सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध की
समाप्ति हो गई थी। इसके बाद दो दशक तक विश्व में अमेरिका का वर्चस्व कायम रहा।
द्विधुव्रीय विश्व व्यवस्था का दौर भले ही कुछ दिनों तक के लिए खत्म हो गया था,
लेकिन स्थिति जस-की-तस रहना संभव नहीं था। पिछले
कुछ सालों में चीन के विश्व आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने से अमेरिका का
एकाधिकारवाद खत्म हुआ। भारत भी एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने की कोशिश कर
रहा है- लेकिन ये कोशिश अंदरूनी उठापटक के कारण निकट भविष्य में मूर्त होती नहीं
दिखाई देती। इसी बीच पिछले माह से यूक्रेन में चल रहे संकट का अंत- इसके अधीन रहने
वाले स्वायत्त प्रायद्वीप क्रीमिया का रूस में शामिल हो जाने के साथ हुआ। इससे
पहले भी रूस ने जॉर्जिया, दागेस्तान को अपने
अधीन कर इसे स्वायत्त प्रांत के रूप में रखा है। क्रीमिया भी इसी रूप में रूस का
हिस्सा बनकर रहेगा। क्रीमिया के रूस में शामिल होने का विरोध अमेरिका और पश्चिमी
देशों ने भले ही किया हो, लेकिन ये नाममात्र
का ही है। ब्लादीमीर पुतिन के इस रणनीतिक प्रयास से रूस एक शक्ति के रूप में विश्व
पटल पर फिर से दस्तक दे रहा है। जितनी फूर्ति और करीने से क्रीमिया में जनमत
संग्रह कराकर पुतिन ने इसे रूस के अधीन किया है, इसका
व्यापक असर आगे देखने को मिलेगा। गैस और तेल से समृद्ध रूस पर यूरोपीय देश आश्रित
है, अतः उनका मुखर विरोध सामने नहीं आया।
अमेरिका भौगोलिक दृष्टि से रूस से बहुत दूर है और यूरोपीय देशों की मदद से ही कुछ
बड़ा कदम उठा सकता था, लेकिन वो भी देखने
को नहीं मिला। दो एशियाई ताकतों- चीन और भारत- ने पूरे संकट पर तटस्थता की नीति
अपनाई। ऐसे में आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर बहुध्रुवीय व्यवस्था तो
उभरती हुई दिखाई देती है, लेकिन जो राष्ट्र
आर्थिक रूप से सशक्त होगा, वह अपनी प्रभुता
स्थापित करने के लिए सॉफ्ट पॉवर के साथ हॉर्ड पॉवर का उपयोग करने से भी नहीं
हिचकेगा। (2247)
Friday, March 21, 2014
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