भारत को हाल के
वर्षों में क्रिकेट के अलावा कई अन्य खेलों में सफलता मिली है। खिलाड़ियों ने जहां
ओलंपिक खेलों में भारत को पिछली बार छह पदक दिलवाए थे, वहीं कई अन्य
प्रतिस्पर्धाओं में कुल मिलाकर तीस पदक जीते थे। पिछले नौ साल से भारतीय खेल से
जुड़े एक नॉन-प्रॉफिट संस्था मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट ने खेल या यूं कहिए
खिलाड़ियों से अपना नाता तोड़ लिया है। 2007 से खिलाड़ियों को हर तरह की सुविधा
देने वाला ये निजी ट्रस्ट भारतीय खेलों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह सामने आया था।
खिलाड़ी अपने खेल पर पूरी तरह से ध्यान दे सके और उन्हें किसी और बात की चिंता ना
हो- इस बात का ख्याल ये ट्रस्ट बखूबी रखता था। ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतिस्पर्धाओं
में खिलाड़ियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब जाकर दुनिया के दो सौ देशों के
खिलाड़ियों को पीछे छोड़ते हुए देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने का अवसर मिलता है। खिलाड़ियों
के लिए कोच, फिजियो, मनोचिकित्सक, मालिश करने वाला, सर्जन आदि के अलावा प्रशिक्षण
सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत पड़ती है, प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए एक
जगह से दूसरे जगह की यात्रा करना- इन सबकी व्यवस्था करना इतना आसान काम नहीं होताष
अगर खिलाड़ी को खुद ये काम करना पड़े तो वो अपने खेल पर ध्यान कहां से दे पाएगा।
ऐसी सभी जरूरतों को ये ट्रस्ट- खिलाड़ी के एक फोन कॉल पर कर दिया करता था। लेकिन
खिलाड़ी एमसीटी के बंद होने से इन सुविधाओं को एक फोन कॉल पर हासिल नहीं कर सकते-
ऐसा नहीं है। कई अन्य ट्रस्ट भी है, लेकिन काफी कम समय में खिलाड़ियों को सभी
सुविधा देने का काम एमसीटी ने किया- वो मुश्किल ही दिखता है। सरकार या देश का खेल
प्रशासन कब इस तरफ पेशेवर रवैया अपनाता है- ये तो भविष्य के गर्त में छिपा है,
लेकिन फिलवक्त तो दूर-दूर तक ऐसी सुविधा देना इनके वश की बात नहीं है। ( 2009)
Tuesday, March 18, 2014
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