सूचना क्रांति के इस
दौर में हमारे देश में प्रिंट मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में
विकास देखने को मिल रहा है। देश में इस वक्त करीब 800 टीवी चैनल है, जिसमें लगभग
20 फीसदी चैनलों पर समाचार किसी ना किसी रूप में आता है। आधे घंटे के बुलेटिन से
लेकरा 24 घंटे के न्यूज चैनल जहां प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इसे मजबूती
देते है, वहीं लोगों को सीधा प्रसारण दिखाकर देश में तेजी से बदलते घटनाक्रम से
लोगों को रू-ब-रू कराते है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आविर्भाव के कारण लोगों को
समाचार को देखने, सुनने व जानने का नजरिया बदल गया, लेकिन समय के साथ इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया अपने अस्तित्व को लेकर टीआरपी और नये हथकंडों पर आश्रित रहने लगा। समाचार
की जगह ड्रामे ने ले ली है। कुछ खबरों को लेकर ने एक्टिविज्म दिखाया को उसका
सकारात्मक परिणाम सामने आया भी, लेकिन ज्यादा मामले टीआरपी पर आश्रित होते है।
2011 का अन्ना आंदोलन मीडिया के कारण इतना बड़ा आंदोलन बना। 2012 में इस आंदोलन से
निकली राजनीतिक पार्टी- आम आदमी पार्टी- ने 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में
जीत हासिल की और 49 दिन तकर दिल्ली सरकार के रूप में ऑफिस में भी रही। सब मीडिया
की मेहरबानी रही, लेकिन अब जब लोकसभा चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी को उतनी कवरेज
नहीं मिल रही तो पार्टी प्रमुख की बेचैनी पत्रकारों को जेल भेजने की धमकी के रूप
में मिल आ रही है। ये वही जनाब है जो अन्ना आंदोलन के समय मीडिया को फोल्डेड हैंड
से अभिवादन करने को कहते है। मीडिया भी जनभावना से प्रेरित होकर उस वक्त अन्ना
आंदोलन, विधानसभा चुनावों के दौरान आप का आविर्भाव और अब लोकसभा चुनाव के समय मोदी
लहर पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। तो ऐसे में मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल
उठता है। फिर मीडिया समूह के एक ग्रुप – एनबीए- का आप की खबरों को बॉयकॉट करने की
बात तो और हास्यास्पद लगती है। इसलिए अभी भी देश में भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
के क्षेत्र में काफी गति देखने को मिल रही है, लेकिन 20 साल पुराने इस मीडिया को
अभी शैशवावस्था से बाहर निकलना है, कई नई चीजों को देखना व समझना है जो कि सभी के
हितों के लिए अच्छा होगा। (1621)
Wednesday, March 19, 2014
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