Friday, March 21, 2014

20 मार्च 2014

ई-क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक हो गया, तो भला हमारे मोहल्ले और आस-पास के इलाकों में चलने वाला रिक्शा कैसे इससे अछूता रहता। दिल्ली में भले ही आपने नोटिस नहीं किया हो, किसी भी मेट्रो स्टेशन से आप बाहर निकलोगे, तो आस-पास के इलाकों में जाने के लिए रिक्शा-चालक रिक्शा खड़े हुए मिल जाते थे, लेकिन अब बड़ी तेजी से पैर से चलने वाले रिक्शा की जगह बैट्री से चलने वाले रिक्शे ने ले ली है। सवारी भी जल्दी से अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए इन ई-रिक्शा को पारंपरिक रिक्शे के मुकाबले बेहतर और सस्ता मानते है और झट से इस पर सवार भी हो लेते है। पारंपरिक रिक्शों की तरह ई-रिक्शा चारों तरफ से खुला होने की वजह से रास्ते में पड़ने वाले इमारतों और माइलस्टोनों को देखने में सवारी की मदद करता है। इस कारण से ये ऑटो पर भी भारी पड़ रहा है। लेकिन तेजी से बढ़ती इसकी संख्या यातायात विभाग के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। पहली बात तो इन ई-रिक्शों का कोई पंजीकरण नहीं हो रहा है, इसलिए इसकी संख्या बढ़ती जा रही है और एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली के सड़कों पर लगभग एक लाख ई-रिक्शा दौड़ रहे है। दिल्ली में पहले से ही सड़कों पर इतने वाहन दौड़ रहे है कि ट्रैफिक जाम काफी आम रहता है। ऐसे में सरकार के द्वारा इसको नियंत्रित ना करना- समस्या को जन्म दे सकता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस सिलसिले में सरकार को फटकार भी लगाई है, लेकिन इन ई-रिक्शा से जिन लोगों को रोजी-रोटी मिल रही है वे अपने को पंजीकृत कराना चाह रहे है, लेकिन अन्य संघों की तरह वे भी अपने लिए सुविधाओं की मांग कर रहे है। 250 वॉट और 25 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से कम गति वाले वाहन नॉन-मोटराइज्ड की श्रेणी में आते है, लेकिन यहां के ई-रिक्शा इससे ज्यादा वॉट की बैट्री उपयोग में ला रहे है, जो परेशानी का कारण है। इस समस्या से जल्द निजात पाना- सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। (2314)

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