Saturday, March 15, 2014

15 मार्च, 2014

हमारे भारतवर्ष का सबसे बड़ा पर्व आने को है... जी, नहीं, मैं होली की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि लोकतंत्र के महापर्व यानि लोकसभा चुनाव की बात कर रहा हूं। 2014 का सबसे बड़ा इवेंट- आम चुनाव- इसके लिए शतरंजी बिसात बिछ गई है। आज ही दूसरे और तीसरे चरण की अधिसूचना जारी होने के साथ बड़े राज्यों के कुछ लोकसभा सीटों के लिए नामांकन भरने का काम शुरू हो गया है। बड़ी पार्टियां अभी उम्मीदावारों के नाम पर माथापच्ची कर रही है कि किसे कहां से उम्मीदवार बनाया जाए ताकि उनकी जीत की संभावना बढ़ जाए। 272 के जादुई आंकड़े को छूने की बात तो बड़ी पार्टियां सोच भी नहीं रही है। पार्टियां तो छोड़िए... दो बड़े गठबंधन भी 272+ की सोच ही नही पा रहे है। तो ऐसे में क्षेत्रीय क्षत्रपों, जिनकी सीटें 1 से 30 के बीच रहने की संभावना बनती है, की भूमिका बढ़ जाती है। समाचार पत्रों या अन्य समाचार माध्यमों से दर्शकों को रोज किसी-ना-किसी के फलां पार्टी को छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल होने की खबरों से दो-चार होना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसे नेता दल-बदलने की प्रक्रिया में शामिल होते है जिन्होंने अपने तीन दशक एक नेता या एक पार्टी को दिया होता है, तो वाकई खबर बनने वाली बात होती है। छोटे दल या ऐसे नेता, जो दल बदलते है, वर्तमान परिस्थिति में हवा का रूख भांपकर उन दलों के साथ हो जाते है जिनके जीतने की संभावना बहुत होती है। लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व में एक बात को स्पष्ट हो जाती है कि होली की तरह ही लोग अपने चेहरे को उस रंग में रंगना चाहते जो कि उन्हें सत्ता के करीब ले जाएं। आदर्शवाद, नैतिकता, सिद्धांत- ये सभी कोई मायने नहीं रखता है। सेवा के नाम पर मेवा खाने की संस्कृति के पोषक ऐसे नेताओं से कोई उम्मीद रखना बेमानी होगी। (2147)

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