे, वहीं कई अन्य
प्रतिस्पर्धाओं में कुल मिलाकर तीस पदक जीते थे। पिछले नौ साल से भारतीय खेल से
जुड़े एक नॉन-प्रॉफिट संस्था मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट ने खेल या यूं कहिए
खिलाड़ियों से अपना नाता तोड़ लिया है। 2007 से खिलाड़ियों को हर तरह की सुविधा
देने वाला ये निजी ट्रस्ट भारतीय खेलों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह सामने आया था।
खिलाड़ी अपने खेल पर पूरी तरह से ध्यान दे सके और उन्हें किसी और बात की चिंता ना
हो- इस बात का ख्याल ये ट्रस्ट बखूबी रखता था। ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतिस्पर्धाओं
में खिलाड़ियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब जाकर दुनिया के दो सौ देशों के
खिलाड़ियों को पीछे छोड़ते हुए देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने का अवसर मिलता है। खिलाड़ियों
के लिए कोच, फिजियो, मनोचिकित्सक, मालिश करने वाला, सर्जन आदि के अलावा प्रशिक्षण
सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत पड़ती है, प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए एक
जगह से दूसरे जगह की यात्रा करना- इन सबकी व्यवस्था करना इतना आसान काम नहीं होताष
अगर खिलाड़ी को खुद ये काम करना पड़े तो वो अपने खेल पर ध्यान कहां से दे पाएगा।
ऐसी सभी जरूरतों को ये ट्रस्ट- खिलाड़ी के एक फोन कॉल पर कर दिया करता था। लेकिन
खिलाड़ी एमसीटी के बंद होने से इन सुविधाओं को एक फोन कॉल पर हासिल नहीं कर सकते-
ऐसा नहीं है। कई अन्य ट्रस्ट भी है, लेकिन काफी कम समय में खिलाड़ियों को सभी
सुविधा देने का काम एमसीटी ने किया- वो मुश्किल ही दिखता है। सरकार या देश का खेल
प्रशासन कब इस तरफ पेशेवर रवैया अपनाता है- ये तो भविष्य के गर्त में छिपा है,
लेकिन फिलवक्त तो दूर-दूर तक ऐसी सुविधा देना इनके वश की बात नहीं है। ( 2009)
Monday, March 17, 2014
17 मार्च 2014
विश्व टी20 के लिए
बांग्लादेश के स्टेडियम सज गए है। क्वालीफाइंग दौर के मुकाबले चल रहे है। छोटी
टीमें मुख्य दौर में आने की जुगत में है। यहीं बांग्लादेश में हाल में एशिया कप के
मुकाबले हुए, जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच मैच हुआ और पाकिस्तान ने रोमांचक
जीत हासिल की थी, लेकिन ये जीत कुछ और कारणों से भारतीय मीडिया के सुर्खियों में
छाई रही। विश्व टी20 में फिर भारत और पाकिस्तान आमने-सामने होंगे, कोई एक टीम
जीतेगी। अगर भारत जीता- तो सुर्खियां होंगी- भारत ने पाक से एशिया कप की हार का
बदला लिया। अगर पाकिस्तान जीता तो फिर क्या मेरठ के एक विश्वविद्यालय – स्वामी
विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय- के वे छात्र उन कश्मीरी छात्रों पर अपनी भड़ास
निकाल सकेंगे, जिन्होंने पिछले मुकाबले में हार के बाद- उन कश्मीरी छात्रों को
हॉस्टल से बाहर निकलवा दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक तरफ जहां भारत की
किरकिरी करवाई, वहीं स्थानीय प्रशासन ने देशद्रोह का आरोप पहले लगाकर, फिर वापस
लेकर- अपनी भद ही पिटवाई। उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री को इस
सिलसिले में बात करनी पड़ी। अब लोगों को समझना चाहिए कि वे अस्सी के दशक में नहीं
जी रहे। ये 2014 का भारत है। सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक तौर पर हम पिछले दशकों से
काफी आगे बढ़ गए है। क्रिकेट की ही बात करे, तो फुटबॉल की तरह ‘क्लब-संस्कृति ‘ आने के साथ क्रिकेट भी अपने आप को
इवॉल्व कर रहा है। देश पीछे छूट रहा है। यहां तक की एशिया कप में भारत की कप्तानी
कर रहे विराट कोहली को अपने देश में आईपीएल के मैच में आउट होने पर स्टेडियम में
सन्नाटा नहीं, बल्कि दर्शकों की तालियां सुनने को मिलती है, जिसे वे हजम नहीं कर
पाते है। दर्शक तो खेल आनंद उठाने के नजरिए से देखता है। वो किसी भी टीम को सपोर्ट
कर सकता है, अपनी टीम की जीत पर खुशी मना सकता है। मेरठ में हुई घटना- भारत की
सच्ची तस्वीर नहीं पेश करता। लोगों को अपने जेहन में एक बात हमेशा रखनी चाहिए- “खेल को खेल की तरह लो।“ (2011)
Saturday, March 15, 2014
15 मार्च, 2014
हमारे भारतवर्ष का सबसे बड़ा पर्व आने को है...
जी, नहीं, मैं होली की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि लोकतंत्र के महापर्व यानि
लोकसभा चुनाव की बात कर रहा हूं। 2014 का सबसे बड़ा इवेंट- आम चुनाव- इसके लिए
शतरंजी बिसात बिछ गई है। आज ही दूसरे और तीसरे चरण की अधिसूचना जारी होने के साथ
बड़े राज्यों के कुछ लोकसभा सीटों के लिए नामांकन भरने का काम शुरू हो गया है।
बड़ी पार्टियां अभी उम्मीदावारों के नाम पर माथापच्ची कर रही है कि किसे कहां से
उम्मीदवार बनाया जाए ताकि उनकी जीत की संभावना बढ़ जाए। 272 के जादुई आंकड़े को
छूने की बात तो बड़ी पार्टियां सोच भी नहीं रही है। पार्टियां तो छोड़िए... दो
बड़े गठबंधन भी 272+ की सोच ही नही पा रहे
है। तो ऐसे में क्षेत्रीय क्षत्रपों, जिनकी सीटें 1 से 30 के बीच रहने की संभावना
बनती है, की भूमिका बढ़ जाती है। समाचार पत्रों या अन्य समाचार माध्यमों से
दर्शकों को रोज किसी-ना-किसी के फलां पार्टी को छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल होने
की खबरों से दो-चार होना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसे नेता दल-बदलने की प्रक्रिया में
शामिल होते है जिन्होंने अपने तीन दशक एक नेता या एक पार्टी को दिया होता है, तो
वाकई खबर बनने वाली बात होती है। छोटे दल या ऐसे नेता, जो दल बदलते है, वर्तमान
परिस्थिति में हवा का रूख भांपकर उन दलों के साथ हो जाते है जिनके जीतने की
संभावना बहुत होती है। लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व में एक बात को स्पष्ट हो जाती है
कि होली की तरह ही लोग अपने चेहरे को उस रंग में रंगना चाहते जो कि उन्हें सत्ता
के करीब ले जाएं। आदर्शवाद, नैतिकता, सिद्धांत- ये सभी कोई मायने नहीं रखता है।
सेवा के नाम पर मेवा खाने की संस्कृति के पोषक ऐसे नेताओं से कोई उम्मीद रखना
बेमानी होगी। (2147)
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